भक्त माल कथा माला || 28 || श्रीराँका-बाँकाजी

श्रीराँका-बाँकाजी

पण्ढरपूरमें लक्ष्मीदत्त नामके एक ऋग्वेदी ब्राह्मण रहते थे। ये सन्तोंकी बडे प्रेमसे सेवा किया करते थे। एक बार इनके यहाँ साक्षात् नारायण सन्तरूपसे पधारे और आशीर्वाद दे गये कि तुम्हारे यहाँ एक परम विरक्त भगवद्भक्त पुत्र होगा। इसके अनुसार मार्गशीर्ष शुक्ल द्वितीया गुरुवार संवत् 1347 वि० को धनलग्नमें इनकी पत्नी रूपादेवीने पुत्र प्राप्त किया। यही इनके पुत्र महाभागवत राँकाजी हुए। 

पण्ढरपुरमें ही वैशाख कृष्ण सप्तमी बुधवार संवत् 1351 वि० को कर्कलग्नमें श्रीहरिदेव ब्राह्मणके घर एक कन्याने जन्म लिया। इसी कन्याका विवाह समय आनेपर राँकाजीसे हो गया। राँकाजीकी इन्हीं पतिव्रता भक्तिमती पत्नीका नाम उनके प्रखर वैराग्यके कारण 'बाँका' हुआ। राँकाजीका भी 'राँका' नाम उनकी अत्यन्त कंगाली रंकताके कारण ही पड़ा था।

राँकाजी रंक तो थे ही, फिर जगत्‌की दृष्टि उनकी ओर क्यों जाती। इस कंगालीको पति-पत्नी दोनों ने भगवान्‌की कृपाके रूपमें बड़े हर्षसे सिर चढ़ाया था; क्योंकि दयामय प्रभु अपने प्यारे भक्तोंको अनर्थो की जड़ धनसे दूर ही रखते हैं। 

दोनों जंगलसे चुनकर रोज सूखी लकड़ियाँ ले आते और उन्हें बेचकर जो कुछ मिल जाता, उसीसे भगवान्‌की पूजा करके प्रभुके प्रसादसे जीवन-निर्वाह करते थे। उनके मनमें कभी किसी सुख-आराम या भोगकी कल्पना ही नहीं जागती थी।

श्रीराँकाजी-जैसा भगवान्‌का भक्त इस प्रकार दरिद्रताके कष्ट भोगे, यह देखकर नामदेवजीको बड़ा विचार होता था। राँकाजी किसीका दिया कुछ लेते भी नहीं थे। नामदेवजीने श्रीपाण्डुरंगसे प्रार्थना की राँकाजीकी दरिद्रता दूर करनेके लिये। 
भगवान्ने कहा- 'नामदेव ! राँका तो मेरा हृदय ही है। वह तनिक भी इच्छा करे तो उसे क्या धनका अभाव रह सकता है? परंतु धनके दोषोंको जानकर वह उससे दूर ही रहना चाहता है। देनेपर भी वह कुछ लेगा नहीं। तुम देखना ही चाहो तो कल प्रातःकाल वनके रास्तेमें छिपकर देखना।'

दूसरे दिन भगवान् ने सोनेकी मुहरोंसे भरी थैली जंगलके मार्गमें डाल दी। कुछ मुहरें बाहर बिखेर दो और छिप गये अपने भक्तका चरित देखने। राँकाजी नित्यकी भाँति भगवन्नामका कीर्तन करते चले आ रहे थे। उनकी पत्नी कुछ पीछे थीं। मार्गमें मुहरोंकी थैली देखकर पहले तो आगे जाने लगे, पर फिर कुछ सोचकर वहीं ठहर गये और हाथोंमें धूल लेकर थैली तथा मुहरोंको ढकने लगे। इतनेमें उनकी पत्नी समीप आ गयीं। 

उन्होंने पूछा- 'आप यहाँ क्या ढँक रहे हैं?' 

राँकाजीने उत्तर नहीं दिया। दुबारा पूछनेपर बोले-'यहाँ सोनेकी मुहरोंसे भरी थैली पड़ी है। मैंने सोचा कि तुम पीछे आ रही हो, कहीं सोना देखकर तुम्हारे मनमें लोभ न आ जाय, इसलिये इसे धूलसे ढके देता हूँ। धनका लोभ मनमें आ जाय तो फिर भगवान्‌का भजन नहीं होता।' 

पत्नी यह बात सुनकर हँस पड़ी और बोली- 'स्वामी। सोना भी तो मिट्टी ही है। आप धूलसे धूलको क्यो ढंक रहे हैं?' 

राँकाजी झट उठ खड़े हुए। पत्नीकी बात सुनकर प्रसन्न होकर बोले-'तुम धन्य हो। तुम्हारा ही वैराग्य बाँका है। मेरी बुद्धिमें तो सोने और मिट्टीमें भेद भरा है। तुम मुझसे बहुत आगे बढ़ गयी हो।'
नामदेवजी राँका बाँकाका यह वैराग्य देखकर भगवान्बो से बोले-'प्रभो! जिसपर आपकी कृपादृष्टि होती है, उसे तो आपके सिवा त्रिभुवनका राज्य भी नहीं सुहाता। जिसे अमृतका स्वाद मिल गया, वह भला, सड़े गुड़की ओर क्यों देखने लगा ? ये दम्पती धन्य हैं।'

भगवान् श्रीनामदेवजीसे बोले- देखो, हमारी बात सत्य हुई। ये दोनों धनके प्रति कितने निस्पृह हैं।

भगवान्‌की जीत हुई, श्रीनामदेवजी हार गये। फिर भगवान्ने एक और बात कही कि 'यदि तुम्हारे मनमें विशेष परिताप है कि श्रीराँका बाँकाजीकी सहायता करनी ही चाहिये तो चलो, इनके लिये लकड़ी बटोरें।'

भगवान्ने उस दिन राँका बाँकाके लिये जंगलकी सारी सूखी लकड़ियाँ गड्ढे बाँध बाँधकर एकत्र कर दीं। दम्पतीने देखा कि वनमें तो कहीं आज लकड़ियाँ ही नहीं दीखतीं। गड्ढे बाँधकर रखी लकड़ियाँ उन्होंने किसी दूसरेकी समझीं। दूसरेकी वस्तुकी ओर आँख उठाना तो पाप है। दोनों खाली हाथ लौट आये। 

राँकाजीने कहा-'देखो, सोनेको देखनेका ही यह फल है कि आज उपवास करना पड़ा। उसे छू लेते तो पता नहीं कितना कष्ट मिलता।' 

अपने भक्तकी यह निष्ठा देखकर भगवान् प्रकट हो गये। दम्पती उन सर्वेश्वरके दर्शन करके उनके चरणोंमें गिर पड़े।

श्रीराँका बाँकाजी श्रीठाकुरजीको घर लिवा लाये। भगवान्‌के संग श्रीनामदेवजीको देखकर श्रीराँकाजीने झुंझलाकर कहा-'अरे मूड़फोरा ! श्रीप्रभुको इस प्रकार वन-वन भटकाया जाता है?' 

भगवान्ने राँकाजीसे कुछ माँगनेका अनुरोध किया। तब वे हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगे कि 'मुझे आपकी कृपाके सिवा और कुछ नहीं चाहिये।' 

तब श्रीनामदेवजीने हाथ जोड़कर इनसे कहा कि 'अच्छा और कुछ नहीं तो प्रभुका रुख रखते हुए प्रभुका एक प्रसादी वस्त्र ही शरीरपर धारण कर लीजिये।' 

यद्यपि इतनेसे भी श्रीराँका बाँकाजीको लगा कि मेरे सिरपर भारी बोझ पड़ गया, परंतु उन्होंने भक्त और भगवान्‌की रुचि रखनेके लिये वस्त्रमात्र स्वीकार कर लिया।

101 वर्ष इस पृथ्वीपर रहकर राँकाजी वैशाख शुक्ल पूर्णिमा संवत् 1452 वि० की अपनी पत्नी बाँकाजीके साथ परम धाम चले गये।

बोलो भक्त और भगवान की जय।


श्रीप्रियादासजीने राँका बाँका दम्पतीकी निःस्पृहताका वर्णन अपने कवित्तोंमें इस प्रकार किया है-
राँका पति बाँका तिया बसै पुर पंढरमें उरमें न चाह नेकु रीति कछु न्यारियै। 
लकरीन बीनि करि जीविका नवीन करें धरै हरि रूप हिये ताही सों जियारियै ॥ 
विनती करत नामदेव कृष्णदेव जू सों कीजै दुःख दूर कही मेरी मति हारियै। 
चलो लै दिखाऊँ तब तेरे मन भाऊँ रहे बन छिपि दोऊ थैली मग माँझ डारियै ॥ 401 ॥ 
आये दोऊ तिया पति पाछे बधू अ आगे स्वामी औचक ही मग माँझ सम्पति निहारियै। 
जानी यों जुबति जाति कर्भू मन चलि जात याते बेगि संभ्रम सों धूरि वापै डारियै ॥ 
पूछी अजू कहा कियौ भूमिमें निहुरि तुम कही वही बात बोली धनहूँ विचारियै।
कहैं मोसों राँका ऐपै बाँका आज देखी तुही सुनि प्रभु बोले बात साँची है हमारियै ।। 402 ॥ 
श्रीप्रियादासजी इस घटनाका एक कवित्तमें इस प्रकार वर्णन करते हैं-
नामदेव हारे हरिदेव कही और बात जो पै दाह गात चलो लकरी सकेरियै। 
आयै दोऊ बीनिबेको देखी इक ठौरी ढेरी द्वै हूँ मिली पावैं तऊ हाथ नाहिं छेरियै ॥
तब तौ प्रगट श्याम ल्याये यों लिवाय घर देखि मूँड़ फोरी कह्यी ऐसे प्रभु फेरियै। 
विनती करत करजोरि अंग पट धारौ भारी बोझ पत्यौ लियौ चीरमात्र हेरियै ॥ 403 ॥ 

आपकी दी हुई कथा के आधार पर इसे सरल, प्रवाहपूर्ण और सुंदर कहानी के रूप में इस प्रकार लिखा जा सकता है:


श्री राँका-बाँकाजी की अद्भुत भक्ति कथा

महाराष्ट्र के पवित्र तीर्थ पंढरपुर में लक्ष्मीदत्त नाम के एक ऋग्वेदी ब्राह्मण रहते थे। वे बड़े धर्मात्मा और संतों के सेवक थे। उनके घर पर जब भी कोई साधु-संत आते, वे प्रेमपूर्वक उनकी सेवा करते।

एक दिन उनके घर एक संत पधारे। वे वास्तव में स्वयं भगवान नारायण थे जो संत के रूप में आए थे। लक्ष्मीदत्त और उनकी पत्नी रूपादेवी ने अत्यंत श्रद्धा से उनकी सेवा की। प्रसन्न होकर संत ने आशीर्वाद दिया—

“तुम्हारे घर एक महान वैरागी और भगवान का परम भक्त पुत्र जन्म लेगा।”

कुछ समय बाद मार्गशीर्ष शुक्ल द्वितीया, संवत 1347 को रूपादेवी ने एक पुत्र को जन्म दिया। वही आगे चलकर महान भगवद्भक्त राँकाजी कहलाए।

कुछ वर्षों बाद पंढरपुर में ही हरिदेव ब्राह्मण के घर एक कन्या का जन्म हुआ। उसका नाम बाद में बाँका पड़ा। जब समय आया तो उसका विवाह राँकाजी से हो गया।

राँकाजी अत्यंत गरीब थे। उनकी गरीबी के कारण लोग उन्हें “राँका” (रंक अर्थात बहुत गरीब) कहने लगे। उनकी पत्नी का नाम भी उनके अद्भुत वैराग्य के कारण “बाँका” पड़ गया।

लेकिन इस दंपति ने कभी अपनी गरीबी को दुःख नहीं माना। वे समझते थे कि—

“भगवान अपने प्रिय भक्तों को धन के मोह से दूर रखते हैं।”

उनका जीवन

राँका और बाँका रोज जंगल में जाकर सूखी लकड़ियाँ चुनते। उन लकड़ियों को बेचकर जो थोड़े पैसे मिलते, उससे पहले भगवान की पूजा करते और फिर उसी प्रसाद से अपना जीवन चलाते।

उनके मन में कभी भोग-विलास या सुख-सुविधा की इच्छा नहीं आती थी।

नामदेव जी की चिंता

यह देखकर महान संत नामदेव जी को चिंता होती थी कि इतना बड़ा भक्त इतनी गरीबी में क्यों जीवन बिताए।

उन्होंने भगवान पांडुरंग से प्रार्थना की—

“प्रभु! राँका की गरीबी दूर कर दीजिए।”

भगवान मुस्कराकर बोले—

“नामदेव! राँका तो मेरा हृदय है। यदि वह चाहे तो उसे धन की कमी नहीं रह सकती। लेकिन वह धन के दोष जानता है इसलिए उससे दूर रहता है। तुम चाहो तो कल उसका वैराग्य देख सकते हो।”

सोने की थैली की परीक्षा

अगले दिन भगवान ने जंगल के रास्ते में सोने की मुहरों से भरी एक थैली डाल दी और कुछ मुहरें बाहर बिखेर दीं। फिर वे छिपकर देखने लगे।

राँकाजी रोज की तरह भगवान का नाम गाते हुए जंगल की ओर जा रहे थे। उनकी पत्नी थोड़ी पीछे चल रही थी।

अचानक राँकाजी की नजर उस थैली पर पड़ी। उन्होंने देखा कि उसमें सोना है। पहले तो वे आगे बढ़ गए, पर फिर रुक गए और धूल उठाकर उस थैली और मुहरों को ढकने लगे।

इतने में बाँकाजी आ गईं और पूछने लगीं—

“आप क्या कर रहे हैं?”

राँकाजी बोले—

“यहाँ सोने की मुहरों की थैली पड़ी है। तुम पीछे आ रही थीं, कहीं सोना देखकर तुम्हारे मन में लोभ न आ जाए, इसलिए मैं इसे धूल से ढक रहा हूँ।”

यह सुनकर बाँकाजी हँस पड़ीं और बोलीं—

“स्वामी! सोना भी तो मिट्टी ही है। आप धूल से धूल को क्यों ढक रहे हैं?”

यह सुनकर राँकाजी बहुत प्रसन्न हुए और बोले—

“तुम तो मुझसे भी बड़ी वैरागी हो। मेरी बुद्धि में अभी भी सोने और मिट्टी का भेद है, पर तुम्हारे लिए दोनों एक समान हैं।”

भगवान की प्रसन्नता

यह दृश्य देखकर संत नामदेव जी भावविभोर हो गए और भगवान से बोले—

“प्रभु! जिस पर आपकी कृपा होती है, उसे तीनों लोकों का राज्य भी अच्छा नहीं लगता।”

भगवान मुस्कराए और बोले—

“देखा नामदेव, मेरा भक्त धन से कितना निस्पृह है।”

दूसरी परीक्षा

फिर भगवान ने कहा—

“यदि तुम सचमुच उनकी सहायता करना चाहते हो तो चलो, उनके लिए लकड़ियाँ इकट्ठी करें।”

उस दिन भगवान ने जंगल की सारी सूखी लकड़ियाँ इकट्ठी करके बाँधकर रख दीं।

जब राँका-बाँका जंगल पहुँचे तो उन्हें कहीं भी लकड़ियाँ नहीं मिलीं। जो लकड़ियाँ बंधी हुई पड़ी थीं, उन्हें उन्होंने किसी दूसरे की समझा।

वे बोले—

“दूसरे की वस्तु लेना पाप है।”

इसलिए वे खाली हाथ लौट आए।

राँकाजी ने कहा—

“आज सोने को देखने का ही फल है कि हमें उपवास करना पड़ेगा।”

भगवान का प्रकट होना

अपने भक्तों की ऐसी निष्ठा देखकर भगवान स्वयं प्रकट हो गए।

राँका-बाँका भगवान के दर्शन पाकर उनके चरणों में गिर पड़े और उन्हें अपने घर ले आए।

भगवान के साथ संत नामदेव को देखकर राँकाजी बोले—

“अरे नामदेव! प्रभु को इस तरह जंगल-जंगल क्यों भटकाते हो?”

भगवान का वरदान

भगवान ने राँकाजी से कहा—

“मुझसे कुछ माँगो।”

राँकाजी ने हाथ जोड़कर कहा—

“प्रभु! मुझे आपकी कृपा के सिवा कुछ नहीं चाहिए।”

तब नामदेव जी ने कहा—

“यदि कुछ नहीं लेना चाहते तो कम से कम प्रभु का प्रसाद रूप एक वस्त्र स्वीकार कर लीजिए।”

राँकाजी ने भक्त और भगवान की इच्छा का सम्मान करते हुए वह वस्त्र स्वीकार कर लिया।

अंत

इस प्रकार 101 वर्ष तक भगवान का भजन करते हुए जीवन बिताकर वैशाख शुक्ल पूर्णिमा, संवत 1452 को राँकाजी और बाँकाजी दोनों ही परमधाम को प्राप्त हो गए।


इस कथा का संदेश

  • सच्चा भक्त धन से नहीं, भगवान से प्रेम करता है।
  • वैराग्य और संतोष ही सच्चा सुख है।
  • भगवान अपने भक्तों की निष्ठा अवश्य परखते हैं, लेकिन अंत में उन्हें अपने दर्शन भी देते हैं।

यदि आप चाहें तो मैं इस कथा को और भी रोचक बनाकर:

  • बच्चों के लिए कहानी रूप में
  • भक्ति प्रवचन शैली में
  • नाटक / नाटिका (डायलॉग के साथ)

भी बना सकता हूँ।


बच्चों की कहानी

सोना और मिट्टी – राँका और बाँका की कहानी

बहुत समय पहले महाराष्ट्र के पवित्र नगर पंढरपुर में एक ब्राह्मण रहते थे। उनका नाम लक्ष्मीदत्त था। वे बहुत अच्छे और दयालु इंसान थे। उन्हें साधु-संतों की सेवा करना बहुत पसंद था।

एक दिन उनके घर एक संत आए। लक्ष्मीदत्त और उनकी पत्नी रूपादेवी ने बड़े प्रेम से उनकी सेवा की। संत बहुत प्रसन्न हुए और आशीर्वाद देते हुए बोले—

“तुम्हारे घर एक ऐसा पुत्र जन्म लेगा जो भगवान का बहुत बड़ा भक्त होगा।”

कुछ समय बाद उनके घर एक प्यारा सा बेटा पैदा हुआ। उसका नाम राँका रखा गया।


राँका और बाँका

उसी नगर में कुछ वर्षों बाद एक लड़की का जन्म हुआ। उसका नाम बाँका था। जब दोनों बड़े हुए तो उनका विवाह हो गया।

राँका और बाँका दोनों भगवान के बहुत बड़े भक्त थे। लेकिन वे बहुत गरीब थे। उनके पास न बड़ा घर था और न धन-दौलत।

वे रोज जंगल में जाते, सूखी लकड़ियाँ इकट्ठी करते और उन्हें बेचते। जो थोड़े पैसे मिलते, उससे पहले भगवान की पूजा करते और फिर खाना खाते।

वे हमेशा खुश रहते थे, क्योंकि उन्हें भगवान का नाम लेना सबसे अच्छा लगता था।


संत नामदेव की चिंता

एक दिन संत नामदेव जी ने सोचा—

“राँका इतना बड़ा भक्त है, फिर भी इतना गरीब क्यों है?”

उन्होंने भगवान पांडुरंग से प्रार्थना की—

“प्रभु! कृपया राँका की गरीबी दूर कर दीजिए।”

भगवान मुस्कुराए और बोले—

“नामदेव, राँका को धन नहीं चाहिए। वह धन के मोह से दूर रहना चाहता है। लेकिन यदि तुम देखना चाहते हो तो कल उसकी परीक्षा देख लेना।”


सोने की थैली

अगले दिन भगवान ने जंगल के रास्ते में सोने की मुहरों से भरी एक थैली रख दी।

थोड़ी देर बाद राँका वहाँ से गुजर रहे थे। उन्होंने थैली देखी और समझ गए कि उसमें सोना है।

उन्होंने सोचा—
“अगर कोई इसे देखकर लालच में पड़ जाए तो?”

यह सोचकर उन्होंने धूल उठाकर उस थैली को ढकना शुरू कर दिया

इतने में उनकी पत्नी बाँका वहाँ आ गईं।

उन्होंने पूछा—
“आप क्या कर रहे हैं?”

राँका बोले—
“यहाँ सोने की थैली पड़ी है। मैं इसे ढक रहा हूँ ताकि तुम्हें सोना देखकर लालच न हो।”

यह सुनकर बाँका हँस पड़ीं और बोलीं—

“स्वामी! सोना भी तो मिट्टी ही है।
आप धूल से धूल को क्यों ढक रहे हैं?”

राँका यह सुनकर बहुत खुश हुए और बोले—

“तुम तो मुझसे भी बड़ी वैरागी हो! तुम्हारे लिए सोना और मिट्टी एक जैसे हैं।”


भगवान खुश हुए

यह सब भगवान और नामदेव जी छिपकर देख रहे थे। भगवान बहुत खुश हुए।

फिर भगवान ने एक और परीक्षा ली। उन्होंने जंगल की सारी सूखी लकड़ियाँ इकट्ठी करके बाँधकर रख दीं।

जब राँका और बाँका जंगल पहुँचे तो उन्हें लकड़ियाँ नहीं मिलीं। जो लकड़ियाँ बंधी हुई थीं, उन्होंने सोचा—

“यह किसी और की होंगी। हमें इन्हें नहीं लेना चाहिए।”

इसलिए वे खाली हाथ वापस लौट आए

रास्ते में राँका बोले—

“आज हमें उपवास करना पड़ेगा, लेकिन दूसरे की चीज लेना ठीक नहीं है।”


भगवान के दर्शन

राँका और बाँका की सच्ची भक्ति देखकर भगवान बहुत प्रसन्न हुए।

अचानक भगवान पांडुरंग उनके सामने प्रकट हो गए।

राँका और बाँका उन्हें देखकर बहुत खुश हुए और उनके चरणों में गिर पड़े।

भगवान बोले—

“मुझसे कुछ माँगो।”

राँका ने हाथ जोड़कर कहा—

“प्रभु, हमें कुछ नहीं चाहिए। हमें केवल आपकी कृपा चाहिए।”

भगवान मुस्कुराए और उन्हें आशीर्वाद दिया।


कहानी की सीख

इस कहानी से हमें तीन बातें सीखने को मिलती हैं—

1️⃣ सच्चा सुख धन में नहीं, भगवान के नाम में है।
2️⃣ दूसरों की चीज़ कभी नहीं लेनी चाहिए।
3️⃣ संतोष और भक्ति सबसे बड़ी दौलत हैं।


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📖 और भी मजेदार चित्रों वाली बच्चों की कहानी
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