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Showing posts from December, 2023

श्री भक्तमाली जी चमत्कार १

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चमत्कार -भाग १। सब चरित्र और रहस्य पूज्य संत श्री भक्तमाली जी , श्री राजेंद्रदासचार्य जी ,हरिवंशी संत श्री हितशरण जी, पंडित बाबा, श्री रामसुखदास जी एवं कुछ अवध के महात्माओ के निजी अनुभवो और उनके अनुयायी संतो से सुनी जानकारी के आधार पर दिया लिखा गया है । कृपया अपने नाम से कही प्रकाशित ना करे ।  १.  एक प्रेमि संत : पूज्य श्री हरीबाबा जी महान् संत हुए है , उनके साथ नित्य कुछ न कुछ संत मंडली रहती ही थी । एक समय हरीबाबा के साथ कुछ प्रेमी संत यात्रा करने गए थे , उन संतो में एक संत के पास बड़े सुंदर शालिग्राम भगवान् थे । वे संत उन शालिग्राम जी को हमेशा साथ लिए रहते थे । ट्रेन से यात्रा करते समय बाबा ने शालिग्राम जी को बगल में रख दिया और अन्य संतो के साथ हरी चर्चा में मग्न हो गए । जब ट्रेन रुकी और सब संत उतरे तो वे शालिग्राम जी वाही गाडी में रह गए । संत अपनी मस्ती में उन्हें साथ लेकर आना ही भूल गए । बहुत देर बाद जब हरीबाबा जी के आश्रम पर सब संत पहुंछे और भोजन प्रसाद पाने का समय आया तो उन प्रेमी संत ने देखा की हमारे शालिग्राम जी नहीं है । संत बहुत व्याकुल हो गए , बहुत रोने लगे परंतु भगव...

भक्त माल कथा माला || 23 || भगवद्भक्त श्री रांका बांका जी

भक्त माल कथा माला || 23 || भगवद्भक्त श्री रांका बांका जी श्री रांका-बांका (पति पत्नी) जी दोनो उच्च कोटी के भक्त हुए हैं। भक्त श्रीरांकाजी पति थे और भक्तिमती श्रीबांकाजी उनकी पत्नी थी। इन दोनोके ह्रदयमें सिवा भगवान्‌ के और कुछ भी चाह नहीं थी। यह दोनो जंगलसे लकड़ियां बीनकर लाते और उन्हींको बेचकर अपनी नित्य नवीन जीविका करते थे।  एक बार संत श्री नामदेवजी ने भगवान् भगवान विट्ठल से विनती की के भगवान आप तो सर्वेश्वर हैं अपने भक्त रांका-बांकाजी की गरीबी दूर कर दीजिये ।  भगवान् ने कहा – ‘राँका तो मेरा हृदय है, वह धन की तनिक की इच्छा करे तो उसे कोई अभाव नहीं रह सकता; परन्तु देने पर वह लेगा नहीं । मैने बहुत उपायोंसे इन्हे देना चाहा, परंतु ये लेते ही नहीं, यदि नही मानो तो मेरे संग चलो, मै इनकी निष्कामता दिखलाऊँ।' फिर तो भगवान्‌ने अगली सुबह उनके मार्गमें एक स्वर्णमुहरोंसे भरी थैली डाल दी और स्वयं तथा श्रीनामदेवजी दोनों जंगल में छिप गये।  प्रात:काल का समय है, श्री रांका-बांकाजी दोनों उसी मार्गसे रोज की तरह कीर्तन करते हुए भगवत्प्रेम की मस्ती में चले जा रहे थे । उनकी पत्नी कुछ पीछे थीं ...

भक्त माल कथा माला || 18 || विठ्ठलभक्‍त नरहरि सुनार !

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  विठ्ठलभक्‍त नरहरि सुनार ! विठ्ठलभक्‍त नरहरि सुनार ! संत नरहरी सुनार जी भूवैकुंठ श्री पंढरपुर धाम में नरहरी सोनार नामक महान विट्ठल भक्त का जन्म सं. 1313 में हुआ था। कुछ संतो का मत है कि इनका जन्म सवंत शके 1115 श्रावण मास शुक्ल पक्ष त्रयोदशी को अनुराधा नक्षत्र में प्रातः काल हुआ था ।  पंढरपुर में भगवान् श्रीकृष्ण के साथ साथ शिवोपासना भी प्राचीन काल से चली आ रही है। नरहरी सोनार के घर भगवान् शिव की उपासना परंपरा से चली आ रही थी।  उनके पिता महान शिव भक्त थे, रोज शिवलिंग को अभिषेक करके बिल्वपत्र अर्पण करने के बाद ही वे काम पर जाते थे। चिदानंदरूप: शिवोहं शिवोहं  यह उनकी शिव उपासना की भावना थी और भगवान् शिव की कृपा से ही उनके घर नरहरी का जन्म हुआ था। समय आने पर नरहरी का जनेऊ संस्कार हुआ। मल्लिकार्जुन मंदिर में जाकर भगवान् की पूजा करने में एवं स्तोत्र पाठ करने में उन्हें बहुत आनंद आता था। बाल्यकाल।में उन्हें अनेक शिव स्तोत्र कंठस्थ थे और पुराणों की कथाये भी नरहरी जी बड़े आनंद से श्रवण करते परंतु पुराणों में उन्हें केवल भगवान् शिव की लीलाये हि प्रिय लगती थी। धीरे धीरे इन...

भक्त माल कथा माला || 16 || रभक्ति बद्री दास | झंडेवालान् मंदिर | दिल्ली

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झंडेवालान्  मंदिर,  भारत की राजधानी महानगर दिल्ली ऐतिहासिक और धार्मिक  दोनों प्रकार के स्थलों से भरा पड़ा है। दिल्ली के उत्तरी जिले में स्थित है करोलबाग । इसी करोल बाग इलाके में इलाके मे हिंदुओं धर्म से संबंधित एक प्रसिद्ध मंदिर स्थापित है। इसी मंदिर के नाम पर इस स्थान का नाम झंडेवालान पड़ गया है। इसी कारण यहां के बस स्टॉप और मेट्रो रेलवे स्टेशन का नाम झंडेवालान है। सभी संस्थाओं द्वारा झंडेवाला देवी को भारत वर्ष के सर्वोतम व्यवस्था एवं रखरखाव वाले मंदिरों में से एक माना जाता है । माँ के भक़्त यहां आ कर मानसिक शांति व सुख की अनुभूति प्राप्त करते हैं । मंदिर की व्यवस्था इस मंदिर की देखभाल का श्रेय बद्री भगत झंडेवालान टेंपल समिति के नाम जाता है। प्रारम्भ में झंडेवाला मंदिर ऐस्टेट की सारी देखभाल बद्री भगत जी व उनके वंशज ही करते थे। सन 1944 में उनके परपौत्र श्री श्याम सुंदर जी ने बद्री भगत झंडेवाला टेम्पल सोसायटी नाम से एक न्यास की स्थापना कर उस समय के गणमान्य धर्मावलम्बियों को न्यासी नियुक़्त कर सारा प्रबंध उस न्यास को सौंप दिया। इस न्यास में बद्री भगत ज...

भक्त माल कथा माला || 15 || राजा सत्यव्रत की कथा

भक्त माल कथा माला ||  15 || राजा सत्यव्रत की कथा राजा सत्यव्रत की कथा भाग 1 महाराज मेरी भोलेनाथ की कथा ऐसी ही नहीं वे अपने भक्तों के लिए नंगे पैर दौड़े चले आते हैं ऐसे कथा सत्य भगवान सत्य व्रत की कथा जिसमें भगवान उसके बच्चे की रक्षा की अपने 19 अवतारों में शोध में अवतार भिक्षुवर्य अवतार चलो जानते हैं और सुनते हैं यह कहानी  राजा सत्यव्रत की कथा भाग्य 1 शिव पुराण में भगवान शिव के अनन्य भक्त राजा सत्यव्रत का वर्णन मिलता है। सत्यव्रत विदर्भ नरेश सत्यव्रत आठों पहर भगवान भोलेनाथ की आराधना में लगा रहता था। आराधना में दिन और रात उसके लिए समान थे। ऐसा कोई पल ऐसी कोई घड़ी या ऐसा कोई दिन नहीं होता था जिसमें सत्यव्रत भगवान भोलेनाथ की आराधना में लीन न रहें हो। भगवान भोलेनाथ में अगाध भक्ति प्रेम के उपरांत भी वह अपने राज्य की जनता को हमेशा खुश रखने का प्रयास करते। उनके राज्य में जनता बहुत सुखी और प्रसन्न थी। प्रजा को जब भी कोई परेशानी होती तो राजा उसे तुरंत दूर करते और राज्य के कल्याण में अपनी धन-संपदा का उपयोग करते। राजा सत्यव्रत के कार में धन केवल दो ही कल्याण कार्य में लगता या तो धर्म कल्य...

भक्त माल कथा माला || 14 || अक्षय पात्र और दासीमैया की कथा

भक्त माल कथा माला ||  14 ||अक्षय पात्र और दासीमैया की कथा कर्नाटक में दासी मैया नाम के भगवान भोलेनाथ के एक परम भक्त हुए हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो ये भगवान भोलेनाथ के परम उपासक हुए हैं। वे बचपन से ही किसी वृक्ष के नीचे बैठ जाते और वहां मिट्टी से शिवलिंग बना लेते और उसकी मन लगाकर पूजा उपासना करते हैं।  दासी मैया के पिता एक जुलाहा थे, जो कपड़े बुनने का काम किया करते थे। इसलिए दासी मैया का काम भी कपड़े बुनना ही हुआ। वे अपने इस पैत्रिक काम को मन लगाकर किया करते थे। उनकी कमाई इतनी नहीं थी कि वे अच्छे से भोजन कर सके । वे एक छोटे से झोपड़े में निवास करते थे। दासी मैया जब 8 वर्ष के थे तभी भी मिट्टी एकत्रित करते, उसे गीला करते और उससे शिवलिंग का निर्माण करके उसकी पूजा किया करते। यही उनकी दैनिक प्रक्रिया थी। एक बार को खाना भूल जाए, पीना भूल जाए लेकिन शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा करना कभी नहीं भूलते।  शायद वह पूजा करते हुए गाते और गुनगुनाते हों  मेरे नाथ दया करना तेरे भरोसे मेरे बाबा दया करना तेरे भरोसे ना घर के भरोसे ना परिवार के भरोसे ना घर के भरोसे ना परिवार के भरोसे जगह-जगह स...

भक्त माल कथा माला || 13 || शमी पत्र व मंदार की मार्मिक कथा

भक्त माल कथा माला ||  13 || शमी पत्र व मंदार की मार्मिक कथा कथा इस प्रकार है :- एक बार नारद मुनि तीनों लोकों में विचरते हुए स्वर्गलोक में देवराज इंद्र के पास पहुँचे। इंद्र ने उनका यथोचित स्वागत किया। वार्तालाप के क्रम में इंद्र ने मुनि से कहा हे मुनिवर आप पृथ्वी लोग का भ्रमण करके आ रहे हैं तो कृपया मुझे औरव ऋषि और उनकी पुत्री की कथा सुनाने की कृपा कीजिए। नारदमुनि ने सहर्ष इस प्रकार कथा सुनाई, वे बोले, "इंद्र देव ! आपने एक ऐसी कथा सुनाने का आग्रह किया है जो मृत्यु लोक में लोगों के कष्टों को दूर करने वाली है । चलिए अब मैं महान ऋषि औरब तथा उनकी पुत्री शमी की कहानी आपको सुनाने जा रहा हूं। "एक समय में मालवा में औरव नाम के ऐसे विद्वान ब्राह्मण हुए जिनका तेज वेदों के ज्ञान रूपी सूर्य के सामान प्रदीप्त था। उन्हें देवताओं के सामान ही शक्तियां प्राप्त थी। बहुत दिनों बाद उनकी पत्नी ने एक अत्यंत सुन्दर पुत्री को जन्म दिया जिसका नाम शमी रखा गया।  ऋषि शमी को बहुत ही स्नेह दिया करते थे। शमी जब बड़ी होने लगी तो उसने एक नियम बना लिया कि जो भी व्यक्ति उनके घर आता वह उसे भूखा नहीं जाने देती । व...