भक्त माल कथा माला || 19 || गोपाल चरवाहा की मार्मिक कथा

गोपाल चरवाहा की मार्मिक कथा


बिनु विश्वास भगति नहीं, तेही बिनु द्रवहिं राम।

राम-कृपा बिनु सपनेहुँ, जीव लहि विश्राम॥

भगवान् में सच्चे विश्वास के बिना मनुष्य को भगवद्भक्ति प्राप्त नहीं हो सकती और बिना भक्ति के भगवान् कृपा नहीं कर सकते। जब तक मनुष्य पर भगवान् की कृपा नहीं होती तब तक मनुष्य स्वप्न में भी सुख-शांति नहीं पा सकता। अत: मनुष्य को भगवान् का भजन करते रहना चाहिए ताकि भगवान् के प्रसन्न हो जाने पर भक्त को सब सुख-संपत्ति अपने आप प्राप्त हो जाय।


उत्तर प्रान्तकी कमलावती नगरीमें गोपाल नामका एक ग्वाला रहता था। न वह पढ़ा-लिखा था और न उसने कथा - वार्ता सुनी थी। दिनभर गायोंको जंगलमें चराया करता था। दोपहरको स्त्री छाक पहुँचा दिया करती थी। गोपाल सीधा, सरल और निश्चिन्त था। उसे 'राम-राम' जपनेकी आदत पड़ गयी थी, सो उसका जप वह सुबह-शाम थोड़ा बहुत कर लेता था। इस प्रकार उसकी उमर पचास वर्षकी हो गयी। बराबरवाले उसे चिढ़ाया करते थे- 'राम-राम रटनेसे वैकुण्ठके विमानका पाया हाथ नहीं आनेका।'

एक दिन गोपालको उसके साथी चिढ़ा रहे थे। उसी रास्ते एक संत जा रहे थे। उन्होंने चिढ़ानेवालोंसे कहा- 'भाई ! तुमलोग बड़ी गलती कर रहे हो। भगवान्‌के नामकी महिमा तुम नहीं जानते। यह बूढ़ा चरवाहा यदि इसी प्रकार श्रद्धासे भगवान्का नाम लेता रहेगा तो इसे संसार सागरसे पार कर देनेवाले गुरु अवश्य मिल जायेंगे। भगवानका नाम तो सारे पापोंको तुरंत भस्म कर देता है।'




गोपालको अब विश्वास हो गया कि 'मुझे अवश्य गुरु मिलेंगे और उनकी कृपासे मैं भगवान्‌के दर्शन कर सकूँगा।' वह अब बराबर गुरुदेवकी प्रतीक्षा करने लगा। वह सोचता- 'गुरुजीको मैं झट संतके बताये लक्षणोंसे पहचान लूँगा। उन्हें ताजा दूध पिलाऊँगा। वे मुझपर राजी हो जायेंगे। मेरे गुरुजी बड़े भारी ज्ञानी होंगे। भला, उनका ज्ञान मेरी समझमें तो कैसे आ सकता है। मैं तो उनसे एक बात पूछूंगा। मुझसे बहुत-सी झंझट नहीं होगी।'

गोपालकी उत्कण्ठा तीव्र थी। वह बार-बार रास्तेपर जाकर देखता, पेड़ पर चढ़कर देखता, लोगोंसे पूछता- कोई संत तो इधर नहीं आये?" कभी कभी व्याकुल होकर गुरुजीके न आनेसे रोने लगता। अपने अनदेखे, अनजाने गुरुको जैसे वह खूब जान चुका है। एक दिन इसी प्रकारकी प्रतीक्षामें गोपालने दूरसे एक संतको आते देखा। उसका हृदय आनन्दसे पूर्ण हो गया। उसने समझलिया कि उसके गुरुदेव आ गये। उन्हें ताजा दूध पिलानेके लिये झटपट वह गाय दुहने बैठ गया। इतनेमें वे संत पास आ गये। दुहना अधूरा छोड़कर एक हाथमें दूधका बर्तन और दूसरेमें अपनी लाठी लिये वह खड़ा हो गया और बोला- 'महाराज ! तनिक दूध तो पीते जाओ!' साधुने आतुर शब्द सुना तो रुक गये। गोपालके हाथ




तो फँसे थे, संतके सामने जाकर उसने मस्तक झुकाया और सरल भावसे बोला-'लो! यह दूध पी लो और | मुझे उपदेश देकर कृतार्थ करो। मुझे भवसागरसे पार कर दो। महाराज! अब मैं तुम्हारे चरण नहीं छोडूंगा।' दूधका बर्तन और लाठी एक ओर रखकर वह संतके चरणोंसे लिपट गया। उसके नेत्रोंसे झरझर आँसू गिरने लगे।

संत एक बार तो यह सब देखकर चकित हो गये। फिर गोपालके सरल भक्तिभावको देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने गोपालसे घर चलकर स्नान करके दीक्षा लेनेको कहा। गोपाल बोला- 'महाराज! मुझे तो वनमें रहकर गायें चराना ही आता है। स्नान-पूजा तो मैं जानता नहीं। घर भी कभी-कभी जाता हूँ। मैं गवार हूँ। मुझसे बहुत बातें सधेगी भी नहीं मैं तो उन्हें भूल ही जाऊँगा। मुझे तो आप कोई एक बात बतला दें और अभी यहीं बतला दें। मैं उसका पालन करूँगा।'

ऐसे भोले भक्तपर तो भगवान् भी रीझ जाते हैं। संतने मानसिक भारत-शुद्धि आदि करके अपने कमण्डलुके | जलसे उसपर छाँट मारा और मन्त्र देकर बोले- 'देखो! अबसे तुम्हें जो कुछ खाना हो, भगवान् गोविन्दका भोग लगाकर ही खाया करो। इसी एक साधनसे तुमपर गोविन्द भगवान्की कृपा हो जायगी।'



गोपालने पूछा—'महाराज! मैं आपकी आज्ञाका पालन तो करूँगा; पर गोविन्द भगवान् मुझे कहाँ मिलेंगे कि उन्हें रोज भोग लगाकर तब भोजन करूँगा?"

संतने भगवान्के स्वरूपका वर्णन करके कहा- 'भगवान् तो सब जगह हैं, सबके भीतर हैं। तुम उनके रूपका ध्यान करके उन्हें पुकार लेना और उनको भोग लगाना।। भूलना मत! उन्हें भोग लगाये बिना कोई पदार्थ मत खालेना।' यह उपदेश देकर गोपालका दूध ग्रहण करके महात्माजी चले गये।

दोपहरको गोपालकी स्त्री आयी और छाक देकर चली गयी! गोपालको अब गुरुजीकी बात स्मरण आयी । एकान्तमें जाकर पत्तेपर रोटियाँ परोसकर तुलसीदल डालकर वे गोविन्द भगवान्का ध्यान करते हुए प्रार्थना करने लगे 'हे गोविन्द ! लो, ये रोटियाँ रखी हैं। इनका भोग लगाओ! मेरे गुरुदेव कह गये हैं कि भगवान्‌को भोग लगाकर जो प्रसादी बचे, वही खाना। मुझे बहुत भूख लगी है; किंतु तुम्हारे भोग लगाये बिना मैं नहीं खाऊँगा। देर मत करो। जल्दी आकर भोग लगाओ।'

गोपाल प्रार्थना करते-करते थक गये, सन्ध्या हो गयी; पर गोविन्द नहीं पधारे। जब भगवान्ने भोग नहीं लगाया, तब गोपाल कैसे खा ले। रोटियाँ जंगलमें उसने फेंक दीं और गोशाला लौट आया। गोपालका शरीर उपवाससे सूखता चला गया। इसी प्रकार अठारह दिन बीत गये। खड़े होनेमें चक्कर आने लगा। आँखें गड्ढोंमें घुस गयीं। स्त्री- पुत्र घबराकर बार-बार कारण पूछने लगे, पर गोपाल कुछ नहीं बताता। वह सोचता है- 'एक दिन मरना तो है ही, गुरु महाराजकी आज्ञा तोड़नेका पाप करके क्यों मरूँ। मेरे गुरुदेवकी आज्ञा तो सत्य ही है। यहाँ न सही, मरनेपर परलोकमें तो मुझे भगवान्‌के दर्शन होंगे।' उपवासको नौ दिन और बीत गये। आज सत्ताईस दिन हो चुके । गोपालके नेत्र अब सफेद हो गये हैं। वह उठकर बैठ भी नहीं सकता। आज जब उसकी स्त्री छाक लेकर आयी,तब जाना ही नहीं चाहती थी गोशालासे। उसे किसी प्रकार गोपालने घर भेजा। बड़ी कठिनतासे छाक परसकर वह भूमिपर लेट गया। आज बैठा न रह सका। आज अन्तिम प्रार्थना करनी है उसे वह जानता है कि कल फिर प्रार्थना करनेको देहमें प्राण नहीं रहेंगे! आज वह गोविन्द भगवान्को रोटी खानेके लिये हृदयके अन्तिम बलसे पुकार रहा है।

यह क्या हुआ? इतना तेज, इतना प्रकाश कहाँसे गोशालामें आ गया? गोपालने देखा कि उसके सामने गुरुजीके बताये वही गोविन्द भगवान् खड़े हैं। एक शब्दतक उसके मुखसे नहीं निकला। भगवान्‌के चरणोंपर उसने सिर रख दिया। उसके नेत्रोंकी धाराने उन लाल लाल चरणोंको धो दिया। भगवान्ने भक्तको गोदमें उठा लिया और बोले— 'गोपाल! तू रो मत देख, मैं तेरी रोटियाँ खाता हूँ। मुझे ऐसा ही अन्न प्रिय है। अब तू | यहाँसे घर जा। अब तुझे कोई चिन्ता नहीं। अपने बन्धु बान्धवोंके साथ सुखपूर्वक जीवन बिता! अन्तमें तू मेरे गोलोक धाम आयेगा।'

भगवान्ने उसकी रोटियाँ खार्थी और उसके लिये प्रसाद छोड़कर अन्तर्धान हो गये। गोपालने ज्यों ही उस प्रसादको ग्रहण किया, उसका हृदय आनन्दसे भर गया। उसकी भूख-प्यास, दुर्बलता, थकावट सव क्षणभरमें चली गयी। आज सत्ताईस दिनके उपवासकी भूख-प्यास तथा दुर्बलता ही नहीं दूर हुई, अनन्तकालकी दुर्बलता दूर हो गयी।

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