भक्त माल कथा माला || 26 || भक्त अढ़ैया जी का हास्यप्रद प्रसंग

भक्त माल कथा माला || 26 || भक्त अढ़ैया जी का हास्यप्रद प्रसंग

जो उपासक अनन्य चित्त से मेरा स्मरण करता है मैं उसके लिए सहज हो जाता हूं सहज प्राप्त हो जाता हूं। जिनको लगता है भगवत प्राप्ति बहुत कठिन है अरे तो कहीं ब्रह्म ऋषियों को मिलते हैं नहीं ये इतने कृपालु है कि बिल्कुल सहज है जो सहज हो जाए तो बहुत जल्दी मिल जाए कहीं गाय चराने वाले को मिल जाते हैं कहीं एकदम भोले भाले जिनको ज्ञान नहीं है उनको भी मिल जाते हैं।

 एक बहुत ही भोला नव युवक था अड़ैया नाम था उसका अढ़ाई कहते हैं ढाई किलो को पहला आहार उसका ढाई किलो का ही है आगे आप श्रद्धा रखें तो और प्लस हो सकता है लेकिन वो मतलब घर में माता-पिता पधार गए तो उसे कोई ढाई किलो आटे की कौन रोटी बना के दे थोड़ा जब उसके अंदर चेतना जागृत हुई तो जब कहीं ठोर नहीं मिलती तो संतो का आश्रम मिलता है ।

एक आश्रम में गए उन्होंने कहा हमको नौकरी में रख लो कोई सेवा में रख लो तुम्हारा नाम क्या है बोले अड़ैया कोई नाम है बोले गांव के लोग कते कक ढाई किलो हम पाते हैं तो ढाई किलो बोले तौल के ढाई किलो आटे का जब हम रोटी पाते हैं तब हमारी बाल भोग होता है आगे कोई श्रद्धा करे खीर पूरी पर ढाई किलो अन्न चाहिए तो भंडारा है तू रोज ढाई किलो क्या पाच किलो पावे 

क्या सेवा कर सकता है जो आप सेवा बताएंगे सिखाएंगे वो हम कर लेंगे तुम गाय चराया करो गाय भाई देखो हमारा वैष्णव सिद्धांत है तुम गाय चराने जा रहे हो हम यहां से तुम्हें अमनिया दे दिया करेंगे जंगल में तुम बनाओ और वही ठाकुर जी को भोग लगाओ और पाओ बिना भोग लगाए पाने का विधान हमारे आश्रम से आपका नहीं बन सकता बो हमको तो कुछ आता नहीं भोग लगाना क्या भोग लगाए उ जब आप बना लीजिएगा क्योंकि यहां ढाई किलो तुम्हारे लिए अलग से बन करके जाए हो तुम अपना बनाओ जो जो चाहो भंडारी से कह दिया दे दिया करो वहीं लकड़ी बनो वहीं बनाओ गाय चराओ और ठाकुर को भोग लगा के पाओ जितना मनावे आप पाओ पहले दिन भोग मिला बाटी बना गरीब आदमी था घर से तिरस्कृत था व सब जानता था बा उपला लिए बाटी बनाए दो चार आलू का भरता बनाया ढाई किलो आटे की बाटी उसने कहा गुरुदेव के ठाकुर आओ भोग लगाओ आके बड़े-बड़े ऋषि मुनि मंत्रों से आवान करते रहते हैं सरकार पधार नहीं केवल भाव से भोग लगाते इतने लीला बिहारी प्रभु आ गए श्री राम जी अया ने आंख खुरो लगी ऐसे तो आंख खोल के देखा नवीन मेघ कांति अरविंदा क् सारंग धनुष धारण किए हुए सामने खड़े कहा कौन हो आप राम जी कहते हैं आपने कहा गुरुदेव के ठाकुर आ तो गुरुदेव तुम्हारे जो है उनके हम ठाकुर जी हैं सही में आते हो तुम बोले आए तो गए और हम पाएंगे बड़ी खुशबू आ रही है आलू के भरता के तुम्हारी बाटी बनी हुई गुरुदेव ने कहा तो भोग लगा के पाना मतलब आप पाते तो है नहीं सुना है बोले नहीं नहीं पाते हैं पर सबका नहीं पाते हैं आप जैसे भक्त जब पुकारते तो बिल्कुल कुछ नहीं जानता इसलिए हम कह रहे बड़े-बड़े विद्वान और योगी जन रास्ता देखते रहते हैं हरिवंश महाप्रभु ने इसीलिए लिखा है मुनि मन ध्यान धरत नहीं पावत करत विनोद संग बालक भट विनोद करते प्रकट हो जाते बड़े-बड़े मुनियों के जो ध्यान में नहीं आते काश तो आप हमको ऐसे ही रखोगे क्योंकि आप आ गए तो आप भी तो प्रभु ने कहा जब तुम ढाई किलो पा सकते हो तो हम तो ढाई मन भी पा सकते हैं बोले हमको यह पता नहीं था कि गुरुदेव के ठाकुर इतने भूखे रहते पर आप अलग पत्तल में ले लो अपने पूरे पत्तल में तो हम आपको पाने दे बोले भोग थोड़ी ऐसे लगाया जाता है कि तुम अपना रखो तुम अपना रखो और बोले आंख मंद कर तुम बैठो जैसे तुम्हारे गुरु जी भोग लगाते हैं तो आंख मंद लेते हैं अब हम पाएंगे तुम आंख मूंद लिया चलो भाई पाओ सोचा एक आथ बाटी पा लेंगे बीच बीच में खोल के देखता जाता भगवान सब चाट गए भगवान बड़े करत विनोद संग बालक हरिवंश महाप्रभु कह करत विनोद संग बालक भट मुनि मन ध्यान धरत ने पावत आख खोला बोला आज

(05:36) हमको भूखे रखोगे बोले जानते हो तुम्हारे गुरु जी ने क्यों भोग लगाने के लिए कहा आज एकादशी है तुम्हारे गुरु जी के यहां एकादशी रह जाती है इसीलिए तुमको अ मनिया दिया वहा बनाया नहीं और तुम्हें रोज हम अनिया देंगे तुम रोज आओगे हम बुलाएंगे तो अब आप बुलाओ रोज तो आएंगे नहीं हम रोज रोज आएंगे बोले तो ठीक है अब अगली बार से बोले गुरु जी आपके ठाकुर जी आए थे हमारी सारी बाटी खा गए 5 किलो आज से हम ले जाएंगे ढाई किलो आपके ठाकुर जी के लिए ढाई किलो अपने लिए बहुत हंसी आई कि वहां कुंतल का सब भंडारी से कहा देखो पूछने की जरूरत नहीं जितना कह दे दो

(06:30) 5 किलो के हिसाब से आटा के अनुसार भरता बनाने के लिए आलू वगैरा सुबह से गाय लेकर निकल जाता जंगल में छोड़ दिए उपला में ने आग लगाई बनाया गोले गोले रख करके कोई समय तो लगता नहीं आग प पकी हो तो बहुत सुंदर बाटी बनती बाटी बनाया भुर्ता बना के पत्तल बड़े-बड़े जंगल के से कहा गुरुदेव के ठाकुर पधारो आ खोल के देखा साथ में सिया जी उसने उसने कहा यह कौन है बोले हमारी अर्धांगिनी है तो कल क्यों नहीं बताया था आपने कि अर्धांगिनी भी है यह भी पाती है बोले हमारे जैसा है जानकी जी बैठ गए राम जी बैठ गए बड़ा स कुछ में पर जानकी जी इतनी करुणा

(07:26) वात्सल्य बरस रही थी कि कुछ बोल नहीं पाए बस देखा ऐसे कहा पाओ गुरुदेव के ठाकुर प्रभु आराम से सिया जो खूब स्वाद बखान बखान करके पा वहां खोल कर देखता आज भी हम ढाई किलो अपने लिए लाए थे लेकिन दोनों पा गए गुरुदेव साढ़े किलो बोले क्यों आपके ठाकुर की पत्नी भी है ना कहां है तो दोनों आए थे किसी को विश्वास नहीं हो रहा था दे दो भाई अरे गाय को खवाए दे दो कुछ करेगा क्या कमी है यहां साढ़े किलो आटा ले ग अब तो समय लगा 3 बजे तक बाटी बन के तैयार हुई पत्तल में ऐसे गुरुदेव के ठाकुर पधारो बस उसको बुलाला होता था कि विनोदी प्रभु साथ में

(08:25) लखन जी राम जी सिया जी लखन यह कौन है बोले छोटे भाई आपके भाई भी है हां है पहले परिवार में कितने लोग हो पहले बता देते तो हम वो सब सब आ जाते हैं लक्ष्मण जी से कहा बहुत सरल भगत है नाराज मत होना चुपचाप पालो तीनों बैठे फिर बेचारा ऐसे ही रह गया जो चले गए तो पतलो में जो किनका रहता था एक अद्भुत आनंद अगले दिन गया बो गुरु जीी 10 किलो आटा चाहिए 10 किलो क्यों बोले आपके ठाकुर जी भी आते हैं उनके ठाकुरान भी आते हैं उनके परिवार के भाई भी आते हैं गोरे गोरे थे वो कैसे इसको कैसे अनुभव हो सकता है सियाराम लखन जी का बहुत हट किया 10 किलो

(09:29) टा लिया पहुच ग बनाया चार बज गए रखा उस मन में सोच रहा था आपकी संख्या ना बढ़ जाए कहा गुरुदेव के ठाकुर पधारो विशाल गदा भयंकर स्वरूप हनुमान जी महाराज आख खोला तो तीन स्वरूप में प्रभु खड़े हुए थे सियाराम लखन हनुमान जी चरणों में बैठे पूछा ये कौन है तो कहाय हमारे प्री सेवक है हनुमान जी एक बार आप अपने पूरे परिवार का अपने सेवकों का वो आप परचा बनाक दे दो गुरु जी को दे देंगे जाके हर बार एक बढ़ जाता है भगवान मुस्कुराए हनुमान जीका कुछ बोलना मत बहुत निराला भगत है बोले पाओ प्रभु तो पहले सियाराम जी पाए फिर जो प्रसाद है लक्ष्मण जी पाए फिर हनुमान जी पाए हनुमान

(10:33) जी सब पूरा बहुत निर्मल भाव से बनाया हुआ और निर्मल भोला भक्त पा गया अगली बार कहा गुरुदेव 5 किलो एक्स्ट्रा में रख दो एक नंबर बढ़ता जाता है आपके पहले ठाकुर जी आए फिर ठाकुरान जी आए फिर उनके भाई आए फिर इस बार तो बहुत भयानक रूप गधा लिए हुए लाल अरुण वर्ण शरीर का प्रकट हो रहा है जिधर देखो कंचन वर्ण की कांति मुख में अरुण वर्ण की कांति हमने पूछा आपके ठाकुर जी से तो उन्होंने कहा कि वो सेवक हैं उनको रोमांच हो रहा था कि क्या सही भगवान करुणा करके इसको दर्शन देते हैं अब अगली बार अगर यह बात करेगा के तो फिर अब हम इसकी परीक्षा लेंगे ले गया टंग बनाया

(11:30) सब आओ गुरुदेव अब तो पता था कोई आने वाला नहीं गुरुदेव के ठाकुर दो संख्या बढ़ गए आख खोल के देखा कहा यह कौन है तो कहा ये हमारे और भाई हैं इनका नाम भरत है इनका नाम शत्रुगन है पहले महाराज बता देते ना कि आपके और भाई है हमने कहा था आपसे प्रार्थना की थी पाव बचे नहीं ना वो दो संख्या ज्यादा हो अगली बार गुरुदेव से कहा कि गुरुदेव 20 किलो वाली बोरी में भर दीजिए अब हम दिन भर बनाएंगे क्योंकि आपके इतने ठाकुर हैं आज गया लेकर सब ऐसे रख कर के पत्तल डाल दिया कहा गुरुदेव के ठाकुर पधारो बिल्कुल नहीं बनाया आ गए प्रभु कहा कहां या तो खुशबू भी

(12:24) नहीं आ रही ना बाटी की ना भरता की बोले प्रभु आपके साथ पत्नी है ना सेवक भी है इतने दिन से तो हमारे हाथ का पाय आज हम पाना चाहते हैं आप बनाओ रुचि का बनाओ और पाओ प्रभु ने सिया जी की तरफ देखा कि अलवेला भग सिया जी ने कहा अनंत सामर्थ शली शक्तियों की स्वामिनी बोले प्रभु देखो हमने ना उपला बना ना लकड़ी आपके सेवक है ना इनसे बोलो हनुमान जी से कहा कि आप उपला और लकड़ी इकट्ठा करो भाई आदेश है भगत का लक्ष्मण जी चूल्हा जला रहे हैं व्यवस्था आग की और सिया जू के आंखों में आंसू भी आ रहे धुआ भी लग रहा है पर बना रहे उसने कहा बनाओ हम गाय एकत्रित करके आ

(13:19) रहे हैं भागा व आश्रम में गया बोले गुरुदेव आज पूरे परिवार सहित हमने फसा लिया है आपके ठाकुर उन्होने कहा क्या फसा लिया है बोले बड़े ठाकुर छोटे ठाकुर सेवक उनकी पत्नी और दो भाई उनके पूरा परिक सब बना रहे हैं रोटी बाटी सब महाराज आप चलो आपको शंका होती थी आज उनके हाथ क पाएंगे तो उनको लगा कि पागल आदमी राम जी लखन जी भरत शत्रुगन सिया जी हनुमान जी ये बड़े-बड़े योगियों के ध्यान में आने वाले नहीं ये कैसे एक गवा आदमी जिसको कभी कोई नाम जपना नहीं आया कोई ग्रंथ नहीं आया उसके सामने पर भगवान की दयालुता पर संशय नहीं करना चाहिए चलकर

(14:09) देखते हैं ही वहां गए चूंकि निरंतर भजन परायण थे वहां गए तो पूरा राम दरबार उपस्थित और बड़ा सुंदर व्यंजन स्वयं जानकी जी बना रहे प्रभु के चरणों में साष्टांग दंडोत कहा प्रभु लीला समझ में नहीं आई भगवान ने कहा देखो जो ज्ञानी भक्त है उनके लिए मैं अत्यंत तर्क के द्वारा भी पकड़ में नहीं आता जो विद्वान है उनकी विद्वता मुझे छू नहीं सकती लेकिन जो दीन है और भोले हैं उनके सामने में अपने इस दिव्यता इस महानता को देखो तुम्हारे इस भक्त की आज्ञा पर हमारा पूरा परिकर लगा हुआ है सेवा में ठाकुर जी की कृपा से गुरुदेव का प्रताप जो ऐसा सौभाग्य मिला

(15:08) परोसने में दोनों गुरु और शिष्य पाने में प्रभु बाद में जब प्रभु ने पा लिया तो जानकी जी ने उष्टा मृत प्रभु का लेकर और कहा देख आज तक तू मुझे देख नहीं पाया देखते हुए भी इसीलिए कृपालु है एकांत में श्री तुलसीदास जी रोकर प्रार्थना करते हैं जनक सुता जग जननी जानकी अतिशय प्रिय करुणा निधान की ताके जुग पद कमल मनाऊ जा सु कृपा निर्मल मति पाऊ करुणा निधान प्रभु श्री राम की अतिशय प्राण संजीवनी मरी प्राण प्रिय सियाज की सीताज के चरणों की वंदना करता हूं जिससे प्रभु को पसंद है निर्मल मति निर्मल मन

(16:13) उनकी कृपा से मेरा मन निर्मल हो जाए मति निर्मल हो जाए ता सु कृपा निर्मल मति पा जीही जानकी जी ने अपने कर कमल से उस बालक को पवाया अड़ैया को त्रिगुण का मल नष्ट हुआ हो सच्चिदानंद प्रभु का साक्षात्कार निहाल हो गया कब कौन से गुण पर कैसे जीज जाए विश्वास कीजिए बस आवश्यकता सहज होने की हमारी स्वामिनी जो सहज है सहज होने की आवश्यकता है जिसको ये कि कहां मुझे ऐसा दुर्लभ सौभाग्य देखो कोई नाम जप उसके अंदर नहीं कोई पाठ नहीं कुछ नहीं गुरुदेव ने कहा कि भोग लगा के पाना है भगवत साक्षात्कार हो गए


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