भक्त माल कथा माला || 22 || भगवद्भक्त जरत्कारु ऋषि
भक्त माल कथा माला || 22 || भगवद्भक्त जरत्कारु ऋषि न हि धर्मफलैस्तात न तपोभिः सुसञ्चितैः। तां गतिं प्राप्नुवन्तीह पुत्रिणो यां व्रजन्ति वै॥ (जो फल विविध धर्मों से तथा बहुत-से तप से प्राप्त नहीं हो सकता उसे धर्म पूर्वक पुत्र प्राप्त करने वाले पुरुष प्राप्त कर लेते हैं) पूर्वकाल में ऋषियों की अनेक संज्ञाएँ होती थीं। उन्हीं में एक यायावर नाम का ऋषिवर्ग था। उनके वंश में एक ही पुत्र था, जिसका नाम जरत्कारु था। जरत्कारु के माता-पिता परलोकवासी हो गये थे। इसलिये वे सदा जंगलों में रहते और भाँति-भाँति के तप किया करते थे। विविध प्रकार के तप करने से उनका शरीर क्षीण हो गया था, वे कभी फल-फूल ही खाकर रह जाते, कभी सूखे पत्ते ही चबा जाते, कभी वायु पीकर ही रह जाते। इस प्रकार वे हजारों वर्ष तक तपस्या ही करते रहे। एक दिन वे जंगल में कहीं जा रहे थे, उन्होंने वहाँ एक बिना पानी के कूप में कुछ द...