श्रीनाथ जी के 'अष्ट सखा

🦚 श्रीनाथ जी के 'अष्ट सखा' (अष्टछाप): नित्य गोलोक के ८ सखा, अष्टयाम सेवा और उनकी अमर वाणियाँ 🦚
​जय श्री राधे! 'श्री धाम वृंदावन' पेज के सभी सुधीऔर रसिक भक्तों का आज की इस ज्ञानवर्धक शृंखला में हृदय से स्वागत है।
जब भी ब्रज मण्डल में श्रीनाथ जी (साक्षात गोवर्धन नाथ) की 'अष्टयाम सेवा' का वर्णन होता है, तो आठ महान रसिक संतों का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। पुष्टिमार्ग में इन्हें 'अष्ट सखा' या 'अष्टछाप' कहा जाता है। आइए, गोलोक धाम के इन नित्य सखाओं के दिव्य चरित्र, उनकी महत्ता और उनके द्वारा रचे गए अद्भुत पदों का प्रामाणिक दर्शन करें:

​🌺 अष्ट सखाओं का आध्यात्मिक रहस्य: गोलोक के नित्य सखाओं का अवतार 🌺

​'चौरासी वैष्णवन की वार्ता' और 'दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता' जैसे प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार, ये आठों संत कोई साधारण कवि नहीं थे। नित्य निकुंज (गोलोक धाम) में श्री कृष्ण के जो ८ मुख्य सखा हैं (जो उनके साथ खेलते और गाते हैं), पुष्टिमार्गीय वार्ता परंपरा और रसिक आचार्यों की व्याख्याओं में इन अष्टछाप कवियों को श्रीकृष्ण के नित्य सखाओं का अंश माना गया है। लगभग संवत १६२२ के आस-पास, श्री वल्लभाचार्य जी के सुपुत्र श्री विट्ठलनाथ जी (श्री गोसाईं जी) ने इन ८ सर्वश्रेष्ठ रसिक भक्तों की मंडली की विधिवत स्थापना की। आइए जानते हैं कि कौन सा संत किस गोलोकीय सखा का अंश है, अष्टयाम सेवा में उनका क्या स्थान है और उनका क्या योगदान रहा

पुष्टिमार्ग की कीर्तन परंपरा में अष्टछाप कवियों के पद अष्टयाम सेवा के विभिन्न दर्शनों में गाए जाते हैं।
​🦚॥ श्री वल्लभाचार्य जी (महाप्रभु) के ४ सेवक ॥🦚

​🪷१. श्री सूरदास जी (अष्टछाप के जहाज):🪷

​• गोलोकीय स्वरूप: ये भगवान के 'सखा' नामक अंतरंग मित्र के अवतार माने जाते हैं।

​• अष्टयाम सेवा (शयन दर्शन): सूरदास जी को सभी प्रहरों का सिरमौर माना जाता है, परन्तु 'शयन' के समय यशोदा भाव से प्रभु को मीठी लोरियां गाकर सुलाने की मुख्य सेवा इन्हीं की है।

​• विशेषता एवं योगदान: प्राकट्य से ही प्रज्ञाचक्षु (नेत्रहीन) होने के बावजूद ब्रजभाषा साहित्य में इनका अवदान सबसे बड़ा है। मान्यता के अनुसार लगभग इन्होंने सवा-लाख पदों वाले 'सूरसागर' की रचना की। बाल-लीला और वात्सल्य रस का जैसा सूक्ष्म दर्शन इन्होंने किया, वैसा विश्व साहित्य में दुर्लभ है।

​🙌प्रामाणिक पद: 🙌
​🙌मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो
मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो।
ख्याल परे ये सखा सबै मिलि,
मेरे मुख लपटायो॥
देख तुहिं सींके पर भाजन,
ऊँचे धरि लटकायो।
हौं जो कहत नान्हें कर अपने,
कैसे करि पायो॥🙌

​🪷२. श्री कुम्भनदास जी:🪷

​गोलोकीय स्वरूप: ये भगवान के 'अर्जुन' नामक सखा के अवतार हैं।

​अष्टयाम सेवा (राजभोग दर्शन): दिन का सबसे भव्य दर्शन। कुम्भनदास जी प्रभु के ऐश्वर्य, छप्पन भोग और राजसी ठाट-बाट का गान करते हैं।
​विशेषता एवं योगदान: ये परम विरक्ति और निष्काम भक्ति के सबसे बड़े आदर्श हैं। निर्धनता में जीवन बिताया लेकिन सम्राट अकबर द्वारा फतेहपुर सीकरी बुलाकर दिए गए राज्याश्रय (सम्मान) को यह कहकर ठुकरा दिया कि "

​प्रामाणिक पद: 🙌 "
​🙌संतन को कहा सीकरी काम
संतन को कहा सीकरी काम।
आवत जात पनहियाँ टूटी,
बिसरि गयो हरि नाम॥
जिनको मुख देखे दुख उपजत,
तिनको करन परनाम।
कुंभनदास लाल गिरधर बिनु
यह सब झूठो धाम॥🙌

​🪷३. श्री परमानंददास जी:🪷

​गोलोकीय स्वरूप: ये भगवान के 'तोक' नामक सखा के अवतार हैं।

​अष्टयाम सेवा (मंगला दर्शन): प्रातः काल वात्सल्य भाव से बाल-कृष्ण को बड़े प्यार से जगाने की सेवा परमानंददास जी
की है।

​विशेषता एवं योगदान: सूरदास जी के बाद वात्सल्य रस के ये सबसे बड़े रसिक माने जाते हैं। इनके रचित पदों का संग्रह 'परमानंद सागर' पुष्टिमार्ग का अमूल्य रत्न है। इनके पद सुनकर स्वयं महाप्रभु वल्लभाचार्य जी कई दिनों तक भाव-समाधि में चले जाते थे।

​प्रामाणिक पद: 🙌
​🙌भोर भयो प्यारे।
उठो नंदकिशोर ललित
नैनन के तारे॥
माता यशोदा द्वार खड़ी
करत पुकारे।
परमानंद प्रभु उठो
भोर भयो न्यारे॥🙌
​"जागिये गोपाल लाल, आनंद निधि नन्द बाल। जसुमति कहै बार-बार, भोर भयो प्यारे॥"

​🪷४. श्री कृष्णदास जी ,🪷
​गोलोकीय स्वरूप: ये भगवान के 'ऋषभ' नामक सखा के अवतार हैं।

​अष्टयाम सेवा (उत्थापन दर्शन): दोपहर की नींद के बाद जब प्रभु उठते हैं, तो उनकी आलस भरी और मीठी छवि का वर्णन कृष्णदास जी करते हैं।

​विशेषता एवं योगदान: ये एक उत्कृष्ट रसिक कवि होने के साथ-साथ अत्यंत चतुर प्रशासक भी थे। श्रीनाथ जी के मंदिर के प्रथम सेवक और अधिकारी होने का गौरव इन्हें ही प्राप्त है। इनके रचे हुए निर्विवाद स्फुट पद आज भी पुष्टिमार्ग में 'कृष्णदास कीर्तन' के रूप में बड़े भाव से गाए जाते हैं।

​प्रामाणिक पद:
​🙌मो मन गिरिधर छवि पै अटक्यो
मो मन गिरिधर छवि पै अटक्यो।
ललित त्रिभंगी अंगन छवि पर
चिरकाल रहि लटक्यो॥
सजल स्याम घन बरन ललित तन
नयन कमल दल झलक्यो।
कृष्णदास प्रभु रूप निरखि के
मन हरषित भटक्यो॥🙌

​🦚॥ श्री विट्ठलनाथ जी (श्री गोसाईं जी) के ४ सेवक ॥🦚

​🪷५. श्री गोविन्दस्वामी जी:🪷

​गोलोकीय स्वरूप: ये भगवान के परम सखा 'श्रीदामा' के अवतार माने जाते हैं।

​अष्टयाम सेवा (ग्वाल दर्शन): सखा भाव की प्रधानता। गोविन्दस्वामी जी ग्वाल-बालों के साथ ठाकुर जी के वन जाने का कीर्तन करते हैं।

​विशेषता एवं योगदान: ये अष्टछाप के सबसे बड़े 'संगीत-सम्राट' थे। ब्रज में 'कदम्ब खंडी' नामक स्थान इन्हीं की भजन-स्थली है। परंपरा में कहा जाता है कि तानसेन भी इनके मधुर कीर्तन से प्रभावित थे, हालांकि ऐतिहासिक रूप से तानसेन के गुरु स्वामी हरिदास जी माने जाते हैं।

​प्रामाणिक पद:
🙌प्रात समय उठि सोवत जसुमति, कान्हहिं टेरि जगावै।
गोविन्द प्रभु सखा जोहि रहे, दाऊ भइया बुलावै॥🙌

​🪷६. श्री छीतस्वामी जी:🪷

​गोलोकीय स्वरूप: ये भगवान के 'सुबल' नामक सखा के अवतार हैं।

​अष्टयाम सेवा (भोग दर्शन): विश्राम के बाद हल्के फल-मेवे के भोग के समय छीतस्वामी जी ब्रज की महिमा का गान करते हैं।

​विशेषता एवं योगदान: इनका जीवन गुरु-कृपा का सबसे बड़ा उदाहरण है। मथुरा के एक अत्यंत क्रोधी पंडा से लेकर परम रसिक संत बनने तक की इनकी यात्रा अद्भुत है। ब्रज-रज, श्री यमुना जी और श्री गिरिराज जी की महिमा के इनके पद अत्यंत प्रसिद्ध हैं।

​प्रामाणिक पद: 🙌
​🙌अहो बिधना तोसों अँचरा पसारि मागौं,
जनम-जनम दीजो याही ब्रज बसनो।
श्री जमुना को जल, गोवर्धन को तल,
वृंदावन-रज में सदा ही रहनो॥🙌
​,
🪷७. श्री चतुर्भुजदास जी:🪷

​गोलोकीय स्वरूप: ये अष्ट सखा श्री कुम्भनदास जी के सुपुत्र थे और भगवान के 'विशाल' सखा के अवतार हैं।

​अष्टयाम सेवा (संध्या-आरती दर्शन): गायों को चराकर लौटते हुए श्याम सुंदर की नज़र उतारने का भाव चतुर्भुजदास जी गाते हैं।

​विशेषता एवं योगदान: ये  प्राकट्य से ही भगवत्-कृपा प्राप्त  थे इनके रचित 'चतुर्भुज कीर्तन संग्रह', 'कीर्तनावली' और 'दानलीला' जैसे ग्रंथ गोपी-भाव और ब्रज-रस के अनुपम उदाहरण हैं।

​प्रामाणिक पद:
​🙌आवत गोधन साँझ समै।
सखा संग खेलत लाल गोवरधन, गावत गोपी-जन प्रेम रमै॥
दास चतुर्भुज प्रभु की छबि निरखत, वारत प्राननि नैन जमै॥🙌

​🪷८. श्री नन्ददास जी:🪷

​गोलोकीय स्वरूप: ये भगवान के 'भोज' नामक सखा के अवतार हैं।

​अष्टयाम सेवा (श्रृंगार दर्शन): ठाकुर जी को स्नान कराकर वस्त्राभूषण धारण कराने और उनके रूप-सौंदर्य का वर्णन करने की सेवा नन्ददास जी की है।

​विशेषता एवं योगदान: अष्टछाप के कवियों में इनका शब्द-ज्ञान और काव्य-रचना सबसे अधिक अलंकृत (सजी हुई) थी। इसी कारण कहावत बनी— "और कवि गढ़िया, नन्ददास जड़िया।" इनकी रचना 'रास पंचाध्यायी' हिंदी साहित्य का स्वर्ण कलश मानी जाती है।

​प्रामाणिक पद: 🙌
​🙌ताही छिन उडुराज उदित रस-रास-सहायक।
कुंकुम-मंडित-बदन प्रिया-जनु रजनी-नायक॥
नंददास प्रभु रसिक-शिरोमनि, त्रिभुवन-पति छबीले।
सखा मंडली मध्य बिराजत, नटवर वेष रसीले॥🙌

​🌺 विस्तृत निष्कर्ष 🌺
लगभग संवत १६२२ में स्थापित यह 'अष्टछाप' केवल आठ कवियों का समूह नहीं था, बल्कि यह ब्रजभाषा, भारतीय शास्त्रीय संगीत और विशुद्ध भक्ति का एक ऐसा त्रिवेणी संगम था, जिसने संपूर्ण विश्व के साहित्य को समृद्ध किया। इन अष्ट सखाओं ने ब्रज की लोकभाषा को साहित्य के सर्वोच्च शिखर पर बैठा दिया।आज ५०० वर्ष बीत जाने के बाद भी, पुष्टिमार्गीय मंदिरों में ठाकुर जी को केवल अन्न का भोग नहीं लगता, बल्कि इन्हीं अष्ट सखाओं के रचे गए पदों के 'भाव' का भोग लगता है। जब तक सूर्य और चंद्र रहेंगे, ब्रज के कण-कण में  इन सखाओं की रसमयी वाणियाँ गूंजती रहेंगी। इन महान सखाओं के श्रीचरणों में हमारा कोटि-कोटि वंदन है!

​📖 प्रामाणिक संदर्भ एवं साक्ष्य 📖
​यह संपूर्ण जानकारी निम्नलिखित सर्वमान्य ऐतिहासिक ग्रंथों पर आधारित है:
१. 'चौरासी वैष्णवन की वार्ता' (श्री गोकुलनाथ जी द्वारा रचित - महाप्रभु के सेवकों का वृत्तांत)
२. 'दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता' (श्री गोसाईं जी के सेवकों का वृत्तांत)
३. 'अष्टछाप और वल्लभ सम्प्रदाय' (इतिहासकारों एवं रसिकों के सर्वमान्य शोध)

विभिन्न पुष्टिमार्गीय मंदिरों और कीर्तन परंपराओं में अष्टयाम सेवा के पदों के क्रम में कुछ भिन्नताएँ भी मिलती हैं।

​🌸॥ हमारा प्रयास एवं करबद्ध निवेदन ॥🌺
हमारे इस 'श्री धाम वृंदावन' पेज का एकमात्र ध्येय ब्रज के रसिक संतों की दिव्य महिमा, उनके अलौकिक चरित्रों और ब्रज के पावन तीर्थों का रस आप सभी भगवद-भक्तों तक पहुँचाना है। हम पूरी निष्ठा से यह प्रयास करते हैं कि यहाँ दी गई हर जानकारी पूर्णतः प्रामाणिक हो और हमारे प्राचीन ग्रंथों, रसिकों की वाणियों तथा ऐतिहासिक साक्ष्यों पर ही आधारित हो।परन्तु, ब्रज का यह रस-सागर अत्यंत अथाह है और हमारी बुद्धि बहुत ही सीमित। इतने गहन इतिहास और ग्रंथों के अध्ययन में, या शब्दों को पिरोने में यदि अनजाने में हमसे कोई त्रुटि, शब्द-दोष या मानवीय भूल रह गई हो, तो हम आप सभी सुधी जनों और वैष्णवों के श्रीचरणों में करबद्ध क्षमा प्रार्थी हैं।यदि आपको किसी जानकारी में कोई भी त्रुटि प्रतीत हो, तो कृपया बड़े भाव से सप्रमाण हमारा मार्गदर्शन अवश्य करें। हम आपके उस प्रेमपूर्ण सुधार को प्रभु का प्रसाद समझकर माथे पर धारण करेंगे और सहर्ष उसे स्वीकारेंगे। आपके इस सहयोग और मार्गदर्शन के लिए हम सदैव आपके आभारी रहेंगे।


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