भक्त माल कथा माला || 25 || भक्त रामदास जी की अनसुनी कहानी

 भक्त माल कथा माला ||  25 || 

भक्त रामदास जी की अनसुनी कहानी


 बड़ा सुंदर प्रसंग है इनका नाम है भक्त रामदास जी और ये दक्षिण में गोदावरी के किनारे कनकावती नाम की नगरी थी वहां ये रामदास जी रहते थे। यह चतुर्वर्ण के कुल के थे और यह अपने कुल परंपरा के अनुसार जो गृहस्थी की सेवा है वही सेवा करते थे

अत्यंत दैन्य और अत्यंत गरीब सीधे-साधे, पूरे शरीर में ठीक से पहनने के लिए वस्त्र भी नहीं थे। खाने के लिए कोई ऐसी व्यवस्था नहीं थी अगर आज वे सेवा ना करें जो उनके कुल की है तो दूसरे दिन उनके यहां रसोई नहीं जलेगी। ऐसी कोई अन्न की भी व्यवस्था नहीं थी रोज का रोज कमाना और अपने परिवार का भरण पोषण करना आए हुए अतिथि की सेवा करना और सत्संग से बड़ा प्यार था उनको यह दंपति एक मात्र केवल भगवत आश्रित कोई संपत्ति नहीं किसी भी तरह का किसी से कोई व्यवहार नहीं क्योंकि व्यवहार लोग धनी मानी से करते हैं। गरीब अकिंचन से नहीं करते हैं। इनके एक लड़का था और यह सदैव अपने कुल की जो सेवा है वो जूता गांठने की वो बीच बाजार में जाकर बैठते किसी के फटे पुराने जो पादुका है उसको सिलते या कहीं ऐसा संयोग बन जाता तो नई पादुका बना के बेचते जो उससे मिलता उससे अपने परिवार का पोषण करते और सत्संग जाते। यह बड़े महिमा की बात है जब कहीं सत्संग में रुचि होने लगे तो समझ लेना कि अब प्रभु आपके ऊपर बरस पड़े हैं सत्संग में रुचि होना अर्थात भगवत प्राप्ति का मार्ग खुल गया है क्योंकि सत्संग सुनने वाले को निश्चित निश्चित अविद्या का नाश करके भगवत अनुराग की प्राप्ति होती ही होती है। 


सत्संग से विवेक होता है विवेक जो है मोह का नाश कर देता है सत्संग में सबसे पीछे जाकर बैठते और जो वैष्णव भगवत चर्चा करते ये उनके मुख की तरफ ताकते रहते कोई पढ़े लिखे तो थे नहीं। तो जो बात समझ में आती, आती नहीं तो बस सुनते और जब भगवन नाम कीर्तन होता तो नाचने लगते उनका साहस भी नहीं हुआ कि उन वैष्णव से कह सके कि आप हमें दीक्षा दीजिए बस सत्संग में जो नाम कीर्तन होता उसी ना कोन् पकड़ लिया बस मन में बार-बार कृष्ण गोविंद कृष्ण गोविंद ऐसा बोलते और एकांत में व कभी-कभी पुकार उठते हृदय से 

हे हरि मैं जैसो तैसो तेरो हे हरि मैं जैसो तैसो। इतना ही याद हुआ बस इतना ही पद नाम से शास्त्र स्वाध्याय नाम से ब इत नहीं हरि मैं जैसो तैसो तेरो और सत्संग में नियमित जाकर बैठना कुछ समझ में आए या ना आए जब नाम कीर्तन होता तो बड़ा आनंद मिलता और वही कृष्ण कृष्ण गोविंद गोविंद हरि हरि और बीच-बीच में आह भर के हरि मैं जैसो तैसो तेरो मैं जैसा वैसा आपका हूं मैं जैसा हूं हे हरि आपका हूं ।

तीन प्राणी स्वयं पत्नी और पुत्र जो इस सेवा से उनको अर्थ मिलता उससे परिवार का पोषण कोई अतिथि पधारता उस अतिथि की सेवा और जो सत्संग में जाते हैं नियमित बस उनके हृदय में एक बात बैठ गई कैसे, कैसे इस जगत के मालिक को रिझाऊं ना तो मेरे में कोई योग्यता है ना पढ़ा लिखा हूं ना धन है ना पवित्रता है मैं किसी योग्य नहीं कैसे रिझाऊं क्या मेरे से कभी प्रभु रीज सकते हैं बिल्कुल बिल्कुल अनपर कोई शास्त्र का ज्ञान नहीं कोई कोई पवित्रता का ज्ञान नहीं कोई पद्धति का ज्ञान नहीं आप देखिए प्रभु केवल भक्ति से प्रसन्न होते जानते भी नहीं हो कि भक्ति किसे कहते हैं।

आगे इनके प्रसंग में देख एकदम भोले भले जानते भी नहीं भगवान की कोई भक्ति भी होती बस सत्संग में पहुंच जाना जैसे सत्संग हो रहा है पहली बार गए बैठ गए अच्छा लगा क्योंकि सत्संग का एक जो वातावरण होता है कोई कितना भी अज्ञानी विषय जी हो उसके हृदय को परम शांति शीतलता तभी नींद आ जाती है अगर वह किसी को नींद ना आती हो तो सत्संग में बैठ जाओ इंद्रियों को विश्राम मिलता है भले वो सोच समझ ना हो तो भी उसको विश्राम मिल जाएगा । वो नींद में चला जाए अगर वह सतोगुण है भगवत भक्त है तो भाव में चला जाएगा और अगर उसकी पहुंच नहीं हुई भाव में तो व विश्राम को प्राप्त होता है। 

समस्त इंद्रिया सुखद अनुभव करने लगती धीरे धीरे विवेक बढ़ता है अब वह बीच बीच में जैसे जूता गांठ रहे तो बीच बीच में एकदम रुक जाते और पुकार उठते हरि मैं जैसो तैसो तेरो हरि मैं जैसो तैसो तेरो 

कैसी बढ़िया बात इससे बढ़कर कोई बात ही नहीं कोई बात ही नहीं मैं जैसा हूं आपका हूं ह मैं आपका हूं जैसा बस बारबार कृष्ण गोविंद कृष्ण गोविंद कृष्ण गोविंद बीच बीच में आह भर कर हरि मैं जैसा हू आपका हू हरि में जैसो तसो तेरो यह बात उनको को इतनी प्यारी लगी हरि में जैसो तैसो तेरो अब ये इसी को गुनगुनाते सदैव इसी को गुनगुनाने लगे हरी मैं जैसो तैसो तेरो निरंतर इस पंक्ति को गुनगुनाना और वह अपने कार्य को करना उनके हृदय में इस पंक्ति का मर्म उतरा जो हम बोलते हैं जो हम सुनते हैं वही मनन होता है जो मनन होता है वही हमारे अनुभव का विषय बन जाता है जैसे हम विषय वार्ता सुने विषय वार्ता बोले विषय चिंतन करें तो हम विषय हो जाते हैं कामी हो जाते हैं यदि हम नाम कीर्तन सुने गुण कीर्तन सुने उसी का गायन करें उसी का चिंतन करें तो हम भक्त हो जाते हैं हम भगवत प्रेमी हो जाते हैं तो वे बार-बार इसी का गान करते हुए इसी का चिंतन करते हुए इसके मर्म को प्राप्त हो गया मर्म को प्राप्त होने का मतलब भगवत संबंध हृदय में आ गया मैं हरि का हूं हरि जैसो तैसो तेरो यह पंक्ति गुनगुनाना सचमुच चमत्कार हो गया ।

उसके मन की स्थिति का परिवर्तन इस सूत्र ने कर दिया हरि में जैसो त सो तेरो प्रभु तो भाव के भूखे हैं वे श्रद्धा रहित प्रेम रहित अपनापन रहित कोई वेद मंत्रों का कितना भी उच्चारण करे कितना भी पाठ करे तो उसका पुण्य होगा भगवान थोड़ी प्रसन्न हो जाएंगे प्रभु तो केवल केवल भाव आपके आंतरिक भाव को स्वीकार करते हैं रामदास जी का एक विशुद्ध सरल भाव हरि मैं जैसो तैसो तेरो कभी-कभी वो आंसू बहाते हुए यह गान करने लगते हरि में जैसो तैसो तेरो ।

अब एक दिन की बात कि एक चोर मंडली किसी धनी मानी भक्त के घर में गई जो गृहस्थ भक्त होते हैं खूब धन संपदा थी तो उनके यहां साली ग्राम भगवान सिंहासन में थे सिंहासन स्वर्ण का था छत्र भी स्वर्ण का तो चोरों ने सब कुछ चुराया सिंहासन छत्र सहित शालिग्राम भी चुरा लिए तो सिंहासन और छत्र तो बेचने के काम में आ गया शालिग्राम भगवान उनके किस काम के तो उसने स्वाभाविक जिसके बट में पड़े थे सिंहासन और छत्र और भी सब सामग्रियां थी जो आपस में बांट ली थी उस चोर ने विचार किया कि यह पत्थर हमारे किस काम में आएगा तो जा रहा था तो देखा बाजार में वो जूता गाठ रहे थे रामदास जी भाव में बार-बार ऐसे गाटते गाटते रुक जाते और क हे हरि मैं जैसो तैसो तेरो कैसी रसमय स्थिति आहा 

अब वो चोर विचार किया कि वो जैसे जूता ठने में कुछ ज्यादा हो जाए धागा या चमड़ा तो उसे काटने के लिए उनके पास जो औजार होते हैं उनको पत्थर से घसते हैं उसने विचार किया कि पत्थर य मेरे काम में तो आने वाला नहीं क्योंकि उसके अंदर कोई भाव ही नहीं था कि भगवान है उसने रामदास जी से कहा कि सुनो हमें अगर तुम जूता दे दो तो तुम्हारे घसने के लिए हमारे पास एक बहुत चिकना पत्थर है हम दे दे तो रामदास जी ने जो नए जूते बनाए थे वो उसे दे दिए बिल्कुल सरल स्वभाव भोले भाले भक्त और वह साली ग्राम भगवान उनको दे दिया यह कह के दिया कि पत्थर तुम्हारे घिसने के काम में आएगा अब वो देखा तो कि ये चिकने है पर जब उसमें अपना औजार घसा तो और बढ़िया धार निकली उसकी उसको लगा चलो जूते के बदले में अच्छा पत्थर मिल गया बढ़िया है 

अब वो उसमें घिसता और कभी-कभी आंसू बहते हुए हे मैं जैसो तैसो तेरो देखो सूक्ष्मता की बात है उसके आंसू गिरते साली ग्राम में अब जब जोर से घसना होता तो हाथ में रख के थोड़ी घसने बनता है कुछ और मुद्रा होती है इसमें स्पष्ट लिखा हुआ है वह मुद्रा दोनों चरणों के बीच में शालिग्राम जी को फसा के फिर घसते आप जरा देखिए भाव का विषय कैसा होता है अब वो हृदय में बड़ा आनंद मिलता क्योंकि भगवान चक्र चिन्ह से चिन्हित शालिग्राम भगवान को इससे कोई मतलब नहीं है य तुम क्या कर रहे हो बड़े बड़े रिजवार बड़े लीला बिहारी है अब चोर के द्वारा दिए हुए शालिग्राम का यहां यह प्रयोग हो रहा है दूसरे की पादुका गाठना उसमें धागा बढ़े तो उसे जो काटते हैं वो यंत्र उनका उसको उसम रगड़ दे ये एक दिन कोई पंडित जी उधर अपनी पादुका ठीक कराने आए तो जब दृष्टि गई तो उन्होने देखा कि अरे ऐसे शुभ चिन्हो से युक्त जिसमें चक्र का चिन्ह बना हुआ है ऐसे चिन्ह से तो साक्षात शली ग्रम है ब्राह्मण ने कहा तुम्हारी बुद्धि मारी गई है यह तुम क्या कर रहे हो तो उन्होंने कहा अपने पत्थर से अपने औजार की धार निकाल रहे हैं। ब्राह्मण समझ गया मूढ़ आदमी इससे क्या बात करें तो  कहा तुम जितने रुपए चाहो मैं तुम्हे रुपए दूंगा यह पत्थर हमें दे दो। यह पत्थर हमें बहुत आवश्यक है दे दो समझा कि इसको समझाए कि भगवान है तो इसके क्या समझ में आएगा जब ऐसी हालत है कि दोनों पैर रखकर फिर इसमें अपना औजार घिस है यह तो साक्षात साली ग्राम भगवान है ।

ब्राह्मण ने सोचा कि जैसे बंदर को हीरा मिल जाए तो क्या जाने ऐसे क्या जाने बेचारा उन्होंने कहा कि तुम जितना रुपया चाहो मैं तुम्हें दे सकता हूं तो यह हमें पत्थर तुम दे दो । मुझे अच्छा लगा यह पत्थर मुझे दे दो इसलिए मैं ले रहा हूं। अब उसने कहा कि मेरे तो बहुत काम में आए हैं पत्थर लेकिन तुम्हारी इच्छा है तो मैंने ना पैसे देकर लिए हैं और ना तुमसे पैसे लेना है आप ले जाओ कोई बात नहीं है। 

ब्राह्मण यह सुन कर के आनंदित हुआ और उसने वो शालिग्राम भगवान ले लिए ब्राह्मण से कहा कि जो मैं मेहनत करता हूं जूता गाठ करके उससे जो मिलता है मेरे परिवार का उससे भरण पोषण होता है मुझे इस पत्थर के बदले में कोई धन नहीं चाहिए ले जाओ कोई मुझे हवेली नहीं बनवानी कोई मुझे सुख पूर्वक नहीं रहना क्योंकि अगर सुख पूर्वक रहूंगा तो मैं भूल जाऊंगा प्रभु को इसीलिए मैं जानबूझ कर के उतना ही कमाता हूं जितने से रोज उधर भर जाए ।

इतना कह कर के रामदास जी ने वो पत्थर दे दिया जो शालिग्राम भगवान है पंडित जी ने देखा ल सद्गुणों से युक्त शालिग्राम बड़े आनंदित हुए घर में आए सुंदर जल से दुग्ध से अभिषेक कराया सुंदर सिंहासन में विराजमान किया सोउपचार मंत्रों से पूजन किया और यह विचार किया कि भगवान मेरी इस चेष्टा से प्रसन्न होंगे क्योंकि वहां क्या सुख पा रहे थे और यहां हम उनको क्या सुख पहुंचा रहे हैं मंत्रों से उच्चारण करना पंचामृत से स्नान कराना तुलसी जी परर विराजमान कर आदि आदि। जो पद्धति से सेवा पूजा है अब पंडित जी की इस प्रकार की सेवा पूजा से ठाकुर जी असंतुष्ट हो गए अब लो कै न जाने कौन से गुण पर दयानिधि री जाते हैं पंडित जी पूरी पूजा विधि जानते थे पर हृदय से प्रभु के प्रति अपनापन नहीं था भक्ति नहीं थी प्रेम नहीं था और यह अब आप समझ लो किस कोटि के भक्त है कुछ ज्ञान ही नहीं है परंतु इनके हृदय में है कि मैं प्रभु का हूं प्रभु मेरे हैं कभी-कभी आंसू बहाते तो वो आंसू जो साली ग्राम भगवान के ऊपर गिरते उससे बड़ा पंडित जी का पंचामृत नहीं और जो आह भर के पुकारते कृष्ण कृष्ण गोविंद गोविंद हे हरि मैं तेरा इससे बढ़कर वेद मंत्र अच्छे नहीं लगे ठाकुर जी को ठाकुर जी ने स्वप्न में एक वैष्णव का रूप धारण किया और उन ब्राह्मण से कहा कि तुम सीधे हमको उन रामदास के पास पहुंचा दो हां कहा कि यह तुम्हारा सोडषोपचार पूजल ये पंचामृत अभिषेक और यह तुम्हारा सिंहासन में विराजमान करना मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं मुझे उसकी सूखी रोटी और आह भरी पुकार ने खरीद लिया है मुझे वहीं पहुंचाओ। 

अब जब स्वयं स्वप्न में भगवान ऐसा आदेश कर रहे हैं तो उसके तो होश उड़ गए ब्राह्मण के कि हम तो जिसे समझते थे कि वह तो अनपढ़ है गवार है प्रभु इतना उसे प्यार करते हैं अब हाथ में सुंदर वस्त्र पर शालिग्राम भगवान को लिया और भगवान से कहा कि आपको पता है कि आपके ऊपर वह औजार घिसता है चंदन तिलक लगाने की बात जाने दो सिंहासन में बिराज वाले पैर रख के आप पे औजार घिसता है तुमको वो मसल दे सोडषोचार पूजन पंचामृत से स्नान ये सब प्रभु ने कहा जब वो आंसू बहाते हुए नाम बोलता है ना कृष्ण गोविंद हे हरि मैं तेरा मुझे इतना सुख मिलता है कि वेद मंत्रों से मुझे सुख नहीं मिलता और जब वह मेरे ऊपर पैर रखता है तो मुझे ऐसा लगता है वो आत्म समर्पण कर रहा है पूरा य यही है इनसे कौन पार पावे सर्व लोक महेश्वर जितने भी ज्ञान के सूत्र सब इन्हीं से प्रकट हुए इनसे कोई पंडित क्या पार पा सकता है बोले जब वो चरण रखता है दबाता है चरण से ऐसे तो मुझे लगता है कि पूरा अपने आप को समर्पित कर रहा है आत्म समर्पण कर रहा है। मुझे बहुत सुख मिलता है तुम्हारे चंदन और कस्तूरी के लेप और इत्र से मुझे जो सुख नहीं मिलता उसके घसने से सुख मिलता है अब राजी आप राजी तो फिर किसकी क्या बस चले ठाकुर जी राजी अब वो जो ब्राह्मण था जिसको एक गर्व था कि मैं ऊंचे कुल में हूं और मैं पूजा का विधान जानता हूं मेरी दासता से मेरी पूजा से शालिग्राम भगवान प्रसन्न हो जाएंगे आज व बहुत दैन्य हुआ कि मेरे दुर्भाग्य के आज तक मुझे वह प्राप्त नहीं हुआ जो रामदास को प्राप्त है क्योंकि स्वयं ठाकुर जी वहां जाना चाहते हैं। 

यह विचार करके शालिग्राम को लेकर के रामदास जी के घर जाना निश्चय किया उसने और मन में बहुत जलता जा रहा था कि मैं ब्राह्मण हूं लेकिन आडंबरा हूं मेरे अंदर वह बात नहीं आई जो उस दैन्य भक्त रामदास के हृदय में आई बारबार शालिग्राम को हृदय से लगाकर विकल होकर कहने देखो यह है किसी भी तरह से भक्त का संग हो जाए किसी भी तरह यह रामदास के दर्शन की देखो यह दर्शन का प्रभाव अब वो दैन्य होकर जा रहा है क्या प्रभु कभी मेरे भी हृदय में भाव आएगा जै श्री रामदास की भक्ति से आप प्रसन्न क्या कभी रे अंदर भी भक्ति आएगी मेरी पूजा आपको पसंद नहीं तो प्रभु मेरे को भाव दे दो जिससे मैं रामदास जी जैसी भक्ति कर सकू अब आई बात य ब्रह्मण का अभिमान वेद ज्ञान का अभिमान धूर धूसरित हो गया इसीलिए लिखा है 

तिनकी संगति रहत जाति कुल मद सब नंसै

भगवत प्रेमी महात्मा का संग होते ही जाति का अभिमान कुल का अभिमान विद्वता का अभिमान सब नष्ट होने लग देखो नष्ट हुआ अभिमान अब वो डरा हुआ सा ब्राह्मण शालिग्राम भगवान को एक कपड़े में रख कर के रामदास जी के घर आया और देखा तो होश उड़ गए रामदास जी के आंखों से आंसू चल रहे हैं बार-बार मुख से निकल रहा है हरि मैं जैसो तैसो तेरो हरि मैं जैसो तैसो तेरो 

मलिन वस्त्र है फटे पुराने कपड़े हैं शरीर में अपने आप अनुभव हो रहा है कि कितनी कृषता है क्योंकि खानपान की सामग्री उचित है नहीं और अब यह जो रोग बढ़ा है हरि में जैसो तैसो तेरो यह ज्यादा काम नहीं करने देता क्योंकि मन में जब आनंद की उन्मतता होती तो कौन बाहरी लोगों से बात करे कौन बाहर जाकर के बैठे जिससे चार लोग आकर खड़े हो व एकांत घर में बैठे बस बार-बार पुकारना अच्छा लगता उसको यह भी पता नहीं कि भक्ति है यह भी पता नहीं बस बार-बार हृदय में यही अच्छा लगता कृष्ण कृष्ण गोविंद गोविंद हे हरि मैं ज तेसो तेरो आंसुओ की धार बह रही है धीरे-धीरे वही गीत गा रहा है हे हरि मैं जैसो तसो तेरो 

यह ब्राह्मण गए जब देखा तो ओहो धन्य है धन्य है तुम्हारे माता-पिता को धन्य है रामदास तुम तो बड़े महात्मा निकले हम तो समझ नहीं पाए कि तुम्हारी ऐसी ऊंची स्थिति है तुम्हारे अधीन भगवान है अब वो धीरे-धीरे उसके नेत्र खुले अपने भाव से बाहर आया तब उन्होंने कहा कि यह जिन पर तुम पत्थर समझ कर के अपना औजार घिसते थे औजार नहीं मैं उस समय बताया नहीं यह साक्षात शालिग्राम भगवान है त्रिभुवन पति स्वरूप में विराजमान है सारे विश्व के स्वामी है घट घट में विराजमान है सबकी गति है सबके आश्रय हैं इनके शरणागति होने से जीव बंधन मुक्त हो जाता है तुम्हारी सरलता तुम्हारे प्रेम से रीज जब मैं इनको ले गया इनको पंचामृत से अभिषेक किया वैदिक स्तोत्र द्वारा इनकी स्तुति की इनकी सेवा की इनको भोग लगाया सब 

लेकिन इनको पसंद नहीं आया इनको तुम पसंद आए मेरे स्वप्न में एक वैष्णव रूप धारण करके आए और मुझे ऐसा आदेश किया कि मुझे रामदास जी के पास भेज दो वो रो पड़ा कि मैं तो महान पापी हूं रामदास रो पड़े अरे मैं महान पापी हूं मैं तो समझ नहीं पाया कि भगवान है और मैं इनके ऊपर ऐसा कृत्य करता रहा हाय मैं तो बहुत अपराधी हूं चीख चीख के रोने लगा मैं कितना निर्दय कितना नीच हूं देखो मैंने क्या किया 

बस ब्राह्मण तो खड़ा का खड़ा रह गया और भाव में डूब गए और हे करुणा समुद्र प्रभु मैं कैसे आपको रिझा पाऊं तुम मुझे कितना प्यार करते हो और मैं कितना नीच हूं ऐसे बस पुकारने लगा रोने लगा अनन्य भक्ति से भगवान रीझ जाते हैं बार-बार ब्राह्मण उनको धन्यवाद करता कि तुम्हारे अंदर जो भाव आया है ना यह बहुत कृपा से आया है ब्राह्मण के वचन सुनकर के रामदास के हृदय में थोड़ी शीतलता आई ब्राह्मण के चरणों में नमन किया जोंही ब्राह्मण गया तो साली ग्राम को मूर्ति लेकर हृदय से लगाया और खूब रोने लगे प्रभु मैं जान नहीं पाया कि आप भगवान हो आप शाली ग्राम भगवान हो घर में ले ग या फटा पुराना जो भी कपड़ा हो ऐसे बिछाया आसन पर शालिग्राम रखे और जो रूखा सुखा उसके घर में होता ठाकुर जी को भोग लगाता और गदगद कंठ से प्रभु को पुकारता कई दिन ऐसे सेवा के बाद उसके हृदय में बात आई कि यदि तुम भगवान हो मैं तो जानता नहीं पंडित जी कह गए मैं तो नहीं जानता कि तुम शालिग्राम भगवान हो यदि तुम भगवान हो तो मुझे दर्शन दो जब आप इतना प्यार हमसे करते हैं कि उनके घर रुका नहीं गया और तुम वहां से वापस आए हो तो प्रभु मैं दीन हूं मैं नीच हूं मैं अज्ञानी हूं मैं दुर्जन हूं मैं पतित हूं लेकिन हूं तो प्रभु आपका ही प्रभु आप जानते हैं कि रात दिन मैं चमड़े का कार्य करता हूं मुझ कोई पवित्रता नहीं कोई सदाचार नहीं और ऐसे पवित्र ब्राह्मण के यहां से आप आए तो मुझे लगा कि आप मुझसे प्यार करते हैं आप जब मुझसे प्यार करते हैं तो अब छुपा छुपी के खेल बंद करो दिखाओ कैसे होते हैं भगवान कैसे हो तुम मुझे तो पता नहीं लेकिन आप अब मेरे हृदय में बेचैनी हो रहे कि आपका स्वरूप क्या है प्रभु आप कृपा करो मैं तुम्हें प्रत्यक्ष देखना चाहता हूं हे करुणा सिंधु हे दीन बंधु हे पतित पावन ऐसी पुकार करने लगा  

कृष्ण चंद गोपाल आजु तो तेरे हाथ बकाई 

कृष्ण चंद्र गोपाल आज तो तेरे हाथ बिकाई 

हे कृपा सिंधु कृष्ण हे करुणामय भगवंत मैं तो तेरे हाथ बिक गया हूं हे प्रभु हे मोर मुकुट धारण करने वाले हे वैजयंती माला धारण करने वाले हे कृपा सिंधु पीतांबर धारी आप मुझे दर्शन दीजिए अपनी कृपा से आप दर्शन दीजिए मैं तो पतित हूं नीच हूं पर शरणागत हूं शरण गहे की लाज रखिए प्रभु अब मेरे हृदय में बड़ी विकलता हो रही मैं आपका दर्शन चाहता हूं।

रामदास रो रो करके प्रभु से प्राथना करने लगा ऐसा प्रेम समुद्र उमड़ा कि सब कुछ भूल गया बिहवल बकल होकर के यह विकल होता प्रभु को खींचती है उस अव्यक्त सत्ता को व्यक्त करती है य विकल है यही है पर माया का पर्दा उड़े हुए है जब हम ऐसे विकल हो जाए जैसे मछली जल के बिना तड़पती है ऐसे हमारे अंदर विकल होता और रहा नहीं जा रहा देखो कैसी स्थिति आ गई अब जिया नहीं जा रहा विकलता हो गई चीक चीक करके अपने घर में हो रहा है साली ग्राम ठाकुर जी सामने हैं रो के कह रहा मुझे दर्शन चाहिए सब भूल गया कभी-कभी तो ऐसा भाव आ जाता कि नाच नाच के रीजाता कि मेरे नृत्य से रीज जाओ कैसी शोभा फटे पुराने कपड़े हैं कृषण शरीर है और भाव में भीना हुआ सामने कपड़े में विराजमान शालीग्रम नाच नाच के यह भाव की इसी नृत्य से रीज जाओ प्रभु मुझ गरीब के पास तो कुछ ने के लिए नहीं है कभी रो रो के प्रभु मेरे रोने से रीज जाओ ऐसी भावना से वो बिकल होकर प्रभु से पुकारने लगा ।

अब तो प्रेम के जो अष्ट सात्विक भाव है उसके हृदय में उदय होने लगे कभी हंसता कभी रोता कभी चुप शांत बैठ जाता कभी गान करता कभी हे हरि मैं जैसो तैसो तेरो ऐसा पुकार उठता उसके हृदय में इतनी जोर से लालसा जागी कि कि प्रभु का वियोग इससे अय हुआ और प्रभु को अय हो गया रुकना यह है भक्त की सामर्थ्य असह्य हो गया प्रभु को भी रुकना आप प्रभु नहीं रुक सकते विकलता हो गई आहा प्रभु विकल हो गए अब वो गदगद कंठ से हे वंशीधर हे मदन मोहन जोर जोर से पुकारने लगा हे वंशीधर हे मदन मोहन तुम्हारे चरणों में बार-बार नमस्कार है मुझ गरीब की पुकार सुनो कहां हो आनंदमय कहां हो श्याम सुंदर मुझे दर्शन दो ऐसे पुकारने लगा 

प्रभु यद्यपि मैं समझ रहा हूं कि जैसे छोटा सा बालक चांद को खेलने के लिए मांगे ऐसे ही मेरी बात है कहां मैं नीच अधम कहां बड़े-बड़े तपस्वी ऋषि जो आपको दुलार करते रहते ध्यान के द्वारा कहा मैं अपवित्र पर प्रभु मैं हूं तो आपका ना मैं छुद्र हूं दीन हूं नीच हूं जैसा भी हूं आपका हूं पर अब मेरे हृदय में एक ही है आपके दर्शन नहीं मिलेंगे तो मैं प्राण त्याग दूंगा मैं नहीं जी सकता आपके बिना क्या करूं मुझसे जिया नहीं जा रहा 

ये यह स्थिति है कैसी कृपा होती प्रभु की अपने भक्तों पर प्रभु के बिना जिया नहीं जा रहा ये ये मतलब अब इस बात में केवल वाणी लड़खड़ाते है ये केवल प्रभु देते हैं भजन साधन सब एक तरफ यह बात अब जिया नहीं जा रहा वो हृदय में ऐसी विकल होता एकांत बैठा हुआ पुकारता रहता है अब जिया नहीं जा रहा ये यह बात जिनके हृदय में आ गई बस मिलन नजदीक है जब जिया ना जाए नहीं खानपान ते भावे नहीं कोमल वसन सुहावे सब विषय लगे ते खारा है हरि आशिक का मग्न अब कुछ अच्छा नहीं बस अब जीवन है तो हरि से है अगर नहीं मिले तो जीवन नहीं ऐसी विकलता हृदय में अब मैं तुम्हारे लिए ही जी रहा हूं बस हमारा जीवन प्रभु के लिए है प्रभु यदि आप ना आए तो इस जीवन का अंत हो जाएगा क्योंकि अब कुछ सुहाई नहीं दे रहा ।

मैंने तो कभी जाना ही नहीं कि तुम प्रभु हो देखो मैंने आपका निरादर किया पर आपने प्यार किया मैंने निरादर किया मैंने जाना ही नहीं कि तुम शालिग्राम के रूप में चोर के द्वारा मेरे पास स्वयं आए हो मैंने जाना ही नहीं मैंने तो औजार घिसा आपके ऊपर चरण रखे आपको माना ही नहीं कि आप भगवान हो लेकिन आप मुझसे प्यार करते हो मैं उसी प्यार की दुहाई देकर कह रहा हूं कि आप मेरे से मिल जाओ मेरे से मिल जाओ हे कृपा सिंधु तभी मेरे अंदर यह हिम्मत आई कि मैं ऐसा कह सकूं कि मेरे से मिल जाओ दीन दयालु मेरा साहस आपकी कृपा पर निर्भर है बोलो आप एक सदाचारी वेदज ब्राह्मण के यहां जाकर भी संतुष्ट नहीं हुए मुझ मैले कुचले आचरण वाले के घर आए प्रभु इसीलिए मेरा साहस हो रहा है आप एक बार मेरे नेत्र गोचर हो यदि दर्शन ना देना होता तो ये आपने ललक क्यों लगाई ये आपने ललक क्यों लगा आप क्यों आए मेरे पास क्यों मुझे सत्संग में ले गए क्यों वो बातें सुनाई क्यों अपना नाम अपनी जिव्या पे लाए क्यों ऐसी लीला की मैं तो जैसा था वैसा पड़ा रहता लेकिन आपने ही ललक लगाई आप ही मुझे आगे बढ़ाए तो अब आप मिल जाइए प्रभु मैं जैसा हूं तुम्हारा अब मिल जाइए बस बार-बार यही एक बार सांवरे यह अपना चांद सा मुखड़ा मुझे दिखा दो मेरा चित्त विकल हो रहा है हे मेरे मनमोहन करुणा की वर्षा कर दो इस दीन हीन कंगाल के पास कुछ ऐसा नहीं है जिससे मैं तुम्हें रिझा पाऊ इस प्रकार विकलता हुई भक्त का विशुद्ध भाव भगवान को अधीन कर लेता है इसी विशुद्ध भा की स्थिति में कोई भी विकार उसके हृदय में नहीं टिकता काम क्रोध लोभ मोह दम यह सब नष्ट हो जाते हैं हृदय एकदम द्रवित निर्मल और आंसुओं की धार के रूप में हृदय बहने लगता है रामदास जी की प्रेम भरी पुकार सुन कर के सर्वेश्वर प्रभु स्थिर ना रह सके वह एक वैष्णव का रूप बनाया और रामदास जी के घर पहुंचे रामदास जी के तो आंसू चल रहे थे प्रभु से पुकार रहे थे वो मस्ती में झूम रहा था कभी-कभी नाच पड़ता कभी-कभी अशुभ प्रवाह करते हुए कुछ बड़बड़ा आता जो समझ में भी नहीं आता कभी-कभी शालिग्राम की मूर्ति उठाकर हृदय से लगाता चूमता अपने नेत्रों में लगाता कभी-कभी मूर्ति लेकर नाचने लगता कभी मूर्ति को रख के साष्टांग दंडवत करने लगता ऐसे और भगवान वहां खड़े हैं वैष्णव रूप प्रेम दशा का निरीक्षण करके मुस्कुराते हुए उससे बोले अरे भैया यह तू नाच कूद क्यों मचा रहा है कुछ मिल गया क्या तेरे को यह बड़बड़ा क्या रहा है यह काम धंधा छोड़ कर के क्या ये हाथ में क्या लिए है शालिग्राम के लिए प्रभु वैष्णव रूप में घर गए और ऐसा पूछा रामदास जी को आवाज सुनाई दी तो बाहय चेतना हुई आंख खोल कर के देखा कोई वैष्णव है साष्टांग दंडवत प्रणाम किया सामने देखा दिव्य मूर्ति द्वादश तिलक लगाए हुए कोई वैष्णव खड़ा है विनीत भाव से हाथ जोड़कर कहा प्रभु मैं तो महा मूर्ख और अपवित्र नीच प्राणी हूं मेरे से अपराध ही बनते रहते मैं क्या आपके प्रश्नों का जवाब दूं कि मैं किसको लिए हूं क्या बड़बड़ा रहा हूं क्या बोल रहा हूं मन का कुटिल हूं विद्या बुद्धि बिल्कुल है नहीं पवित्रता का तो लेश नहीं है पर यह जब से मिले शालिग्राम दिखाया और कहा यह जब से मिले तब से मेरे हृदय में कुछ हो रहा है बेचैनी हो रही मुझसे जिया नहीं जा रहा। वैष्णव ने कहा कि तुम इन्हें भगवान समझकर पूजते हो हां, हां भगवान है ऐसा ब्राह्मण ने बताया है इसीलिए मेरे अंदर एक आकांक्षा हो गई कि मैं भगवान को साक्षात देखना चाहता हूं मुझे दर्शन नहीं हुए मुझे लगता है कि मुझे पूजा विधि नहीं आती है कोई मंत्र आदि नहीं आता जैसा मन में आता वैसे सेवा करता हूं जो मन में आता वैसा बोलता हूं क्या दीनदयाल प्रभु मेरे पर रीज जाएंगे वो वैष्णव से ऐसा रामदास जी पूछते हैं 

रामदास जी ऐसा कहते कहते चिल्ला चिल्ला कर रोने लगे कि मुझे ना पूजा विधि आती ना वस्तु पूजा की है ना कोई शास्त्रों का ज्ञान है क्या प्रभु मेरे से रीझ जाएंगे वैष्णव वेधारी भगवान ने आश्वासन दिया और कहा कि भाई यह तो ठीक है जो तुम कर रहे हो लेकिन भगवान के दर्शन की बात तुम्हारे हृदय में आई यह ठीक नहीं है भगवान ही है वैष्णव रूप में आए अरे बड़े-बड़े देवता योगी मुनि जन कितने काल तक तपस्या करते हैं ध्यान धरते हैं समाधि में रहते हैं वो दर्शन नहीं पाते तो तुम जैसे मनुष्य को कैसे भगवान दर्शन देंगे मेरी बात मानो ये दर्शन की बात तो छोड़ो और अपना काम धंधा करो थोड़ी देर भजन साधन कर लिया करो जैसे कर रहे हो वैष्णव की इन वात को सुन कर के मानो रामदास का हृदय फट गया हो उनकी आंखें खुली की खुली रह गई आ भर कर तो क्या मुझे भगवान नहीं मिले आह! ये ये प्रीति है यही भगवान देखना चाहते कि कैसा मेरे भक्त में मेरे मिलन की व्याकुलता होती है आंखें खुली की खुली रह गई वैष्णव कह रहे हैं भगवान का दर्शन बड़ा दुर्लभ है योगी मुनियों की समाधि भाव को प्राप्त महात्माओं के ध्यान में भी जो नहीं आते वो मुझ जैसे नीच को कैसे दर्शन देंगे बात ठीक कह रहे ब्राह्मण देवता वैष्णो देवता वो विकल हो गए आंसू गिराने लगे और कहने लगे देव आपका कहना सत्य है मैं बिल्कुल अधिकारी नहीं हूं कि मुझे भगवत साक्षात का पर क्या करूं अब मुझसे जिया नहीं जाता ये ये खास बात है जिया ना जाए प्रभु के बिना रहा ना जाए मैं नीच हूं पापी हूं मेरे पाप और नीचता को देखने पर लगता है कि कभी भगवान मुझे नहीं मिलेंगे पर प्रभु पता नहीं मेरे हृदय में एक आनंद की लहर उठती है ऐसा लगता है प्रभु मिलेंगे ऐसा लगता है प्रभु मिलेंगे क्योंकि मेरे हृदय में ऐसा आता है प्रभु मुझे प्यार करते हैं ऐसा लगता है मेरे को यद मैं किसी योग्य नहीं हूं पर हृदय में ऐसा लगता है प्रभु मिलेंगे ऐसा लगता है।

यह दया के समुद्र प्रभु मुझे जरूर दर्शन देंगे मुझे ऐसा लगता है जैसा रूप रंग उनका हो जैसा उनका शास्त्रों में वर्णन किया गया हो जैसे सुहागिनी स्त्री केवल अपने पति को ही देखती है ऐसे ही हे वैष्णव देवता मेरा हृदय केवल केवल प्रभु के लिए है आप बिना दर्शन के मुझे चैन मेरे हृदय में लगता है कि वो मुझे मिलेंगे मेरे स्वामी बड़े करुणा सिंधु तुम भले ऐसा कह रहे हो चाहे जो कुछ हो मुझे दर्शन मिलेंगे और ऐसा कहके नाचने लगा । मुझे मिलेंगे अवश्य मिलेंगे ।

ये यही यही बार-बार सत्संग जैसे कहते निश्चय करो इसी जन्म में भगवत प्राप्ति होगी कोई आके कहे तो इस बात से मत लना मुझे इसी जन्म में प्रभु मिले आपका यह बार-बार चिंतन निश्चय प्रभु को विवस कर देगा और व आपसे प्रभु का मिलन हो ही जाएगा रामदास जी नाचने लगे फिर विकल होकर के पुकारने लगे और प्रभु खड़े हुए देख रहे हैं उसकी भाव दशा को जैसे सुतीक्षण जी की भाव दशा को भगवान श्री राम छुप कर के देख रहे हैं मीठे स्वर में फिर बोले वैष्णव स्वरूप भगवान बेटा रामदास तेरा जीवन धन्य है देख मैं वैष्णव भेष में तेरे को देखना चाहता था कि तू मेरे प्यार में कितना विकल है देख मेरे को देख जब ऐसा कहा तो आंख खोल के देखा तो वैष्णव नहीं थे वो वैष्णव के आराध्य देव थे भगवान श्याम सुंदर अनंत अनंत कोटि सूर्य जैसा प्रकाश जिनकी श्री चरण नख से प्रकाशित हो रहा था अचानक आंख खुलते ही आंख मुंद गई इतना तेज उसने देखा कि मदन मोहन त्रिभंगी लाल बंशी अधर पर धारण किए हुए ललित त्रिभंगी स्वरूप से बड़े आनंद मुद्रा में विराजमान है और रामदास जी की ऐसा सुंदर रूप वो तो आनंद समुद्र में डूब गया कि अभी तक मेरे से भगवान ही बात कर रहे रोज मिलते रोज वैष्णव जनों को आप भी पहचानना किसी न किसी रूप में आके वो ठिठोली करता है किसी न किसी रूप में आकर रोज मिलता है पकड़ना रोज परीक्षा करो कहीं इस रूप में मेरे प्रभु तो नहीं आ गए कहीं इस रूप में में मैं चूक ना जाऊं मेरा प्रीतम किसी यही तो वैष्णव होता है सब रूपों में झांकना मेरा प्रीतम आया है इस रूप में आप निश्चित देखना एक दिन वो पकड़ जाएगा और वो जैसे रामदास जी के सामने ने उस छदम भेस को हटा दिया ऐसे ही हटा देगा वो किसी रूप में रोज आता है व ऐसा नहीं है करुणा का समुद्र है वो रुक नहीं सकता नहीं रुक स वो तुम्हारे पास ही है रोज तुम्हें दुलार करता है सच्ची मानिए जिस दिन ऐसी विकल हो जाएगी उस दिन वो पर्दा हटा देगा और ऐसा ही सुख मिलेगा जैसा रामदास जी को मिला ।

सामने देखा सच्चिदानंद घन विग्रह प्रभु श्री हरि श्री कृष्ण चंद्र जू पूरा घर प्रकाश से युक्त है अब तो उछल पड़ा आनंदित हो गया वो सारी की सारी व्याकुलता आनंद में बदल गई महा अमृत में सुख बार-बार प्रणाम कर रहा है सामने नव किशोर ठाकुर ललित त्रिभंगी विराजमान है बार-बार प्रणाम कर रहा है बार-बार श्री चरणों को स्पर्श कर रहा है स्तुति करना चाहता पर आता नहीं है कुछ इसलिए ऐसे कुछ बोलने की चेष्टा करता है प्रभु उतने में ही मंद मंद मुस्कुरा रहे हैं फिर अचानक भगवान अंतरध्यान हो गए ।

अब तो पुनः दर्शन के लिए छटपटा लगा भूमि पर लौटने लगा बड़ी ही तन्मय स्थिति हो गई योग वियोग की आनंदमय अवस्था में डूबा हुआ निरंतर कभी देख रहा है भगवान उसके समीप है कभी देख रहा अंतर ध्यान ऐसी विकलता एक बार दर्शन होने के बाद फिर कभी ऐसा नहीं होता कि प्रभु नेत्रों से ओजल हो जाए बस जाते हैं नेत्रों में ऐसी ही आनंदमय स्थिति में उसका शरीर पूरा हुआ और वह नित्य पार्षद स्वरूप धारण करके प्रभु की नित्य सेवा में उपस्थित हो गया इसीलिए देवर्षि नारद जी कहते हैं कि भगवत प्राप्ति के लिए भगवत मिलन के लिए कोई ऐसा नहीं कि आप उच्च कुल में जन्मे हो तो ही भगवान मिले या वेदों के परात विद्वान हो या बड़े दानी हो तपस्वी हो आदि आदि हो तो तुम्हें प्रभु मिले प्रभु केवल केवल अपने भक्ति भाव से मिलते हैं । हृदय में प्रभु के प्रति अपनापन हो और तड़पन हो तो निश्चित प्रभु मिल जाएंगे ।

बोल श्री राधा वल्लभ लाल की जय

(प्रेमानंद जी की चर्चा से)


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