(55) श्री त्रिपुर दास जी का पावन चरित्र, अगर आपके जीवन में अपार कष्ट हैं तो यह चरित्र सुनें ! Bhajan Marg - YouTube
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(00:00) एक महा भागवत परम पावन श्री त्रिपुर दास जी महाराज अगर दुख मुझे घेरे हैं मेरे प्यारे राजी हैं तो मुझे दुख से कोई परेशानी नहीं यह प्रेमी का हृदय देखो त्रिपुर दास जी महाराज कायस्थ कुल में प्रकट हुए काय पुर दास भक्ति सुखरास भरयो करो ऐ सोपन सीत दगला पठाई निपट अमोल पट हिए हित जट आवे ताते अति भावे नाथ अंग पहरा आयो को काल नरपति ने बिहाल कियो भयो इस ख्याल ने को घर में खाइए वही ऋतु आई सुधि आई आंख पानी भरी आई एक दवात दी आई
(01:10) बेच लाइए श्री त्रिपुर दास जी कायस्थ कुल में प्रकट हुए थे बड़ा हिम्मत बनाने वाला ये चरित्र है ब्रजमंडल में शेरगढ़ है वहां इनका जन्म हुआ था वहां के निवासी थे और आपके पिता राजमंत्री थे बचपन से ही भगवत भक्ति के संस्कार थे जिनमें कुछ दिव्य प्रकाश होता है व बचपन से भगवत भक्ति का जिनको यह लगता है कि जवानी में विषय भोग ले और बुढ़ापे में भजन करेंगे तो भूल जाए बुढ़ापे में मन को प्रभु में नहीं लगाया जा सकता य आपने जवानी में भजन का अभ्यास नहीं किया तो बुढ़ापे में नहीं होगा बुढ़ापे में प्रपंच ही होगा पक्का विश्वास मान लीजिए और जितने भी दिव्य
(02:10) महापुरुष हुए जिनके जीवन प्रकाशित हुए हैं भक्ति अध्यात्म की ऊंचाई में व बचपन से श्री भगवान में लगे त्रिपुर दास जी के घर में राजमंत्री पिता थे पर बहुत ही सुंदर भक्ति के संस्कार थे एक बार आप पिता के साथ आगरा से किसी कार्य के लिए गिरिराज जी आए तो यहां ठाकुर श्री श्रीनाथ जी का दर्शन किया यही विराजमान थे अनोर में ज जतीपुरा इधर ठाकुर जी यही प्रकट हुए श्रीनाथ जी अपने ब्रज के हैं गिरिराज जी के ऐसा सुंदर रूप श्रीनाथ जी का नवीन किशोर अवस्था लुभ मान हो गए बहुत हट किया अब मैं नहीं जाऊंगा इन्हीं के दर्शन करूंगा इन्हीं के पास
(03:08) रहूंगा पिता राजमंत्री थे वहा किसी परिचित से कहा बालक है हट करता है त्रिपुर दास इसको हम छोड़ देते हैं दो चार 10 दिन यहां देखो भगवान का विधान या श्रीनाथ जी के दर्शन करेगा फिर हम आदमी भेज देंगे बुला ले अब वो दव योग से प्रेरित थे पुत्र को यहां छोड़ दिया और वापस वह लौटे तो रास्ते में कुछ वैरी दल के राज सेन को दुष्टों ने घेर लिया मार डाला पिता को मार डाला भक्तों के जीवन में प्रारंभ से ही विपत्तियों की बौछार हो जाती है लेकिन आप ऐसा डरिए मत क्या जिनके हृदय में भक्ति नहीं है उनके परिवार के लोग नहीं मरते क्या जिनके हृदय में भक्ति नहीं वह क्या
(04:07) दुख नहीं भोगते क्या यह अज्ञानी जन है नहीं जानते शरीर रचना के समय शुभ अशुभ कर्मों के अनुसार दुख सुख पहले से रच गया है भक्ति तो हम आज कर रहे हैं यह नई खेती है यह भक्ति का फल नहीं वोह दुख सुख पुराने हमारे कर्मों का फल है जब आपने सुना सूचना आई कि तुम्हा पिता को बैरी दल ने मार डाला है तो श्रीनाथ जी की तरफ देखा और कहा बा आप तो हमारे पिता भी हो मित्र भी हो जीवन धन हो हृदय में बड़ा आनंद हुआ कि चलो नाम मात्र का पिता अंतर्ध्यान हो गया लेकिन मेरा जो अनंत जन्मों का पिता है उससे संबंध हो गया अब तो मेरे श्रीनाथ जी के सिवा कोई नहीं है एकदम निश्चिंत हो गए रोज
(05:00) के सामने भाव विभ रोकर रोया करते नौ किशोर अवस्था कि प्रभु अब आपके सिवा हमारा कोई नहीं है एक दिन वल्लभाचार्य भगवान आचार्य चरण जिनके दुलारे लाडले श्रीनाथ जी हैं उस सेवा में आए तो देखा है बालक बहुत एक दृष्टि से देखता है रोता है लाओ इस बालक को सामने लाया यह है भगवत कृपा जब भगवत कृपा होती है तब गुरु जब गुरु कृपा होती तब भगवान मिलते हैं जब भगवान की कृपा होती तब गुरुदेव मिलते संत मिलते जब द्रव दन दयालु राघो तो साधु संगति पाइए और जब संत द्रवित होते हैं तब भगवान का साक्षात्कार होता है बुलाया और परिचय पूछा कौन है तो अमुक राज मंत्री का
(05:51) पुत्र इनके पिता यात्रा में मारे गए हैं और यह बहुत आसक्त चित होकर श्रीनाथ जी को देखते श्रीनाथ जी से रोते हैं त्रिपुर दास जी ने साष्टांग दंडवत किया वल्लभाचार्य जी को और कहा प्रभु मैं मात्र पित हीन ना मेरे माता है ना पिता है मैं अनाथ बालक हूं बस मेरे नाथ तो श्रीनाथ जी ही है और आपके श्री चरणों का आश्रय दे दिया प्रभु मुझ अनाथ दीन हीन को आप स्वीकार कर लीजिए बहुत प्रसन्न हुए इतना छोटी अवस्था में ऐसे शुद्ध शब्द ऐसे भागवत चेष्टा है चलो आज अभी इसी क्षण में इसको दीक्षा देता हूं आचार्य श्री वल्लभाचार्य जी विध पूर्वक दीक्षा देकर ब्रह्म संबंध
(06:45) कराया कुछ दिन तक पास रखा और कहा वापस जाओ घर श्री नाथ जी की सेवा की भावना रखो निरंतर चिंतन करो ध्यान में श्रीनाथ जी का स्मरण रखो भक्तिमय जीवन व्यतीत करो हमारा सदैव कृपा प्रसाद तुम्हारे साथ है गुरु आज्ञा तत्काल श्रीनाथ जी से उनके जो परिचय के थे ले गए यवन राजा था उनके राज्यमंत्री थे पिता तो जब नौ किशोर अवस्था से थोड़ा बड़े हुए तो इनके पिता का पद इनको दिया राज मंत्री बना लिया अब ये राज मंत्री में जितना वैभव मिलता तो इन्होंने एक बात सत्य समझी कि धन की सच्ची योग्यता क्या है बोले संतों के मुख में चला जाए संतों की सेवा में चला जाए भगवंत सेवा
(07:48) में लग जाए सो धन धन्य प्रथम गति जा की धन की सार्थकता है यह भागवत सरकारी बैंक है जैसे भारतीय सरकारी बैंक में जमा करो जब चाहो ले लो ब्याज सहित ऐसे भागवत सरकारी बैंक है गौ संत जन ब्रह्म ऋषि जन भगवान किसी विग्रह की अर् पूजा और किसी ऐसे असहाय की जो बीमार है जो अपवित्र है असमर्थ है उसकी सहायता भगवत भाव से कर देना उसमें जो धन खर्च होना यह सब भागवत बैंक में जमा होता है आपको मिलेगा ब्याज सहित मिलेगा हमारे प्रभु की बैंक में परसेंट बहुत ज्यादा मिलते हैं एक रुपया का लाख गुना ब्याज मिलेगा दे के ये जो आप देखते हैं कि अमुक अमुक पद पर
(08:43) बैठ गया अमुक राजा बन गया अमुक अमुक बन गया ये पूर्व जन्म का है पूर्व जन्म का आप देखते हैं छा गया ये पूर्व जन्म का सुकृत है वैभव श्वर चरण चूम रहे वाह वाही हो रही ये सब पूर्व का पुण्य है एक का लाख गुना पर इस बैंक में विश्वास नहीं होता किसी किसी को विश्वास होता है और इस बैंक में जमा कर देने पर अगर आपने कह दिया तो तत्काल व फल जो गुणा करके आपको प्लस मिलना था नहीं मिलेगा ध्यान कर लेना यदि माइक से हो गया कि अमुक जगह के अमुक भगत ने 5000 रप दान किए भगवान इनका मंगल करें तालियां बज गई हो गया उड़ गया आपके बैंक का ब्याज उड़ गया गया जैसे सभा में खड़े होकर अपने
(09:40) पाप को स्वीकार कर ले तो उड़ गया खत्म पाप ऐसे सभा में यदि पुण्य स्वीकार कर ले तो खत्म बुजुर्ग जन कहते थे कि दान ऐसा करें कि दाए हाथ से दे बाया हाथ ना जाने नेकी कर दरिया में डाल कोई जान ना पावे तब लाख गुना हमारी भागवत बैंक से उसे मिलता है यह तो हुआ अपना धन देने पर अगर यह बात हो जाए कि हे प्रभु आपकी वस्तु आपको समर्पित करते तो भगवान मिल जाएंगे तो दिय वस्तु गोविंदम तुभ समर्पित किया त्रिपुर दास जी ने कि राज मंत्री पद से जो भी धन आएगा मैं केवल सेवक की तरह प्रसाद से शरीर पोषण करूंगा सारा धन संत सेवा और भगवंत सेवा में
(10:25) लगाऊंगा उस श्रीनाथ जी के लिए नियम लिया प्रति ली कि हर साल सर्दी में दगला बनवा कर भेजेंगे रत्नों से हीरो से जट बढ़िया पोशाक सर्दी की सुनहरे गोटे सुंदर सुंदर रत्न जट अब चाहे करोड़ों के रत्न लग जाए श्रीनाथ जी के लिए और राज मंत्री थे दगला भेजते और रोज संत सेवा होती त्रिपुर दास जी के हा संत जन आते प्रसाद पाते धन की यही यही सार्थकता है जय जयकार हो भगवन नाम कीर्तन हो भगवत अनुरागी जनकर प्रसाद पावे भगवान की आरती पूजा सेवा धन्य है वह गृहस्थ वो धन्य वो तीर्थ है उसका घर जिसके घर में भगवान की आरती होती भगवान का नाम कीर्तन होता आए हुए अतिथियों की सेवा होती
(11:24) है और श्रीनाथ जी भी बड़े रजवार ठाकुर बहुत खुश होकर के प्रसन्न होकर के वो दगला धारण करते श्री विट्ठलनाथ जी श्री वल्लभाचार्य जी के पुत्र हैं वो देखते कि और वस्त्र जब धारण कराते तो ठाकुर जी धारण करते हैं लेकिन जब त्रिपुर दास जी का दगला धारण कराते तो ठाकुर जी फूल जाते हैं प्रसन्न हो जाते हैं भक्त के द्वारा प्रेम से दी हुई वस्तु भगवान बहुत भाव से स्वीकार करते हैं सब दिन होत ना एक समान एक समय ऐसा भी आता है जो बहुत ही अंधेरे का होता है एक समय प्रकाश का आता है जैसे दिन रात ऐसे सुख और दुख अब यवन बादशा था उसके पास द्वेष हों
(12:23) ने सूचना लगा दी कि राज मंत्री है आपको पता नहीं है आपके धन का बड़ा दुरुपयोग करते साधु महात्मा इनके यहां खाते रहते हैं और न जाने क्या-क्या खूब लुटाते हैं आपके यहां से वैभव चुराया जाता है और राजा यवन उसकी बुद्धि बदल गई उसने तत्काल आदेश किया सर्वस्व अपरण कर लिया जाए त्रिपुर दास जी का सर्वस्व संपत्ति जप्त कर ली जाए मतलब पात्र भी घर में नहीं रह गए सब जप्त कर लि दिया गया जहां रोज संत सेवा ठाकुर सेवा श्रीनाथ जी के लिए बहुत महंगा पोशाक सर्दी की सब एक पात्र भी नहीं रहने दिया सब जप्त कर लिया खाने पीने के लिए एक दाना भी नहीं रह
(13:18) गया कुछ नहीं सब जप्त कर लिया केवल दिवाले दिवाले अब आप विचार करो जिसका ऐसा चल रहा हो उसका ऐसा इसलिए होश में रहना चाहिए सब दिन होत ना एक समान यह शब्द याद रखना चाहिए सुख है तो फूलो मत कल दुख आने वाला है शरीर स्वस्थ है तो अभिमान मत करो कल कोई रोग आ जाएगा जीवित हो तो अभिमान मत करो कल ही मृत्यु आ सकती है आज भी आ सकती है होश में खूब धन संपत्ति है कल ऐसा हो सकता है टुकड़े टुकड़े के लिए मोहताज हो सकते हो पक्का पक्का आज दुख घेरे हैं तो आप निराश मत होए कल आप बहुत बड़े आदमी बन सकते हैं उत्साह संपन्न रहिए आज बहुत बड़े आदमी है धम
(14:06) संपत्ति है वैभव है नौकर चाकर है बहुत फलिए मत हो सकता ऐसा समय आ जाए कि तुम्हें किसी के य नौकरी करनी पड़े अपने पेट भरने के लिए समय बहुत विचित्र है पलटने में देर नहीं लगती पलटने में देर नहीं लगती खाने पीने तक के लिए नहीं रह गया साब यवन राज ने जप्त करवा लिया अब जैसे तैसे बहुत गरीबी से कष्ट से जीवन यापन होने अब आई सर्दी की ऋतु सर्दी की ऋतु में श्रीनाथ जी को दगला भेजते थे खूब सुंदर सजा करके यहां सजाने की क्या बात खाने की भी कोई वस्तु नहीं रह गई थी ठाकुर जी की सेवा की प्रतिज्ञा की थी कि जब तक जीवन है आपके लिए पोशाक भेजूंगा
(14:57) अब सर्दी में कैसे पोशाक भेजे खाने के लिए भी नहीं बहुत जोर-जोर से रोना आया कि हम हर कष्ट सह सकते थे लेकिन आपकी सेवा यह जो सर्दी की पोशाक भेजने की थी अब कैसे कैसे होगी आपकी से यह सेवा नहीं होगी तो मेरा जीना क्योंकि मैंने नियम लिया था कि मैं अपने जीवन में जब तक जिऊंगा हर वर्ष आपको सर्दी के समय पोशाक भेजूंगा सर्दी की आप ठाकुर जी से विनय करने लगे कि मैं सब कष्ट सह सकता हूं आपकी सेवा छोड़कर नहीं इतने में देखा दृष्टि गई तो एक ऊपर दावत रखी थी आपको जैसे कोई डूबते हुए को तिनके का सहारा मिल जाए और वो दावा पीतल जैसी दिखाई दे रही थी तो लग रहा था कुछ सिक्के की तो
(16:00) बिक जाएगी दवात ली बाजार में बेचने के लिए गए कि अगर यह बिक जाएगी तो थोड़ा भी कपड़ा मिल जाएगा तो नियम की तो पूर्ति हो जाएगी भगवान अपने भक्तों को ऐसा कष्ट क्यों देते हैं क्यों देते हैं बड़े आराम से जय जयकार हो रही थी संत सेवा हो रही थी ठाकुर सेवा हो रही थी श्री प्रियादास जी कहते हैं भयो ई ख्याल इष्ट देव को यह पसंद है हे डरना मत डरना मत कि इष्टदेव को यह पसंद क्या पसंद है अनन्य चिंतन धन का आश्रय भी नहीं होना चाहिए सुनेरी मैंने बल के बल राम अप बल तप बल और बाहुबल चौथ बल है दाम और आपसे बता दे
(17:07) कक्षा एक के विद्यार्थी से पीएचडी के प्रश्न नहीं पूछे जाते आप मत डरना क्योंकि आप क्लास में है नहीं आप इस क्लास में नहीं है आप डरना मत नहीं आपको लगे कि भगवान हमारी भी परीक्षा लेंगे तो आज जो चैन से हम एसी में रह रहे हैं कल फिर सब खत्म हो जाएगा ऐसा नहीं यह डिग्री वालों की होती है अपने लोग पार्टी छया वाले पहले क्लास वाले हैं खूब टॉफी मिलेगी और आराम से पढ़ने को यहां परीक्षा नहीं होती यहां दो चार क्लास तो ऐसे ही बढ़ा दिए जाते हैं जब डिग्री आती है तब वहां परीक्षा होती है इस बात की कि अब तुम्हारी स्थिति क्या है त्रिपुर दास
(17:47) जी के ऊपर जो भगवान की विशिष्ट कृपा हुई य भगवान श्री कृष्ण चंद्र जू ने युधिष्ठिर जी से कहा एक बार युधिष्ठिर जी ने कहा कि प्रभु ऐसा भी आपका नाम लेते हैं धर्म से चलते हैं एक कदम भी कहीं अधर्म नहीं भगवान श्री कृष्ण ने कहा यस अनुग्रह हरि से तद धनमंडी [संगीत] निर्व स्या धने हया मत पर कृत मैत्र से करि मद अनुग्रहम अर्थ समझ लो भाई डरना नहीं ले इसलिए बीच में कह रहे कलयुगी भगत है ले अपनी कंठी माला अनुग्रहा बहुत अनुग्रह हमें नहीं चाहिए आपका अनुग्रह भगवान ने षि
(18:52) जी से कहा य्या अनुग्रह जिसे मैं स्वीकार कर लेता हूं कि मेरा है उस पर मैं कृपा करता हूं हमने देखा पहलवान पहलवानों से भी मिले हैं वह कुश्ती में अपने जन को वहीं पीटते हैं जहां से कमजोर होते हैं यहां मारा अब हजार बार यही मारेंगे वो हजार बार मारेंगे य तपाड़ा हजार बार मार के फिर गिरा के टना से मारेंगे यहां और जब टना सह गए तब कहेंगे ठीक है लड़ो क्योंकि हमने पक्का कर दिया अ यहां तुम्हारे कोई मारे तो तुम फेल नहीं होगे ऐसे कुछ जगतगुरु श्री कृष्ण है हमारा य पार्षद कमजोर कहां से हो सकता है जहां कमजोर वहीं मारा जाता है बड़ा सुविधा
(19:50) होगी तो सुविधा पर ही मार चलेगी अब सुविधा के बिना भी भजन हो सकता है उस समय तुम्हारी मांग क्या हो सुविधा या भगवान त्रिपुर दस जी किसलिए रोए कि आपकी सेवा का प्रण लिया था वो सेवा की पूर्ति भगवान कह रहे हैं कि जिस पर मैं कृपा करता हूं पहले उसका धन बल अपरण कर लेता हूं ये धन बल अपरण कर लेता हूं जब वो निर्धन हो जाता है तो सगे संबंधियों का अपरण कर लेता या तो सगे संबंधी छोड़ देंगे देखा ना पिता रास्ते में ही राधेश्याम बहुत कृपा समझना कठिन है सुनाया था एक बार भगवान शंकर की कृपा माता पार्वती जी से कहा चलो मैं आपको अपने भक्त के दर्शन
(20:46) कराता हूं बोले चलो प्रभु तो बोले पहले अ भक्त के दर्शन कर लो तब भक्त के दर्शन आप सुख पाओगे तो गए तो सुपारी कतर रहे थे बैठे उस बढ़िया गद्दा लगा हुआ था गिर्दा लगा पचास गाय पचास भैसे दूध दुही जा रही थी प्रात कालीन का समय था संत वेश में गए और कहा भगत जी 100 ग्राम दूध दे दो शालिग्राम भगवान को स्नान कराना है चल दिया सुबह से और क्या क्या बोलना श महादेव जी ने कहा हे भगवान जितनी संपत्ति और वैभव इससे दुगना की कर दो माता जी ने कहा औघड़ इसीलिए कहा जाता है इनको बड़े औघड़ नाथ है 100 ग्राम दूध ले दिया गाली दिया ऊपर से कह रहे संपत्ति
(21:39) कह दो दुगनी बोली नहीं पर अंदर अंदर बहुत विचित्र डर दानी है इनका आस तोष बोले चलो भगत के दर्शन बोले अ भक्त तो ऐसा था कि अगर आप साथ ना होते तो इसको भस्म ही कर देती हम क्योंकि अंबा तो शक्ति है आपका अपमान अ भक्त ऐसे ही होते हैं ें नाराज नहीं होना भक्त के पास गए एक झोपड़ी फूस की एक गाय और उसी फूस की झोपड़ी में माय उसकी मैया रहती थी गए ज देखा संत तो साष्टांग दंडवत किया आओ बैठो बैठाला 100 200 ग्राम गाय का दूध होगा वो बढ़िया पान करने को ले दिया प्रभु थोड़ी देर भगवत चर्चा हुई भगवान शिव ने कहा अच्छा भाई चलते हैं हम तो विचरण करते रहते हैं बोले संत भगवान
(22:37) कभी पुनः कृपा करके आना कुटिया के बाहर निकले और कहा हे करुणा निधान भगवान इसकी गैया और मैया दोनों हटा दो मार दो अंबा जी ने कहा आप बर्दाश्त नहीं होगा 100 ग्राम दूध नहीं दिया तो उसको दुगुना संपत्ति दे दी और एक गाय पूरा दूध आपको पिला दिया मैया बातचीत करने के लिए थी उसको भी आपने मार दिया कहा कि वो ये क्या है बोले अभी तुम नहीं समझे जब इतनी संपत्ति में साधु अपमान करके ऐसी गालियां देता जब डबल संपत्ति होगी तो ऐसा अपराध करेगा घोर नर्क जाएगा समझो और इसका कुछ मन मैया में जाता है कुछ गैया में जाता है दोनों भगवान के पास गए हु
(23:22) अखंड हमारा चिंतन करेगा य हम में लीन हो जाएगा माता जी ने कहा यह बात तो सही तो बोले जिस पर मैं कृपा करता हूं इस माया प्रपंच से उसे अपने स्वरूप में स्थित करता हूं वह जरूरत देखो जरूरत है ऐसा नहीं कि एक बुखार की दवा सबके साथ चलेगी बुखार की भी क्वालिटिया है समझना मलेरिया है तो उसके लिए अलग डेंगू है तो उसके लिए अलग साधारण वायरल है तो उसके लिए अलग हम लोग साधारण बुखार वाले हैं चिंता मत करो ऐसे हाई इंजेक्शन नहीं लगेंगे जैसे त्रिपुर दास जी के लगे या प्रहलाद जी के लगे या नरसिंह मेहता जी के लगे या मीरा जी के लगे अपने लोगों के नहीं
(24:02) लगेंगे बहुत ऐसे वायरल जैसे ऋतु का बुखार है ना अपने लोग ऐसे बुखार के मरीज है डेंगू वाले नहीं है कि भर्ती हो जाए प्लेटें कम हो रही डरना मत अलग-अलग बुखार की जैसे दवा ऐसे अलग-अलग भक्ति की स्थिति की परीक्षा होती है अब इसकी स्थिति क्या होगी वो तो जगत पावन करने वाले भगवान य देखते हैं बहुत सुंदर बात है अगर समझ में आ जाए भगवान अंधकार का नाश कर देते हैं भगवान स्वप्न का नाश कर देते हैं यह सब स्वापक जगत है अब मोह ममता से युक्त इसलिए डर जाओगे तो हम कह रहे तुम्हारे साथ ऐसा होगा ही नहीं क्योंकि तुम उतनी स्थिति के ही नहीं हो डरना मत सच्ची मानिए क्या
(24:51) चक्रवर्ती सम्राट अमरीश जी भगवान के भक्त नहीं है ध्रुव जी भगवान के लिए भजन करने के लिए गए तो आज ऐसा पद मिला कि त्रिभुवन में किसी को नहीं सुदामा जी को दरिद्रता प्राप्त थी और सुदामा पुरी की रचना हो गई जैसे द्वारिका पुरी की रचना आप हमारे श्री कृष्ण के प्रति ऐसा ना सोचे य जो कह रहे हैं बड़ी गुप्त बात है उसके अंदर के ममत्व का नाश कर देते हैं उसके अंदर के अज्ञान का नाश कर देते हैं क्या आप अपने अज्ञान का नाश करवाना नहीं चाहेंगे यहां अज्ञान की वृत्ति के नाश की बात आप ऐसा म मत सोचिए और आज तक कोई भक्त आपको भिखारी नहीं मिलेगा आप ध्यान दीजिएगा पुरुष से लेकर के
(25:36) जहां दृष्टि डालिए जहां भक्तों को आपके चार घर में लोग होते हैं उनके भोजन की व्यवस्था में आप चिंतित रहते हैं समझ रहे जब हम मांग के खाते थे तो भूखे रह जाते थे और जब भरोसे पे है तो 3400 लोगों का बाल भोग राज भोग शयन भोग अपने आप हमारे प्रभु पूरा करते तो हरि से त धनमंडी तुम्हारा घर कितना बड़ा है हमारे घर में कितने बैठे हो देख लो घबराना मत इसलिए हम कह रहे डरना मत अब इसीलिए कह रहे नहीं तो आपको लगेगा भगवान कह रहे य स्याम अनुग्रह हरि सेत धनमंडी [संगीत] यह भक्ति दुख का नाश करके सर्वतो भावे महा सुख प्रदान करने के लिए है ततो धनं तजन तस
(26:33) स्व जना दुख दुखित भगवान कह रहे हैं फिर उसके परिवार वाले उससे प्यार नहीं करते क्या झूठे प्यार में फंसे रहकर जिंदगी गवाना चाहोगे क्या आप यह नहीं जानोगे कि तुम्हें कोई प्यार नहीं कर रहा क्यों झूठ में जीवन व्यतीत करना चाहते हो सच्ची कोई प्यार नहीं कर रहा कोई प्यार अपने सुख के लिए प्यार कर रहा है कोई तुम्हें प्यार नहीं कर रहा तो भगवान कह रहे हैं मैं परिवार से भी उदासी पैदा कोई उसको प्यार नहीं करता असलियत में आ गई बात की कोई प्यार नहीं करता फिर कह रहे हैं कि जब वोह व्याकुल चित हो जाता है कोई उसे प्यार नहीं करता ऐसा लगता है सब मुझे
(27:17) छोड़ दिए तब मैं एक रास्ता देता हूं अपने भगवत प्रेमी महात्मा का वो विशुद्ध संत से मिलता है और जब संत से मिलता है तब मैं उसे अपनी कृपा से ऐसा सराबोर कर देता हूं अनुग्रह की वर्षा कर देता हूं और वह मेरे में डूब जाता है महा भागवत जन्म जन्मांतर के पापों का नाश करके महान सुख की प्राप्ति यह है रस्य हमारे प्रभु का जो भक्तों के जीवन में जगह-जगह पर दुख दिखाई देता है वह हर मोड़ में ईंट खड़ी कर देते हैं इधर चल सीधे ये इतना फिसड्डी मन है कि अगर वो कृपा ना करे तो माया में फसा रहे पर वो से ईट रखते चले जाते निकल मेरी तरफ बढ़कर
(28:02) आजा अब त्रिपुर दास जी बाजार गए तो बेच के बजार यो रुपैया एक पायो ता को लायो मोटो थान मात्र रंग लाल गाइए भीज अनुराग पुनि नैन जलधार भीज भीज दीन ताई धरि राखो और आइए को प्रभु जन आए सहज दिखाई दई भई मन दियो ले भंडारी पकराई काह दास दासी के ना काम को पे जाऊ लेके बिनती हमारी जोग साई ना सुनाइए त्रिपुर दास जी को दावत दिखाई दी जो पीतल की सी दिखाई दे रही थी उठाई बाजार ले गए तो उस समय उन्हें 100 पैसे मिले एक रुपया एक
(29:05) रुपया कपड़े की दुकान में गए मोटी मार्किंग को अब जहां इतना कीमती वस्त्र सोने के गोटे हीरे लगाकर सुंदर ऐसी पोशाक भेजते थे वहां आज स्थिति की मार्किंग कैसे ठाकुर जी को भेजे लाल रंग से लगा लाल रंग अनुराग का रंग सफेद मार्कन लाकर आंसू गिरते जा रहे हैं कि नाथ यह मोटा मार्कन आपके तो दास दसियों के लायक आपको कैसे पर कुछ नहीं है अनुराग में भने हुए नेत्रों से अधार बह रही है हृदय में भारी दीनता है और ऐसी ही वस्तु प्रभु को बहुत पसंद आती है हम से अगर दी जाएगी 5 किलो सोने का छत्र तो 4 लाख योजन का सोने का पहाड़ है उनकी इस मृत्यु लोक में 5 किलो क्या होता
(30:13) है साहस नहीं हुआ रंगा लाल रंग में प्रेम रंग में रंग करर रख लिया पर साहस नहीं हुआ कि मैं जाकर के श्रीनाथ जी को दूं कैसे दूं अब उनके मन में एक बहुत पीड़ा है और देखो भगवान अपने भक्त की बात को अंतर से जानते हैं त्रिपुर दास जी के हृदय में दैन्य और दैन्य भगवान को बहुत प्रिय है यही दरबार दीन को आदर रीति सदा चले आई भगवान को मूल्यवान वस्तुएं प्यारी नहीं भगवान को जो प्यारी वस्तु है वह दैन्य है दीनता ही दीन प्यारे वेद पुकारे द्रव सु श्री भगवाना इतने में विधान बना गोसाई जी के सेवक श्रीनाथ जी की सेवा के लिए जो भक्त जन थे उनके यहां विचरण किया करते थे अचानक
(31:20) दृष्टि में पड़े त्रिपुर दास जी के देखा ये तो श्रीनाथ जी के सेवक है जो गुसाई जी के पार्षद हैं और ये तो सेवा सामग्री श्रीनाथ जी को पहुंचाते हैं तो आपने प्रणाम किया घर लिवा गए कुछ खाने पीने के लिए व्यवस्था ही नहीं कैसी कैसी कहां राज मंत्री का सुख और कहां बहुत संकोच में भरे हुए व मार्कन निकाल के लाए जो लाल रंग से रंगी थी और कहा हाथ जोड़ कर के कि हर वर्ष प्रतिज्ञा थी कि श्रीनाथ जी को पोशाक भेजेंगे पर भगवत कृपा से वैसा विधान बन गया है यद्यपि य श्री गोसाई जी के किसी दास दासी के पहनने योग्य भी नहीं है फिर य श्रीनाथ जी के श्री अंग के लिए तो क्या
(32:15) होगी पर आप क्या इस भेंट को वहां तक पहुंचा देंगे भंडारी को दे देना पर गोसाई जी को कुछ मत बताना ना मेरी स्थिति बताना कि खाने को भी नहीं और ना यह बता कि मार्कन भेजा कुछ मत कहना उनको दुख पहुंचेगा केवल भंडारी को दे देना व जो चाहे जैसे चाहे यद्यपि श्रीनाथ जी के योग्य तो है ही नहीं देखो भगवान भावो सवे भजता रस कामधेनु [संगीत] है बड़ा हृदय में सुख हो रहा है उस वस्त्र को लेकर वह जो भगवत पार्षद है आज तक उनको ऐसी भेंट इतनी इतनी भेंट मिलती थी श्रीनाथ जी के पास ले जाने के लिए लेकिन ऐसा सुख नहीं होता था जैसा त्रिपुर दास जी ने रो कर के जब मर्किन दी
(33:08) लाल रंग से रंग के उनको एक अपार सुख हो रहा है और दियो ले भंडारी कर राखे धरि पटवा पे निपट सनेही नाथ बोले अकुला के भए है जलाए को बेगी ही उपाय करो विविध उड़ाए अंग बसन सुहाय के आज्ञा पुनि दयो अंगीठी बार दई फिर वही भई सुनी रहे अति ही लजा के सेवक बुलाए कही कौन की कबाए आई सब की सुनाई एक हीली बचाए के त्रिपुर दास जी का वस्त्र लेकर बड़े प्रेम में डूबे हुए भगवत पार्षद गए और भंडारी जी से कहा के आप से तो कुछ छुपाओ है नहीं त्रिपुरा दास जी का दिया हुआ वस्त्र है यद्यपि
(34:12) बहुत कष्ट में उनका जीवन है फिर भी उन्होंने यह सेवा भेजी आप इस सेवा का आदर करना अपमान मत करना कि कहीं फेक मार्कन का ठाकुर जी के श्री अंग पोशाक वाल तो उन्होंने भंडारी ने कहा कि इसका सही प्रयोग करेंगे तो जो ठाकुर जी की पोशाक थी उसको बांधने के काम में ले लिया उ नए वस्त्र जो मार्कन आई उसमें रखकर ठाकुर जी की पोशाक बांधकर और उसे अलमारी में रखले परम सनेही ठाकुर जी कांपने लगे जब श्रृंगार हुआ तो सर्दी का समय था कांपने लगे श्रीनाथ जी जब श्री आचार्य चरण सेवा में गए तो कहने लगे मुझे बहुत जोर की ठंड लग रही है ठाकुर जी बोलते हैं निज जनों से जैसे हरिवंश
(35:10) महाप्रभु से राधा वल्लभ जी बात करते थे बन चंद महाप्रभु से बात करते थे बिहारी जी से स्वामी जी महाराज विट्ठल विपुल देव जी बिहारी देव जी अब हम लोगों की जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरति देखे तिन तैसी मुझे ठंड लग रही बहुत जोर की बोले जय जय अभी उपाय करता हूं तत्काल बड़े गरम गरम महंगे वस्त्र धारण कराए ठाकुर जी फिर बोले बहुत ठंड लग रही है बहुत ठंड लग रही कहा जय जय अभी उपाय करते हैं तुरंत अंगीठी जलाई गई सामने अंगीठी ऐसे सुंदर नवीन कोमल उनके वस्त्र उठाए गए ठाकुर जी फिर काप कहते मुझे बहुत ठंडी लग रही श्री विट्ठलनाथ जी गोसाई जी समझ गए कि
(36:07) यह साधारण ठंड नहीं है यह किसी भक्त के हृदय की जो पीड़ा है उसी की एक कपकपी है गोसाई जी बहुत संकुचित होकर बोले जय जय अब क्या उपाय करूं आपको सुंदर सुंदर दगला पहना दिया सुंदर गरम वस्त्र उठा दिए आपके साथ फिर भी आप कह रहे हैं आपको ठंड लग रही एकदम ध्यान गया उन्होंने कहा किसी भक्त के वस्त्र का तो अपमान नहीं हो रहा है सेवक को बुलाया तत्काल बही खाता लाओ इस वर्ष किसकी किसकी पोशाक आई है किसकी नहीं आई बही खाते में सुनाया गया लेकिन त्रिपुर दास जी का नाम नहीं था त्रिपुर दास जी का नाम इसलिए नहीं लिखा कोई पोशाक ही नहीं थी मार्किंग लाल रंग से
(37:04) भेजी गई थी श्रीनाथ जी बड़े सनेही हैं बहुत प्यार करने वाले हैं एक बार रहीम दास जी ने सुना कि श्री ठाकुर श्रीनाथ जी महाराज बड़े सुंदर हैं और बहुत कृपालु है रजवार है फकीर वेष में रहते थे रहीम दास जी और जन्म तो अन्य धर्म में हुआ था पर उपासना अपने श्री ठाकुर श्री हरि की करते थे श्रीनाथ जी यति पुरा में गोवर्धन में विराजमान थे आप जब आए दर्शन करने के लिए तो द्वार में ही ब्रज वासियों ने रोक दिया जो द्वारपाल थे देख के ही आप अंदर दर्शन करने नहीं जा सकते हो फकीर भेष ऐसे थोड़ी देर ठाकुर जी के दरवाजे पर
(38:08) खड़े रहे झुंझला के बोले ऐसी साहिबी और ऐसी बेवकूफी ऐसी साहिबी और ऐसी बेवकूफी साहब बुला रहे हैं सेवक रोक रहे हैं अब सनका दी तो है नहीं कि जा तीन जन्म के लिए रोक दिया ना जय विजय ने तो झुंझला के ही तो सन कादी ने साफ दिया था प्रभु के दर्शन की इतनी व्याकुलता तो रहीम जी के हृदय में इतनी व्याकुलता थी कि उन्होंने कहा ऐसी साहिबी और ऐसी बेवकूफी अच्छा मैं मिले शरीर में जन्मा इसलिए आप मुझे अंदर नहीं जाने देते तो ये शरीर क्यों दिया था आपने और चलो शरीर दिया था तो इच्छा क्यों की कि आओ मेरे दर्शन करने मैं स्वयं इच्छा करके आया हूं पहले सुनवा बड़े कृपाल हो
(39:00) बड़े सुंदर हो बड़े उदार हो और बुलाया तो ऐसी साहिबी ऐसी बेवकूफी मुझे धक्का मार के बाहर किया जा रहा है कि मैं आपके दर्शन ना कर सकूं इतनी प्रशंसा सुन कर के आया और आपका फकीर हूं आपका हूं हरि रहीम ऐसी करी जो कमान सर पूर खैंच अपनी ओर को छाण दियो दूर हरि तुमने तो ऐसा कर दिया जैसे धनुष करता है धनुष खींचा अपनी तरफ जाता है तो बाण दूर निकल जाता है खींचा अपनी तरफ धक्का मार के दूर भगा रहे कि मेरे दर्शन नहीं कर सकते गोविंद कुंड पर आए और वही बैठ गए अशु चलने लगे कि अगर यह प्रीति दी तो आपने धक्का मारक हमें दर्शन देने से क्यों इंकार कर दिया क्यों
(39:55) बुलाया आपने ऐसा क्यों किया मेरे साथ मैं आपके लिए जीवन धारण किए हुए हूं और आपने धक्का लगाकर बाहर करवा दिया गोसाई जी के हृदय में एकदम व्याकुलता हुई श्री विट्ठलनाथ जी के हृदय और आपने कहा किसी फकीर का अपमान तो नहीं किया यहां किसीने देखो कैसा भगवान का खेल होता है तो उका हा एक फकीर आए थे उनको रोक दिया गया अरे जल्दी खोजो जल्दी खोज हृदय में दाव हो रहा है जल्दी खुजो कहीं दूर ना चले जाए ऐसा होता है पक्का होता है खोजा तो गोविंद कुंड में छतरी पर बैठे थे आंसू चल रहे थे दौड़ के जाकर बताया और एक दो पार्षद वही रुके रहे के जाने ना पावे वो फकीर तो
(40:47) बैठे गोविंद कुंड में श्रीनाथ जी ने स्वयं कहा जल्दी ले जाओ प्रसाद मेरा ले जाओ उनको पवाओ जा करर के फिर श्रीनाथ जी ने कहा क् वो मान धारण किए हुए प्रसाद तो पाएंगे नहीं ऐसे जब तक हम नहीं जाएंगे तो इधर तैयारी प्रसाद की की जा रही उधर अपने प्रसाद की थाल लेकर ठाकुर जी स्वयं गए और कहा बाबा प्रसाद पा ही देखा अब वो तो छवि आवन मोहन लाल की काछ का छन कलित मुरली कर पीत पिछरी साल की छवि आवन मोहन लाल की बंक तिलक केसर को कीने दुती मानो विधु बाल की विसरत नाही सखी मो मनते उ चितवन
(41:58) विशाल की नीकी हसन अधर सध रन की छवि छीनी सुमन गुलाल की जलसो डार दियो पुरन पर डोलन मुक्ता माल की आप मोल बिन मोलन डोलनी बोलनी मदन गोपाल की यह स्वरूप निरख सई जाने इन रहीम के की रहीम दास जी बेहाल हो गए मंद मुस्कान तिरछी चितवन अलबेली चाल बाबा कहे को रो रहे है प्रसाद पाले कमल दल नेत्रों में नेत्र मिला के दे धक्का लगा दिया य स्वयं चलकर आ रहे हो कमल दल नैनन की उन मान बिसरत नाही सखी मो मनते मंद मंद कानी कमल दल नैनन की उन मान नजदीक आए पालो प्रसाद उन्होंने कहा खैट चढ़ने ढीली धरनी
(43:14) कहो कौन यह रीत आज काल मोहन गही वंश दिया की रीत वाह महाराज बड़ी विचित्र है आपकी लीला पहले धक्का मारकर बाहर भगा देते हो वही दर्शन कर लेने देते आपको य आने की क्या जरूरत थी धक्का मारा क्यों हटाया क्यों जब आना ही था आपकी रीति समझना बड़ा कठिन है थाल सामने बाबा मेरे भोग की थाल है पाओ यह प्रीति देखते हैं सिर्फ प्रीति देखते हैं पीट करके ऐसे बैठ गए नहीं पाऊंगा आपने धक्का क्यों लगवाया दर्शन करने के लिए बुलाया फिर धक्का लगवा दिया कि नहीं तुम अंदर प्रवेश नहीं कर सकते ठाकुर जी मना रहे हैं बाबा पालो पालो और बस जे भी ऐसे दोबारा मुड़े
(44:10) अंतर्धान हो गए ठाकुर जी के अंतर्धान होते ही अद्भुत वियोग बड़ी ऊंची स्थिति के श्री रहीम दास जी महापुरुष हुए मोहन छवि नैनन बसी पर छवि कहा समाए भरी सराए रहीम लखि आप पथिक फिर जाए अंतर दाव लगी रहे धुआन प्रगट कोई क जि जाने आपनो क जा सिर बीती होय अंतर में आग लगी है मोहन लाल की अद्भुत प्रेम में डूबे श्री रहीम दास जी प्रभु श्रीनाथ जी को ऐसी ठंडी लगी हर उपाय करके श्री विट्ठल दास गोस्वामी जी हार गए त उन्होंने कहा किसी भक्त की किसी वस्त्र का अपमान हो रहा है किसी भक्त पर विशेष कृपा करना चाहते हैं लाओ बही खाता लाओ हर साल जिसकी पोशाक आती
(45:10) थी नाम सुनाओ नाम सुनाया त्रिपुर दास जी का नाम नहीं था तो सुनी ना त्रिपुर दास बोल धन नास भयो मोटो एक थान आयो राखो है बिछाई के ल्याओ बेगि आही मन की प्रवीन जानी लयो दुख मान योति लई सो सिवाय के अंग पहरा सुखदाई काप गाई जात कही तब बात जाड़ गयो भरी भाय के नेह सर साई ले दिखाई उर आई सब ऐसी रसिका हृदय राखी है बसाय के विट्ठलनाथ गोस्वामी जी ने कहा त्रिपुर दास जी का नाम नहीं सुनाया हर वर्ष भेजते थे क्या इस वर्ष पोशाक नहीं भेजी देखो एक तो भगत होते हैं कुछ फुलरा चढ़ता चार दिन की भक्ति का सोडा वाटर की तरह मार फूल के एकदम और
(46:16) एक भक्त होते हैं जो गंभीरता पूर्वक कदम बढ़ा जितनी सेवा तो बढ़ाते चले गए पूरा जीवन समर्पित कर दिया और एक वत एकदम फुलरा की तरह से बढ़े हो बस खत्म हमें लगता है कि भक्ति सोडा वाटर वाली ना करो क्षणिक वैराग्य वाली मत करो एक कदम बढ़ाओ पर बहुत मजबूत बढ़ाओ जीवन में चाहे जितना संकट आ जाए उतने कदम जो हम बढ़ चुके भक्ति के पीछे नहीं लौटेंगे चाहे मृत्यु क्यों ना हो जाए ऐसी दृढ़ निष्ठा रखनी चाहिए तभी माया पर विजय प्राप्त होती है पोशाक हर वर्ष त्रिपुर दास जी भेजते थे उनका नाम वही काते में था क्यों नहीं भेजा सेवक ने कहा राज कोप के द्वारा सारा धन
(47:01) उनका नष्ट कर दिया गया छीन लिया गया है तो कुछ नहीं भेजा नहीं भेजा है मार्किंग भेजी लाल कपड़े में लाल रंग में रंग करके कपड़ा आया है वह ठाकुर जी की पोशाक लायक है नहीं इसलिए ठाकुर जी की पोशाक रखकर उसमें गुसाई जी ने कहा अच्छा अच्छा आप समझ में आए इसीलिए ठाकुर जी को ठंडी लग रही अरे जल्दी कपड़ा लाओ जल्दी कपड़ा लाओ और तत्काल दरजी को बैठाकर तत्काल सिलवा और ठाकुर जी को जही अंग में धारण करा ठाकुर जी मुस्कुरा दे और बोले हां अब सर्दी दूर हो गई बड़े रजवार ठाकुर है प्रेम प्रभु को चाहिए भाव प्रभु को चाहिए इसी भाव को दृढ़ करने के लिए ये
(47:54) महापुरुषों के पावन चरित्र है ऐसी भी परिस्थिति हो बस यह आप एक जन्म के लिए वैसे तो सब भोग ही रहे हैं नरक स्वर्ग अपवर्ग सब दुनिया का एक जन्म के लिए आप प्रभु के लिए थोड़ा हिम्मत कर लो कैसी भी परिस्थिति आवे आपका नियम ना टूटे आपका भजन ना टूटे जो नियम बनाओ उसे चलने दो प्राण चाहे निकल जाए इस जन्म में भक्ति से पीछे नहीं हटना तो निश्चित भगवत प्राप्ति हो जाएगी यह जीवन हमारा भगवत प्राप्ति के लिए है बहुत सावधान सुख दुख के ये भव समुद्र के थपेड़े हैं कहीं सुख में भूल मत जाना कहीं दुख में घबराकर भक्ति मत छोड़ देना आगे आपको बहुत सुख मिलेगा यह भक्ति दुख सुख देने
(48:44) वाली नहीं भक्ति सुख दुख में समान स्थिति पैदा करती है भक्ति भगवान को आकर्षित करती है और सही मानो आज तक खुद अपना अनुभव में बता रहा हूं यह दुख यह विपत्ति यह रोग यह नाना प्रकार का तिरस्कार निंदा यही ऊंचाई पर चढ़ाती है
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