भक्त माल कथा माला || 24 || लंकेश श्रीविभीषणजी की भक्ति तथा शरणागति

भक्त माल कथा माला || 24 || लंकेश श्रीविभीषणजी की भक्ति तथा शरणागति

श्रीविभीषणजी ।

श्रीसीतारामभक्त, लंकेश श्रीविभीषणजी की भक्ति तथा शरणागति को वर्णन कर सके ऐसा कौन जन है ? तथापि कुछ थोड़ा सा कहा ही जाता है, सो चित्त लगाके सुनिये। देखिये कि श्रीरामायणजी की कथा के अनुसार प्रात समय इनका नाम लेना बड़ा ही मंगलदायक है। 

श्रीरामायणजी में इस कथा का वर्णन इस प्रकार से मिलता है।

एक वणिक की जहाज समुद्र में चली जा रही थी। अचानक किसी कारण से अटक गई, उसने बहुत यत्न किये पर नहीं चली। तब वणिक ने ऐसा विचार करके कि समुद्र के देवता ने रोका है, शायद वह बाली चाहता है इसलिए उसने किसी मनुष्य को बलि की भाँति समुद्र में गिरा दिया ॥ 

वह मनुष्य श्रीरामकृपा से मरा नहीं, बरन "लंका टापू" के तीर पर जा लगा। जब लंकाके राक्षसों ने उसे देखा, और वे बड़े आनन्द से उसको अपनी गोद में उठाकर, बहुत खिलखिलाते हुए, राक्षसेन्द्र "श्रीविभीषणजी" के समीप ले गये ॥

उस समय श्रीविभीषणजी श्रीरामविरह अनुराग में प्रभु ध्यान करके बैठे हुए थे।

जब श्रीविभीषणजी ने इस मनुष्य को देखा तो देखते ही सिंहासन से कूद पड़े, क्योंकि मनुष्यरूप का दर्शन एक उद्दीपन ही हो गया। ऐसा विचारने लगे कि "इसी की नाई मेरे स्वामी नराकार विग्रह श्रीरामजी हैं, इनके दर्शन इस समय बड़े भाग्य से पाये" इस भाव से श्रीविभीषणजी के नयनों से प्रेमाश्रु बह चले ॥

श्रीविभीषणजी ने दिव्य वस्त्र, चन्दन, मणि और सुवर्ण के भूषणों से, उसके शरीर का शृङ्गार करके अपने सिंहासन पर बैठाया । धूप, दीप, नैवेद्य, आरती के अनन्तर भूषण वस्त्रादि न्योछावर करके, राक्षसों को रीझ पारितोषिक दिये ॥ 

श्रीविभीषणजी ने उस घड़ी को अति शुभदायक माना। और श्रीप्रभु का भाव करके सुवर्ण की छड़ी लेके प्रतीहार की भाँति उसके सम्मुख खड़े हो, उनके मुखारविन्द का सप्रेम दर्शन करने लगे और आपके नेत्रों से आनन्द का जल चलने लगा, तथापि उस मनुष्य के मुख में प्रसन्नता का लेश भी न दीख पड़ा, वरन राक्षसोंकी कैद में होने के कारण क्षण क्षण प्रति उसकी चेतना (चेष्टा) क्षीण ही होती जाती थी, उसकी आंखों से आंसू बहते थे और उसके मन में यह भय बढ़ता जाता था कि इन सब सत्कार पूर्वक, मुझे ये सब बलि दे देंगे ॥

श्रीविभीषणजी ने प्रार्थना की कि "इस दास पर कृपा करके कुछ आज्ञा दीजे, क्योंकि आपको उदास देखके मेरी मति सभीत हो रही है" 

तब वह मनुष्य बोला कि "मुझे समुद्र पार उतार दीजे, मुझको तो इसी में परम सुख होगा" ॥

तब श्रीविभीषणजी बहुत रत्न देके फिर उसी ठौर सिन्धुतीर उनको ले आये जहां वह व्यक्ति राक्षसों को मिला था।

श्रीविभीषणजी ने "श्रीराम नाम" लिख कर उसके मस्तक पर श्रीकरकमल से भावपूर्वक रख के वस्त्र से बांध दिया, और कहा कि "इस 'श्रीराम' के प्रताप से लोग संसारसागर से पार हो जाते हैं, सो इस समुद्र के जल को तो आप बिना प्रयास ही पार हो जाइयेगा ॥"

उनके सच्चे भाव और विश्वास से वह मनुष्य जल में स्थल की नाई चलके उसी ठौर पहुँच गया कि जहां संयोगवश वही जहाज लौटके जा लगा था ॥ 

उन लोगों ने उसको देखते ही पहिचान लिया और उसके शरीर के तेज तथा अवस्था को दिव्य पाया। पूछने पर उसने अपनी सब कथा और श्रीविभीषणजी की भक्ति कह सुनाई। सुनके सबको अति आनन्द हुआ बड़े विनय से उसको जहाज पर चढ़ाके क्षमा मांगी । 

कहते हैं कि, उसके पास अनमोल रत्नों की गठरी देखकर नौकापति को लोभ प्रबल हुआ, उसके ये ढंग देख कर उसकी माया से बचने के निमित्त यह मनुष्य पुनि जल में कूद पड़ा और यों चल दिया जैसे कोई सूखी धरती पर सहज ही में चले ॥
अतः श्रीराम नाम का प्रभाव से वह समुद्र में कूद गया परंतु जल में उसका पांव तक भी नहीं भीगा॥

इस प्रभाव को देखकर, "श्रीसीताराम" नाममें सबों को श्रद्धा और प्रतीति उपजी, और अति प्रीतिपूर्वक जप के द्वारा सबके सब संसार के पार हो गए ॥

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