ओसो || मैं कौन हूं? || 1. अज्ञान का बोध ||
ओसो
अज्ञान का बोध
एक छोटी सी कहानी से मैं तीन दिनों की इन चर्चाओं को शुरू करना चाहूंगा। एक व्यक्ति बहुत विस्मरणशील था, छोटी-छोटी बातें भी भूल जाता। बड़ी कठिनाई थी उसके जीवन में, कुछ भी स्मरण रखना उसे कठिन था। रात वह सोने को जाता, तो अपने कपड़े उतारने में भी उसे कठिनाई होती; क्योंकि सुबह टोपी उसने कहां पहन रखी थी और चश्मा कहां लगा रखा था और कोट किस भांति पहन रखा था, वह भी सुबह तक मेरे प्रिय आत्मन् !
भूल जाता। तो करीब-करीब कपड़े पहन कर ही सो जाता था, ताकि सुबह फिर से स्मृति को कष्ट देने की जरूरत न पड़े। पास में ही एक चर्च था और चर्च के पुरोहित ने जब उसके विस्मरण की यह बात सुनी, तो बहुत हैरान हुआ। और एक रविवार की सुबह जब वह आदमी चर्च आया था, तो उसे कहा: एक किताब पर लिख रखो कि कौन सा कपड़ा कहां पहन रखा था, किस भांति पहन रखा था, ताकि तुम रात में कपड़े उतार सको और सुबह उस किताब के आधार पर उन्हें वापस पहन सको।
उस रात उसने कपड़े उतार दिए और किसी किताब पर सब लिख लिया। सुबह उठा, और सब तो ठीक था, टोपी सिर पर पहननी है यह भी लिखा था, कोट कहां पहनना है यह भी लिखा था, कौन सा मोजा किस पैर में पहनना है यह भी लिखा था, कौन सा जूता किस पैर में डालना है यह भी लिखा था, लेकिन वह यह लिखना भूल गया कि खुद कहां है। और तब बहुत परेशान हुआ। सब चीजें तो ठीक थीं, और सब चीजें कहां पहननी हैं यह भी ज्ञात था, लेकिन 'मैं कहां हूं'- यह वह रात लिखना भूल गया था।
वह सुबह मुंह अंधेरे ही पादरी के घर पहुंच गया। नग्न था बिलकुल। पादरी भी देख कर घबड़ा गया और पहचान न पाया। हमारी सारी पहचान तो वस्त्रों की है। नग्न व्यक्ति को देख कर शायद हम भी न पहचान पाएं कि वह कौन है।
पादरी बहुत हैरान हुआ, उसने पूछा: आप कौन हैं और कैसे आए? उस व्यक्ति ने कहाः यही तो पूछने मैं भी आया हूं कि मैं कौन हूं. और कहां है?
क्योंकि बाकी सारे वस्त्र तो ठीक हैं, लेकिन रात मैं यह लिखना भूल गया- अपने बाबत लिखना भूल गया! पता नहीं उस धर्म-पुरोहित ने क्या उसे कहा। उससे कोई संबंध भी नहीं। लेकिन इस कहानी से मैं इसलिए इन तीन दिनों की चर्चाओं को शुरू करना चाहता हूं क्योंक करीब-करीब इसी हालत में हम सारे लोग हैं। हमें ज्ञात हैं बहुत सी बातें, जीवन का सब- कुछ ज्ञात है, सिर्फ एक तथ्य को छोड़ कर कि हम कहां हैं और कौन हैं। 'मैं कौन हूं ?'- इसका हमें कोई भी स्मरण नहीं है।
और उस व्यक्ति के साथ तो बात ठीक भी थी, क्योंकि वह और सब बातें भी भूल जाता था, इसलिए यह बहुत स्वाभाविक मालूम होता है कि अपने को भी भूल जाए। लेकिन हमारे साथ बड़ी मुश्किल है, हमें और सब बातें तो याद हैं, यह हमें याद नहीं कि हम कौन हैं और कहां हैं? इसलिए उस पर हंसना उतना उचित नहीं है जितना अपने पर हंसना उचित होगा। विस्मरण उसकी आदत थी। विस्मरण हमारी आदत नहीं है। और सब-कुछ हमें स्मरण है सिर्फ एक बात स्मरण नहीं है। इसलिए हम कपड़े भी ठीक से पहन लेते हैं और जूते भी और घर भी ठीक से बसा लेते हैं, लेकिन जीवन हमारा ठीक नहीं हो पाता है। जीवन हमारा ठीक होगा भी नहीं। जो केंद्रीय है जीवन में, उसकी हमें कोई स्मृति नहीं है।
और मैंने कहा कि नग्न जब वह धर्म-पुरोहित के द्वार पर खड़ा हो गया, तो धर्म- पुरोहित भी पहचान नहीं पाया कि वह कौन है। क्योंकि हम सभी एक-दूसरे को वस्त्रों से पहचानते हैं। यहां हम इतने लोग आए हैं, अगर निर्वस्त्र आ जाएं, तो कोई किसी को पहचान भी नहीं सकेगा कि कौन कौन है। लेकिन यह तो ठीक भी है कि हम दूसरो को वस्त्रों से पहचानें, बड़े मजे और आश्चर्य की बात तो यह है कि हम अपने को भी अपने वस्त्रों से ही पहचानते हैं। अपनी आत्मा का तो हमें कोई स्मरण नहीं, अपने स्वरूप का तो हमें कोई बोध नहीं, तो अपने वस्त्रों... और बहुत प्रकार के वस्त्र है। वस्त्र हम जो पहने हुए हैं वे-धन के, पदवियों के, पदों के, सामाजिक प्रतिष्ठा के, अहंकार के उपाधियों के - वे सारे वस्त्र हैं, और उनसे ही हम अपने को भी पहचानते हैं।
वस्त्रों से जो अपने को पहचानता है उसका जीवन यदि अंधकारपूर्ण हो जाए, यदि उसका जीवन दुख से भर जाए, पीड़ा और विपन्नता से, तो आश्चर्य नहीं है। क्योंकि वस्त्र हमारे प्राण नहीं हैं, वस्त्र हमारी आत्मा नहीं हैं। लेकिन हम अपने को अपने वस्त्रों से ही जानते हैं, उससे गहरी हमारी कोई पहुंच नहीं है।
इन तीन दिनों में इन वस्त्रों के पार जो हमारा होना है, उस तरफ, उस दिशा में कुछ बातें आपसे कहूंगा और यह स्मरण दिलाना चाहूंगा कि जो वस्त्रों में खोया है वह अपने जीवन को गंवा रहा है। और जो केवल वस्त्रों में अपने को पहचान रहा है, वह अपने को पहचान ही नहीं रहा है, वह अपने को पा भी नहीं सकेगा। और जो व्यक्ति अपने को हो न पा सके, उसके और कुछ भी पा लेने का कोई भी मूल्य नहीं है। अपने को खोकर अगर सारी दुनिया भी पाई जा सके, तो भी उसका कोई मूल्य नहीं है।
एक और छोटी कहानी मुझे स्मरण आई वह मैं कहूं और फिर आज की सुबह इस आत्म-विस्मरण के संबंध में जो मुझे कहना है वह आपको कहूंगा।
तीन मित्र यात्रा पर निकले। पहली ही रात एक जंगल में उन्हें विश्राम करना पड़ा। खतरनाक स्थान था ! जंगली जानवरों का डर था। डाकू और लुटेरों का भी भय था। अंधेरी रात थी! तो उन तीनों ने तय किया कि एक-एक व्यक्ति जागता रहे-दो सोएं, एक जागा हुआ पहरा दे। एक तो उनमें गांव का पंडित था, एक उसमें गांव का लड़ाका बहादुर क्षत्रिय था, एक गांव का नाई था।
नाई का ही सबसे पहले, सबसे पहले पासा फेंका गया और उसका ही नाम पड़ा। वह रात पहरा देने के लिए पहले पहर बैठा। नींद उसे जल्दी आने लगी, दिन भर की थकान थी। तो किसी भांति अपने को जगाए रखने के लिए उसने बगल में अपने सोए हुए क्षत्रिय मित्र की हजामत बनानी शुरू कर दी। जागे रखने के लिए अपने को, उसने अपने मित्र के सारे बाल काट डाले ! उसका समय पूरा हुआ। तीसरा जो मित्र था, रात्रि के अंतिम पहर में उस पंडित का पहरा होने को था। उसके तो बाल नहीं थे, उसका तो सिर पहले से ही साफ था, उसके सारे बाल गिर गए थे।
दूसरे मित्र का जैसे ही मौका आया, उस नाई ने उसे उठाया और कहा: मित्र उठो ! तुम्हारा समय आ गया। अब मैं सोऊं।
उस क्षत्रिय ने अपने सिर पर हाथ फेरा, देखा, बाल बिलकुल भी नहीं हैं। तो उसने कहा कि मालूम होता है तुमने मेरी जगह भूल से पंडित जी को उठा दिया है। उसने अपने सिर पर हाथ फेरा और कहा कि मालूम होता है तुमने भूल से मेरी जगह पंडित जी को उठा दिया है। और वह वापस सो गया।
हम अपने को इसी भांति पहचानते हैं। हमारी पहचान हमारे वस्त्रों तक है। अगर बहुत गहरी जाती हो, तो अपने शरीर तक जाती है। वह भी वस्त्र से ज्यादा गहरा नहीं है। और भी गहरी जाती हो, तो मन तक जाती है। मन भी वस्त्रों से ज्यादा गहरा नहीं है। लेकिन उससे गहरी हमारी कोई पहचान नहीं जाती।
जीवन में सारा दुख और सारा अंधकार इस आत्म-अज्ञान से पैदा होता है। केंद्र पर-अपने स्वयं के केंद्र पर अंधकार होता है और हम सारे रास्तों पर दीये जलाने की कोशिश करते हैं। वे सब दीये काम नहीं पड़ते। क्योंकि मेरे भीतर अंधकार होता है, तो मैं जहां भी जाता हूं अपने साथ अंधकार ले जाता हूं। उन रास्तों पर भी जहां कि मैंने प्रकाश के दीये जलाए हैं, मेरे पहुंचने से अंधकार हो जाता है; क्योंकि मैं अंधकार हूं। जब तक मैं स्वयं को नहीं जानता, तब तक मैं अंधकार हूं । तो मैं अपने अंधकार को लिए फिरता हूँ जीवन में। और सारे लोग अपने-अपने अंधकार को लिए फिरते हैं। हम सब जहां इकट्ठे हो जाते हैं, वहां अंधकार बहुत घना हो जाता है। एक-एक व्यक्ति उतने अंधकार में है, और जहां पूरी मनुष्य जाति इकट्ठी हो, वहां अंधकार बहुत घना हो जाता है। मनुष्य-जाति के पिछले तीन-चार हजार वर्षों का इतिहास इसी अंधकार का इतिहास है। फिर इस अंधकार से संघर्ष पैदा होता है, युद्ध पैदा होते हैं, हिंसा पैदा होती है। इस अंधकार से ईर्ष्या पैदा होती है, घृणा पैदा होती है, क्रोध पैदा होता है। इस अंधकार से विध्वंस पैदा होता है। हम खुद दुखी होते हैं, औरों को दुखी करते हैं। यह कोई तीन-चार हजार वर्षों से चला है। और अब तक हम सफल नहीं हो पाए हैं इस बात में कि एक ऐसा समाज निर्मित हो सके जिसका जीवन प्रकाश से आलोकित हो, प्रकाश से मंडित हो। क्या आपको ज्ञात है कि तीन हजार वर्षों में कोई चौदह हजार छह सौ युद्ध हुए है।
केवल तीन हजार वर्षों में चौदह हजार छह सौ युद्ध ! कोई पंद्रह हजार युद्ध! प्रतिवर्ष पांच युद्ध! हम शायद लड़ते ही रहे हैं, हमने कुछ और नहीं किया। और यह तो बड़े-बड़े युद्धों की बात है, रोज हम जो छोटी-छोटी लड़ाइयां लड़ रहे हैं, उनकी तो कोई गिनती नहीं है। जो हम रोज छोटी-छोटी हिंसा कर रहे हैं, उसका तो कोई आकलन नहीं है, कोई गणना नहीं है।
अगर तीन हजार वर्षों में पंद्रह हजार युद्ध हमें लड़ने पड़े हों, तो क्या इससे यह सूचना नहीं मिलती है कि मनुष्य जाति का मस्तिष्क किसी बहुत गहरे रोग से पीड़ित है? कोई इन तीन हजार वर्षों में मुश्किल से थोड़े से वर्ष हैं जब युद्ध न हुआ हो। और उन वर्षों को भी हम शांति का समय नहीं कह सकते; क्योंकि उन क्षणों में हमने नये युद्धों की तैयारियां की हैं। या तो हम लड़ते रहे हैं या हम लड़ने की तैयारियां करते रहे हैं। मनुष्य के पूरे इतिहास को दो खंडों में बांटा जा सकता है: युद्ध के खंड और युद्ध की तैयारियों के खंड। शांति हमने अब तक नहीं जानी है। और व्यक्तिगत जीवन में भी हम देखें, तो शांति का कहीं भी कोई, कहीं कोई पता नहीं मिलेगा। कोई आनंद की किरण उपलब्ध नहीं होगी।
कोई प्रेम का संगीत नहीं सुनाई पड़ेगा। हम सारे लोग यहां इकट्ठे हैं, कौन अपने भीतर प्रेम के संगीत को अनुभव करता है? कौन अनुभव करता है अपने भीतर सुगंध को जीवन की ? कौन अनुभव करता है जीवन की धन्यता को, कृतार्थता को? एक अर्थहीनता, एक मीनिंगलेसनेस हमें पकड़े है। लेकिन किसी भांति हम जीए जाते हैं कल की आशा में, शायद कल सब ठीक हो जाएगा। लेकिन जिसका आज गलत है, उसका कल कैसे ठीक होगा? क्योंकि कल तो आज से ही निकलेगा, आज से ही पैदा होगा। अगर आज दुख से भरा है, तो स्मरण रखें, कल आनंद से भरा हुआ नहीं हो सकता है; क्योंकि कल का जन्म तो आज से होगा। कल आने वाला जीवन आप पैदा करेंगे, उसे आप प्रतिक्षण पैदा कर रहे हैं। तो यदि आज दुखी हैं, तो जान लें कि कल भी दुखी रहेंगे।
कल की आशा में, कल की सुख की आशा में आज के दुख को झेला तो जा सकता है, लेकिन कल के सुख को निर्मित नहीं किया जा सकता। कल के आनंद की कल्पना में आज की पीड़ा को सहा जा सकता है, लेकिन कल के आनंद को पैदा नहीं किया जा सकता।
इसलिए आनंद है केवल आशा और जीवन है दुख, ऐसा हमारे सबके अनुभव में है। यह कोई सिद्धांत की बात नहीं है। जो भी अपने जीवन को थोड़ा सा खोल कर देखेगा, उसे यह दिखाई पड़ेगा। ये सीधे तथ्य हैं।
अज्ञान का बोध
जीवन के संबंध में पहला तथ्य यही है कि जिस भांति हम उसे जी रहे है, उस भांति कहीं कोई, कहीं कोई आनंद का फूल उसमें नहीं लगता है और न लग सकता है। इसलिए कल की आशा पर कि कल ठीक हो जाएगा-कल, आने वाले वर्ष या आने वाली जिंदगी में- परलोक में, पुर्नजन्म में सब ठीक हो जाएगा, यह सब कल की आशा का विस्तार है। कोई सोचता हो कि इस जन्म के बाद अगले जन्म में सब ठीक हो जाएगा, वह उसी तरह की भ्रांति में है जिस तरह की भ्रांति में जो सोचता है, आज दुख है, कल शांति, कल सुख हो
जाएगा। कोई सोचता हो, मोक्ष में सब ठीक हो जाएगा, तो भ्रांति में है; क्योंकि कल मुझसे पैदा होगा। आने वाला जन्म भी, मोक्ष भी, जो भी होने वाला है, वह मुझसे पैदा।
होगा ! और अगर मेरा आज अंधकारपूर्ण है, तो कल मेरा प्रकाशित नहीं हो सकता। फिर क्या हम निराश हो जाएं और कल की सारी आशा छोड़ दें?
मैं आपसे कहता हूं : निश्चित ही कल के प्रति कोई आशा रखने का कारण नहीं है। लेकिन इससे निराश होने का भी कोई कारण नहीं है। आज के प्रति आशा से भरा जा सकता है। आज को परिवर्तित किया जा सकता है। मैं जो हूं, उस होने में क्रांति लाई जा सकती है। मैं कल क्या होऊंगा, इसके द्वारा नहीं; बल्कि जो मैं अभी हूं, उसके ज्ञान, उसके बोध, उसके प्रति जागरण से, उसे जान लेने से।
आत्म-स्मृति से क्रांति उत्पन्न हो सकती है।
यदि मैं जान सकूं स्वयं को, तो वह दीया उपलब्ध हो जाएगा जो मेरे जीवन से अंधकार को नष्ट कर दे। और स्वयं को जाने बिना और न कोई दीया है और न कोई प्रकाश है, न कोई आशा है।
पहली बात, हम स्वयं को नहीं जानते हैं। यह जान लेना स्वयं को जानने के प्रति पहला चरण है।
कोई सोचता हो कि मैं स्वयं को जानता हूं, तो स्वयं को जानने के प्रति द्वार बंद हो जाएंगे। और धर्म की बहुत सी शिक्षाओं ने, संस्कृति ने, इधर हजारों वर्ष से दोहराए गए सिद्धांतों ने, आत्मा और परमात्मा की बातों ने हममें से बहुतों को यह भ्रम पैदा कर दिया है कि हम अपने को जानते हैं। इस भ्रम ने हमारे आत्म-अज्ञान को गहरा किया है। स्वयं को जानने के भ्रम से बड़ा - इन शब्दों और सिद्धांतों के आधार पर स्वयं को जानने के भ्रम से बड़ा, आत्म-ज्ञान में और कोई दूसरा अटकाव, कोई दूसरी दीवाल, कोई दूसरा अवरोध नहीं है। छोटे से बच्चे भी जानते हैं कि हम आत्मा हैं और बूढ़े भी दोहराते हैं कि हम आत्मा हैं। ये शब्द हैं। यह सत्ता का अनुभव हो, तो जीवन बिलकुल दूसरा हो जाए। ये सिद्धांत है। यह स्वयं की प्रतीति और साक्षात हो, तो जीवन नया हो जाए और जीवन आनंद से भर जाए। लेकिन इन शब्दों को हमने सहारों की भांति पकड़ा हुआ है। अज्ञान में, इन शब्दों से पैदा हुए झूठे ज्ञान को, हमने बहुत तीव्रता से पकड़ा है।
उसे छोड़ने में भी भय मालूम होता है। इसलिए जैसे-जैसे आदमी मृत्यु के करीब पहुंचता है, वैसे-वैसे इन शब्दों को और जोर से पकड़ लेता है। वैसे-वैसे गीता और कुरान और बाइबिल उसके मस्तिष्क पर
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