भक्त माल कथा माला || 17 || केले की मार्मिक कथा

केले के फल की कथा
आपको मालूम है कि यह केले का पेड़ कौन है? माघ के मास में लोग इसका पूजन करते हैं। इसके पत्तों के बंदनवार लगाते हैं। शुभ कार्य में और सत्यनारायण भगवान की पूजा में केले के पत्ते लगाए जाते हैं और बृहस्पतिवार को केले का पूजन होता है?  

क्यों?

शायद आप नहीं जानते हैं चलिए हम ही बता देते हैं कि केले के वृक्ष की कथा दुर्वासा ऋषि से जुड़ी हुई है। 
कौन है यह दुर्वासा ऋषि ? 
आप सभी जानते होंगे कि ये वे ऋषि हैं जिनके श्राप से देव, यक्ष, नाग, किन्नर, दानव, मानव आदि सभी डरते थे।

कैसे हुआ ऋषि दुर्वासा का जन्म

भगवान शिव के अवतार होने के कारण ऋषि दुर्वासा के स्वभाव में भी जन्म से ही क्रोध का ज्वालामुखी समाहित था। दुर्वासा ऋषि को छोटी-छोटी बातों पर क्रोध आ जाता था और वे श्राप दे देते थे। 

पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय माता पार्वती, भगवान शिव के साथ एकाकी समय व्यतीत कर रहीं थीं । तभी अचानक से देवताओं ने उनके एकांतवास में खलल डाल दिया। उनके इस दुषकार्य के श बाद भगवान शिव का क्रोध अपने चरम पर पहुंच गया।

भगवान शिव का क्रोध देख सभी देवता छुप गए। इतने में माता अनुसूया भगवन शिव और मां पार्वती के दर्शनों के लिए पहुंची। माता अनुसूया को आता देख माता पार्वती ने भगवान शिव को शांत कराने की कोशिश की। भगवान शिव शांत तो हो गए लेकिन उनके क्रोध से उत्पन्न ऊर्जा कैलाश में इधर-उधर टकराकर कैलाश का ही नुकसान पहुंचाने लगी। 

अनुसूया के आने की बात सुनकर भगवान शिव ने पार्वती को बताया कि वह इस ऊर्जा को पुनः अपने अंदर नहीं समा सकते हैं क्योंकि यह ऊर्जा उनके तीसरे नेत्र से निकली है और उनका तीसरा नेत्र अगर दोबारा खुला तो उससे सृष्टि को और भी भारी नुकसान होगा।

माता अनुसूया भगवान की असीम भक्त थी और माता पार्वती से पुत्र की कामना के लिए मिलने आई थी। सभी देवतागण और महादेव के परिवार के सदस्य माता अनुसूया के पास पहुंचे और उन से भगवान शिव के शांत करने की प्रार्थना करने लगे।

 कैलाश पर्वत को खतरे में देखकर माता अनुसूया भगवान शिव से शांत होने की प्रार्थना करने लगे। तब अनसूया से महादेव बोले, " देवी ! इस क्रोध से केवल आप ही इस कैलाश को बचा सकती हैं। देवी ! अपने तपोबल से मेरी इस क्रोध ऊर्जा को अपने भीतर धारण करो। इसी से तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी और तुम्हारा कल्याण होगा।'

माता अनुसूया ने महादेव की आज्ञा से उस ऊर्जा को अपने शरीर में धारण कर लिया। जो उनके गर्भ में जाकर स्थित हो गई। यही ऊर्जा दुर्वासा के रूप में उनके गर्भ से उत्पन्न हुई। महादेव की क्रोधाग्नि से प्रकट होने के कारण स्वभाव में अत्यंत क्रोध समाहित हो गया। उनकी क्रोधित स्वभाव के कारण उनके साथ रहना बहुत कठिन था। जिस कारण उनका नाम दुर्वासा पड़ गया।

दुर्वासा' (अर्थात् जिसके साथ रहना या वास करना मुश्किल हो ।)

तो यह थी दुर्वासा जी के जन्म की कथा।

अब आते हैं केले की कथा पर जैसा कि सभी जानते हैं कि दुर्वासा ऋषि को उनके भयंकर क्रोध के लिए जाना जाता है। महादेव से लेकर देवराज इंद्र तक ऐसे कोई भी देवी या देवता न थे जो दुर्वासा ऋषि के गुस्से के भागी न बने हों।

केले के पेड़ की पेड़ की कथा
केले के पेड़ की पेड़ की कथा मालूम है तुमको ।
कि यह केले का वृक्ष कौन है?
माघ के महीने में लोग इसका पूजन करते हैं।
बंदनबार में केले के पत्ते लगाते हैं सत्यनारायण भगवान की पूजन में केले के पत्ते लगते हैं। शुभ कार्य में केले के पत्तों को लगाया जाता है । 
क्यों ?

दुर्वासा ऋषि भगवान शिव की भक्ति में लीन रहते थे। भगवान के भजन में लीन रहते थे । भगवान शिव के क्रोध का अंश अवतार होने के कारण, इनका क्रोध बहुत तीव्र था। उनके अंदर ऋषि संस्कार बचपन से ही प्रबल थे और वे 5 वर्ष की अवस्था आते-आते ध्यान-साधना में लीन रहने लगे थे। 

क्रोध उनके स्वभाव का मूल था और वे वेद वेदांगों का ज्ञान हो पाने के बाद भी अपने क्रोध को नहीं त्याग सके थे। बड़े होते-होते जब माता-पिता ने देखा कि बालक के अंदर वैराग्य अधिक उत्पन्न हो रहा है और वह समाज की व्यवहारिकता को नहीं समझ रहा है। 

अत्री ऋषि के मित्र थे ऋषि अमरीश, ऋषि अमरीश की एक बेटी थी । जिसका नाम कदली था ।

एक दिन उनके पिता माता-पिता को उनकी शादी की चिन्ता हुई तो वे अपने मित्र ऋषि अमरीश के घर उनकी बेटी को बहू रूप में मांगने के लिए गए।

जब अत्री और अनुसूईया, ऋषि अमरीश के आश्रम में पहुंचे। अतिथि सत्कार के उपरांत ऋषि अमरीश ने आने का कारण पूछा तो वे उनको प्रणाम करके बोले, " ऋषीवर ! हम आपकी कन्या को अपने पुत्र दुर्वासा के लिए मांगते हैं। कृपया मना मत कीजिए। माना कि वह बहुत क्रोधी है। शायद आपकी पुत्री के साथ से वह बदल जाए।"

इस पर अमरीश बोले, " ऋषीवर! आपकी बात ठीक है परंतु आपके पुत्र को इतना गुस्सा आता है। इतना क्रोध आता है तो मेरी बेटी को कितना कष्ट भोगना पड़ेगा। कितना दुख भोगना पड़ेगा । "

अत्री और अनुसूईया बोले, " ऋषीवर! हमारा पुत्र दुर्वासा क्रोध का थोड़ा तीव्र तो है। पर संस्कारी भी है।"

ऋषि अंबरीष दुर्वासा की क्रोधाग्नि को जानते थे, इसलिए पुत्री के साथ कोई अनिष्ट न हो इसके लिए भी चिंतित थे।

इस पर अमरीश बोले, " ऋषीवर! आपकी बात ठीक है परंतु इसके लिए मुझे आपके पुत्र दुर्वासा से बात करनी होगी।" अत्री और अनुसूईया इसके लिए सहमत हो गए। 

ऋषि दुर्वासा ने माता-पिता की आज्ञा मानकर कदली से विवाह करना स्वीकार कर लिया। वे अमरीश ऋषि के आश्रम पर पहुंच गए। उन्होंने उनका स्वागत सत्कार किया।

फिर ऋषि अमरीश ने दुर्वासा जी से कहा, " पुत्र ! तुम्हारी क्रोध अग्नि को कौन नहीं जानता ? इस स्थिति में अपनी पुत्री को आपको कैसे  शोंप सकता हूं । वह आपका क्रोध को कैसे झेलेगी। अगर उससे कुछ भी गलती हुई तो वह आपकी क्रोध अग्नि में जलकर राख हो जाएगी।"

इस पर दुर्वासा बोले, " महात्मान ! मैं आपको विश्वास दिलाता हूं की आपकी पुत्री मेरे साथ सुरक्षित रहेगी। मैं उसके 100 अपराध क्षमा करने का वचन देता हूं, लेकिन 101वें अपराध पर मैं अपने क्रोध को रोक पाऊंगा या नहीं मैं यह नहीं जानता।
इतना अवश्य कहता हूं कि आपकी पुत्री सौ अपराध करने तक सुरक्षित है।"

अपनी पुत्री को 100 अपराधों तक सुरक्षित जानकर अमरीश ने उसका विवाह दुर्वासा जी के साथ कर दिया। 

ऋषि अमरीश अपनी पुत्री को समझाते हुए बोले, " बेटी कदली ! तुम्हारे पति दुर्वासा के क्रोध को पूरा जगत जानता है। परंतु मैंने तुम्हारे सौ अपराध माफ करने का वचन ले लिया है अतः तुम भूल कर भी 101वां अपराध मत करना।"

कदली बोली, "पिताजी ! मैं पूरा प्रयास करूंगी।" 

इसके बाद ऋषि अमरीश जी ने अपनी पुत्री को विदा कर दिया। कदली भी अपने पति और ससुर की तरह भगवान शिव की अनन्य भक्त थी। वह शंकर की भक्ति में डूबी रहती थी । शंकर के स्मरण में डूबी रहती थी। ऐसा कोई दिन नहीं होता कि वह भगवान शंकर को जल ने चढ़ाए।

कदली को मालूम था कि उसके पति उसकी 100 गलती माफ करेंगे। तो वह गलती करती और भूल जाती। इस प्रकार उससे गलती पर गलती होती गई और दुर्वासा जी माफ करते गए। 

कंदली स्वभाव से कर्मठ और बहुत समझदार थीं। गृहस्थ जीवन में कुछ बातें ऊपर-नीचे तो होती ही रहती हैं। वह हर एक बात का ख्याल रखती कि उससे कोई गलती ना हो। लेकिन फिर भी कभी-कभी कुछ न कुछ हो ही जाता था, लेकिन ऋषि ने कदली पर कभी क्रोध नहीं किया। ऐसा होने से धीरे-धीरे कंदली के स्वभाव में भी निश्चिंतता आने लगी।

यह कहानी हमें बताती है कि भगवान भोलेनाथ पर चढ़ाया गया जल कब काम आता है। कदली से गलती पर गलती होती गई और दुर्वासा जी माफ करते गए। 

आज दुर्वासा जी कदली से बोले, " कदली ! तुम्हारी 100 गलती हो चुकी है। तुम अपनी गलतियों से सीख लेने की बजाय और गलती करती जाती हो। अब ध्यान रखना की कोई गलती ना हो, अब यदि तुमसे गलती होती है, तो मैं नहीं जानता कि मुझे क्या अनर्थ हो जाए।"

"ठीक है प्रभु" , कहकर कदली फिर से भगवान शिव की आराधना में लग गई। एक दिन ऋषि कहीं से प्रवास कर कुछ देरी से आए। रात में भोजन के बाद उन्होंने विश्राम के लिए जाते हुए कदली से कहा, " कदली ! मुझे कल ब्रह्म मुहूर्त में जरूरी अनुष्ठान करना है। मुझे कल ब्रह्म मुहूर्त में जरूर उठा देना । मैं खुद भी कोशिश करूंगा, लेकिन थकान के कारण शायद ऐसा संभव न हो। 

अगली सुबह कंदली की ब्रह्म मुहूर्त में नींद तो खुली, लेकिन आलस के कारण न तो वह खुद उठीं और न हीं ऋषिवर को उठाया। सुबह सूर्योदय के बाद जब ऋषि की आंख खुली तो दिन चढ़ आया था। सूर्य देव सिर पर खड़े थे। अपना अनुष्ठान न कर पाने के कारण वे कंदली पर बहुत क्रोधित हुए। 

उन्होंने गुस्स में आकर कदली से कहा, " कदली ! तेरे आलस के कारण मैं अपना अनुष्ठान नहीं कर पाया। तुझे नहीं उठाना तो नहीं उठती; लेकिन मुझे तो उठा देती । लेकिन तू आलस के  कारण जिस तरीके से पड़ी रही। जा मैं तुझे श्राप देता हूं कि तू भस्म हो जा।

ऋषि के शाप का तुरंत असर हुआ और कंदली जल कर राख हो गई। वह राख का ढेर बन गई।

ऋषि अमरीश का मन अपने आश्रम में नहीं लग रहा था इसलिए से अपनी बेटी कदली से मिलने चले आए। लेकिन जब वे ऋषि दुर्वासा जी के आश्रम में पहुंचे तो वहां कदली को रख के ढेर में बदला पाया। कंदली के पिता ऋषि अंबरीश अपनी पुत्री को राख बना देखकर बहुत दुखी हुए।

भगवान भोलेनाथ अपने भक्तों पर कैसे कृपा करते हैं। यह कथा में बताती है। कदली भगवान भोलेनाथ को जिस जल से रोज स्नान करती, उनके स्थान को धोती और उन पर लौटा भर कर जल चढ़ाती थी तो वह जल एक स्थान पर जाकर रुक जाता था । आज अनायास ही उस जल का बांध वहां से टूट गया और जहां कादली की राख पड़ी थी। वहां आकर उसमें मिल गया। 

तब भगवान शिव प्रकट हो गए। दुर्वासा जी और अमरीश जी दोनों हाथ जोड़कर खड़े हो गए। दुर्वासा जी बोले, "प्रभु आप !" 
तो भगवान शंकर बोले, " हाँ ! यह कदली मेरी उपासक है। मुझे रोज जल चढ़ाती है। आपने इसकी गलती पर इसे श्राप देकर भस्म कर दिया। मैं इसे वर देता हूं कि कदली तुझे मेरे जल का स्पर्श हुआ है, इसलिए कदली तू केले के रूप में प्रकट होगी और सभी देवी देवताओं की पूजा उपासना आराधना में उपयोग में लाई जाएगी। अर्थात सारे देवताओं के शुभ कार्य में तू हमेशा अग्रणी रहेगी। तेरा फल कभी खराब नहीं होगा और 12 मास उपलब्ध रहेगा। तेरा फल सभी देवी देवताओं पर चढ़ेगी किसी पर भी प्रतिबंध नहीं होगा।

33 कोटी देवी देवताओं की पूजन में, मुहूर्त में, अनुष्ठानों में, प्रतिष्ठा में, केले के खंब लगाए जाएंगे। 

1000 सोने की थाली, ढाई हजार कांसे का पात्र, 25,000 पीतल के पात्र पर भोजन का वो फल नहीं मिलेगा जो फल एक केले के पत्ते पर भोजन करने या कराने से मिलेगा। 

कदली 33 कोटी देवी देवताओं का कोई भी अनुष्ठान हो सत्यनारायण की कथा हो, बृहस्पतिवार का व्रत हो, वह सब का अनुष्ठान तेरे ही उपस्थिति में ही पूर्ण होगा।

लेकिन इससे अमरीश जी की निराशा नहीं गई । उनका दुख दूर नहीं हुआ । 

तब भगवान शंकर ने उनके मनोबल को भांपते हुए; उन्हें अपने तपोबल से एक दृश्य दिखाया। 

बृहस्पति देव को अकेला बनने का श्राप

एक बार देव राज इंद्र और देव गुरू वृहस्पति को अपने पद को लेकर अभिमान आ गया। वृहस्पति को अभिमान हुआ कि मे देव गुरु हूं, और इंद्र को अभिमान हुआ कि मैं देव राज हू। इसी अभिमान वसीभूत होकर दोनों में चर्चा हुई कि सभी देवी-देवता हमारा सत्कार करते हैं, हमे प्रणाम करते हैं लेकिन महादेव शंकर हमारा सत्कार नहीं करते, हमे प्रणाम नहीं किया करते। दोनों ने अभिमान वस सोचने लगे कि अब तो शिव जी से बात करनी ही पड़ेगी। 

यह कहते हुए दोनों (इंद्र और वृहस्पति) शिव जी से बात करने के लिए कैलाश पर्वत की ओर चल पड़े।

उधर भगवान शिव ने दोनों (इंद्र और वृहस्पति) की बातों को जिन लिया और अपना फक्कड़ (भिकारी) का भेष बनाकर कैलाश पर्वत के बाहर बैठ गए। जैसे ही इंद्र और वृहस्पति दोनों कैलाश पर्वत पहुंचे भगवान शिव से मिलने तो उन्होंने कैलाश पर्वत के बाहर बैठे भिखारि को देख कर, उससे कहा कि कहां है तेरा भोला शिव जा और उससे बोल की देवराज और देवगुरु आए हैं, आकार उनका सत्कार करो, लेकिन उस भिखारि ने कोई जवाब नहीं दिया। 

इंद्र और वृहस्पति के बार बार कहने पर भी जब भिखारि ने कोई जवाब नहीं दिया तो अभिमान से भरे हुए इंद्र और वृहस्पति को क्रोध आ गया और इंद्र ने भिखारि के बाल पकड़कर उस पर बज्र का प्रहार कर दिया। इंद्र के बज्र से प्रहार करते ही भिखारि के भेष लिए शिव असली रूप मे आ गए और दोनों को श्राप दे दिया।

इंद्र को श्राप दिया कि हे इंद्र तू देवताओ का राजा होते हुए भी अभिमानी है, अतः तेरा राज्य दैत्यों के द्वारा छीन लिया जाएगा। और वृहस्पति को श्राप दिया कि हे वृहस्पति तू गुरु है, तेरे पास प्रेम और त्याग नाम की कोई वस्तु नहीं है, तू ज्ञानी होते हुए भी तेरी बुद्धी जड़ के समान है, अतः मैं तुझे श्राप देता हूं कि आज से तू जड़ वृक्ष बन जा।

श्राप मिलते ही इंद्र और वृहस्पति को ज्ञान हुआ, उनकी बुद्धी मे लगा अभिमान का पर्दा हटा और उनको एहसास हुआ कि ये हमने क्या कर दिया। दोनों महादेव के चरणों में गिर गए और अपने किए हुए कृत्य के लिए क्षमा मांगने लग गए। 

तब शिव जी ने दोनों को क्षमा किया और दोनों को अपने चरणों से उठाकर कहा कि मेरा दिया हुआ श्राप तो झूठा नहीं हो सकता है। लेकिन हे इंद्र जब जब भी दानव तेरा राज्य छीन लेंगे तो तब तब हम देव (मैं शिव और विष्णु) तेरा राज्य दानवों से बचा लेंगे और वृहस्पति से कहा कि हे वृहस्पति मेरे श्राप के कारण तू जड़ वृक्ष तो बनेगा, पर मैं शिव तुझे आशीर्वाद देता हूं कि तेरा वृक्ष सर्वश्रेष्ठ वृक्ष होगा और वह केले के पेड़ के नाम से प्रसिद्ध होगा। वह एसा वृक्ष होगा कि ना अग्नि उसे जला सकेगी और ना पानी उसे गला सकेगा और तेरा फल बारह मास में उपलब्ध होता रहेगा और लोग इसकी पूजा करेंगे और इसमे स्वयं भगवान विष्णु का निवास होगा।

तब से ही देवगुरु वृहस्पति पेड़ के रूप में प्रकट हुए और केले के पेड़ के रूप में सदा के लिए पुज्य हुए।

और बोले यह बृहस्पति देवी थे जो तुम्हारी पुत्री की कादरी के रूप में उत्पन्न हुए थे। यह तो नियति थी जो आज पूर्ण हो गई।

परंतु कादरी एक स्त्री और उसके सम्मान को देखते हुए वृक्ष ऐसा वृक्ष होगा जिसमें कोई लकड़ी नहीं होगी वह अपने पत्ते रूपी वस्त्रों से पूर्णतया ढंकी रहेगी।

केले के वृक्ष को संस्कृत में कदली कहते हैं । कदली स्त्रीलिंग है और इसके फल को कदली फल अर्थात केला कहा जाता है।
केले के वृक्ष को पेड़ नहीं माना जाता है क्योंकि इसमे लकड़ी नहीं होती है। केले का वृक्ष हर मौसम में फल दे सकता है। यह अपने जीवन में केवल एक बार भी फल देता है।


ऐसा है केले के पेड़ का स्वरूप
केले के पेड़ को ध्यान से देखें तो यह किसी भारतीय स्त्री की कल्पना जैसा लगता है. पत्तों-पत्तों में लिपटा तना ऐसा लगता है, जैसे किसी महिला ने साड़ी लपेट रखी है और सबसे ऊपरी भाग में फलों से लदी शाखानुमा आकृति जमीन की ओर ऐसी लटकती है, जैसे फूलों से सजी हुई किसी महिला की चोटी. 

दरअसल, यह संरचना यूं ही नहीं है. असल में यह एक स्त्री का ही रूप है. इसका वर्णन पुराण कथा में मिलता है, जिसका संबंध सबसे क्रोधी ऋषि दुर्वासा से है।

 तब से लेकर आज तक हिंदू धर्म में इसे पवित्र और पूजनीय पौधा माना जाता है।

इसके चौड़े पत्तों में श्रहरि का वास माना जाता है तो जड़ों में महादेव का जिसे मूल शंकर कहते हैं. 

यही वजह है कि केले के पेड़ की गुरुवार को पूजा होती है।

केले का कोई बीज नहीं होता है 

केले के पेड़ का आध्यात्म बहुत (Banana Tree Spiritual Importance) महत्व है. इसे भगवान विष्णु का स्वरूप माना जाता है. 




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ऋषि दुर्वासा के भयंकर श्राप से उत्पन्न हुआ पेड़, जानिए पूजा में कैसे पूज्यनीय बन गया केला
  • ऋषि दुर्वासा के क्रोध का परिfallbackणाम है केले का पेड़
  • ऋषि पत्नी कंदली के भस्म होने से उत्पन्न हुआ केला

नई दिल्लीः पूजा व्रत विधान में केले का फल प्रसाद में, केले के पत्ते पूजा स्थल को सजाने में और केले का पौधा किसी भी स्थान को पूजा स्थल की मान्यता देने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है.

आरोग्य की नजर में संपूर्ण आहार वाला फल केला, आध्यात्म की नजर में भी बहुत पवित्र और पूजनीय (spiritual benefits of banana) है. इसके चौड़े पत्तों में श्रहरि का वास माना जाता है तो जड़ों में महादेव का जिसे मूल शंकर कहते हैं. 

केले का कोई बीज नहीं होता है और इस पेड़ में तना भी नहीं होता है. सिर्फ पत्तों ही पत्तों में परत दर परत लिपटा यह पेड़ इतना अलग और विशेष क्यों है, कैसे हुआ इसका जन्म, पुराणों में इसकी कथा (Banana Tree Katha in Hindi) भी बहुत रोचक और आश्चर्य में डालने वाली है. 

ऐसा है केले के पेड़ का स्वरूप
केले के पेड़ को ध्यान से देखें तो यह किसी भारतीय स्त्री की कल्पना जैसा लगता है. पत्तों-पत्तों में लिपटा तना ऐसा लगता है, जैसे किसी महिला ने साड़ी लपेट रखी है और सबसे ऊपरी भाग में फलों से लदी शाखानुमा आकृति जमीन की ओर ऐसी लटकती है, जैसे फूलों से सजी हुई किसी महिला की चोटी. 

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दरअसल, यह संरचना यूं ही नहीं है. असल में यह एक स्त्री का ही रूप है. इसका वर्णन पुराण कथा में मिलता है, जिसका संबंध सबसे क्रोधी ऋषि दुर्वासा से है. 

यह है केले के पेड़ की कथा (Banana Tree Katha)
एक कथा के अनुसार महर्षि अत्रि और अनुसूया के पुत्र दुर्वासा बहुत ही क्रोधी स्वभाव के थे. लेकिन उनके अंदर ऋषि संस्कार बचपन से ही प्रबल थे और वह 5 वर्ष की अवस्था आते-आते ध्यान-साधना में लीन रहने लगे थे. दरअसल दुर्वासा खुद महादेव के क्रुद्ध स्वरूप रुद्र के अंश से उत्पन्न हुए थे.

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क्रोध ही उनके स्वभाव का मूल था और वह तमाम ज्ञान हो पाने के बाद भी इसे नहीं त्याग सके थे. बड़े होते-होते जब माता-पिता ने देखा कि बालक के अंदर वैराग्य अधिक उत्पन्न हो रहा है और वह समाज की व्यवहारिकता को नहीं समझ रहा है तब उन्होंने उनका विवाह ऋषि अंबरीष की कन्या से करा दिया. 

ऋषि दुर्वासा और कंदली का विवाह
ऋषि अंबरीष ने अपनी कन्या के कई गुण बताए और ऋषि दुर्वासा ने माता-पिता की आज्ञा मानकर विवाह कर लिया. ऋषि अंबरीष दुर्वासा की क्रोधाग्नि को जानते थे, इसलिए पुत्री के साथ कोई अनिष्ट न हो इसके लिए भी चिंतित थे.

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उन्होंने ऋषि दुर्वासा से पत्नी से कोई भूल हो जाए तो उसे क्षमा कर दिए जाने की प्रार्थना की. तब ऋषि ने उन्हें वचन दिया कि वह अपनी पत्नी के 100 अपराध क्षमा करते रहेंगे. 

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कंदली में आने लगी निश्चिंतता
गृहस्थ जीवन में कुछ बातें ऊपर-नीचे तो होती ही रहती हैं. ऋषि दुर्वासा की पत्नी का नाम था कंदली, जो कि स्वभाव से कर्मठ और बहुत समझदार थीं. वह हर एक बात का ख्याल रखती थीं. लेकिन फिर भी कभी-कभी कुछ न कुछ हो ही जाता था, लेकिन ऋषि ने उन पर कभी क्रोध नहीं किया. ऐसा होने से धीरे-धीरे कंदली के स्वभाव में भी निश्चिंतता आने लगी. 

दुर्वासा ने दिया निर्देश
लेकिन एक दिन ऋषि कहीं से प्रवास कर कुछ देरी से आए. रात में भोजन के बाद उन्होंने विश्राम के लिए कहा साथ ही पत्नी से कहा कि मुझे कल ब्रह्म मुहूर्त में जरूर उठा दें. मैं खुद भी कोशिश करूंगा, लेकिन थकान के कारण शायद ऐसा संभव न हो. ब्रह्म मुहूर्त में ऋषिवर को जरूरी अनुष्ठान करना था. 

कंदली ने दिखाया आलस
अगली सुबह कंदली की ब्रह्म मुहूर्त में नींद तो खुली, लेकिन आलस के कारण न तो वह खुद उठीं और न हीं ऋषि को उठाया. सुबह सूर्योदय के बाद जब ऋषि की आंख खुली तो दिन चढ़ आया था. अपना अनुष्ठान न कर पाने के कारण वह कंदली पर बहुत क्रोधित हुए और उन्हें भस्म हो जाने का श्राप दे दिया. 

ऐसे बन केले का पेड़
ऋषि के शाप का तुरंत असर हुआ और कंदली राख बनकर रह गई. ऋषि को भी इस घटना पर बहुत दुख हुआ, लेकिन अनुशासन स्थापित करने के लिए उन्हें ऐसा करना पड़ा. जब कंदली के पिता ऋषि अंबरीश आए तो अपनी पुत्री को राख बना देखकर बहुत दुखी हुए.

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तब दुर्वासा ऋषि ने कंदली की राख को पेड़ में बदल दिया और वरदान दिया कि अब से यह हर पूजा व अनुष्ठान का बनेगी. इस तरह से केले के पेड़ का जन्म हुआ और कदलीफल यानी केले का फल हर पूजा का प्रसाद बन गया. यही वजह है कि केले के पेड़ की गुरुवार को पूजा होती है. 


ऋषि दुर्वासा भगवान शिव के पुत्र कहलाते हैं. ऋषि दुर्वासा की उत्पत्ति क्रोध के कारण हुई थी. ऋषि दुर्वासा माता अनुसुइया और ऋषि अत्री के पुत्र थे.

हिंदू धर्म ग्रंथों में ऋषि दुर्वासा का उल्लेख मिलता है. दुर्वासा बेहद महान और ज्ञानी ऋषि हुआ करते थे. ऋषि दुर्वासा रामायण और महाभारत काल का भी हिस्सा रहे हैं. 










तो ये थी दुर्वासा ऋषि के जन्म की कथा। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी हो तो इसे फेसबुक पर जरूर शेयर करें और इसी तरह के अन्य लेख पढ़ने के लिए जुड़ी रहें आपकी अपनी वेबसाइट हरजिन्दगी के साथ। आपका इस बारे में क्या ख्याल है? हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

 ऋषि दुर्वासा का गुस्सा था खतरनाक

पंडित इंद्रमणि घनस्याल बताते हैं कि  ऋषि दुर्वासा अपने क्रोध में किसी को भी श्राप दे देते थे, इसलिए सभी देवता भी उनका आदर करते थे और उनके क्रोध से डरते थे. पौराणिक शास्त्रों के अनुसार, महाभारत में दुर्वासा ऋषि के मंत्र से ही कुंती ने सूर्यपुत्र कर्ण को जन्म दिया था. वहीं, महाभारत काल में लक्ष्मण की मृत्यु का कारण भी ऋषि दुर्वासा को ही माना जाता है

ऋषि दुर्वासा का जीवन परिचय

ऋषि दुर्वासा माता अनुसुइया और ऋषि अत्री के पुत्र थे. ऋषि दुर्वासा अपने माता पिता की आज्ञा लेकर तपस्या करने के लिए चले गए. ऋषि दुर्वासा अन्न और जल का त्याग करके तपस्या में लीन रहने लगे. ऋषि दुर्वासा ने सभी नियमों का पालन करते हुए सारी सिद्धियां प्राप्त कर ली थी. इसलिए ऋषि दुर्वासा सिद्ध योगी कहलाए. ऋषि दुर्वासा ने कुछ समय पश्चात यमुना नदी के किनारे अपने आश्रम का निर्माण किया और अपना पूरा जीवन आश्रम में बिताया. ऋषि दुर्वासा अत्यंत बुद्धिजीवी थे और उन्होंने कई ऋचाओं की रचना की थी. मान्यता है कि ऋषि दुर्वासा त्रेतायुग, द्वापरयुग और सतयुग में भी जीवित थे.

हिंदू धर्मग्रंथों में , दुर्वासा ( संस्कृत : दुर्वासा , आईएएसटी : दुर्वासा ), जिन्हें दुर्वासा ( संस्कृत : दुर्वासा ) के नाम से भी जाना जाता है , एक पौराणिक [1] [2] ऋषि (ऋषि) हैं। वह अनसूया और अत्रि के पुत्र हैं । कुछ पुराणों के अनुसार , दुर्वासा शिव के आंशिक अवतार हैं , [3] जो अपने क्रोधी स्वभाव के लिए जाने जाते हैं। वह जहां भी जाते हैं, मनुष्य और देवता समान रूप से उनका बड़ी श्रद्धा से स्वागत करते हैं। [4]

दुर्वासा

एक चित्र जिसमें दुर्वासा को शकुंतला को श्राप देते हुए दर्शाया गया है

शिव (पुराण)

अभिभावक

अत्रि (पिता)

अनसूया (माँ)

भाई-बहन

दत्तात्रेय (भाई)

चंद्रा (भाई)

जीवनसाथी

कदली

श्राप और वरदान

कहा जाता है कि ऋषि दुर्वासा क्रोधी स्वभाव के थे और उन्होंने हिंदू धर्मग्रंथों में कई उल्लेखनीय देवताओं और लोगों को श्राप दिया था और वरदान भी दिए थे। उनमें से कुछ में शामिल हैं:

शाप

इंद्र के हाथी ऐरावत द्वारा दुर्वासा द्वारा इंद्र को दी गई सुगंधित माला को नीचे फेंकने के बाद उन्होंने इंद्र को अपनी सारी शक्तियां खोने का श्राप दिया था । [5] [6] [7]

सरस्वती , जिसे उन्होंने मनुष्य के रूप में जन्म लेने का श्राप दिया था क्योंकि वह उनके गलत वेद पाठ पर हँसी थी। [8]

रुक्मिणी , जिन्हें उन्होंने अपने पति कृष्ण से अलग होने का श्राप दिया था, क्योंकि उन्होंने दुर्वासा की अनुमति के बिना पानी पी लिया था। [9]

शकुंतला , जो ऋषि कण्व के आश्रम में रहते हुए दुर्वासा से बचती थी, जिससे दुर्वासा ऋषि क्रोधित हो गए, जिन्होंने उसे श्राप दिया कि दुष्यंत उसे भूल जाएगा। बाद में दुर्वासा ने स्पष्ट किया कि जब वह उन्हें अपनी अंगूठी (जो उन्होंने पहले उन्हें दी थी) पेश करेगी तो दुष्यन्त उन्हें याद रखेंगे। [10] [11]

कदली, उनकी पत्नी, जिनसे अत्यधिक झगड़ा करने के कारण उन्होंने धूल के ढेर में मिल जाने का श्राप दिया था। [12]

भानुमती, यादवों के पूर्व नेता बानू की बेटी थीं । रायवत के बगीचे में खेलते समय भानुमती ने दुर्वासा को उकसाया , जिसके जवाब में दुर्वासा ने उसे श्राप दे दिया। बाद में जीवन में दानव निकुम्भ द्वारा उसका अपहरण कर लिया जाता है। हालाँकि, दुर्वासा ने स्पष्ट किया (शांत होने के बाद) कि भानुमती को कोई नुकसान नहीं होगा, और वह पांडव सहदेव से शादी करने से बच जाएगी ।

कृष्ण , जिन्हें उन्होंने आंशिक अजेयता का आशीर्वाद दिया। अनुशासन पर्व , जैसा कि कृष्ण ने अपने पुत्र प्रद्युम्न को बताया था, उस घटना का विवरण देता है जब दुर्वासा ने द्वारका में कृष्ण से मुलाकात की , और अनुरोध किया कि कृष्ण दुर्वासा के खाने के बाद बचे हुए पायसम से अपने शरीर पर लेप करें । कृष्ण ने इसका अनुपालन किया, और दुर्वासा ने उन्हें अपने शरीर के उन हिस्सों में अजेयता का आशीर्वाद दिया, जिन्हें उन्होंने पायसम से ढका था, यह देखते हुए कि कृष्ण ने कभी भी अपने पैरों के तलवों पर पायसम नहीं लगाया था। [16] कुरूक्षेत्र युद्ध की घटनाओं के वर्षों बाद कृष्ण की मृत्यु एक शिकारी द्वारा उनके पैर में तीर लगने से हुई, जिसने गलती से उसे हिरण समझ लिया था। [17]

कुंती , जिन्हें उन्होंने बच्चे पैदा करने के लिए देव को बुलाने में सक्षम मंत्र सिखाए थे। कर्ण का जन्म कुंती से हुआ और बाद में कुंती और उसकी सहपत्नी माद्री के मंत्रों के प्रयोग से पांचों पांडव भाइयों का जन्म हुआ। [18]

मूल


समुद्र मंथन

विष्णु पुराण , वायु पुराण और पद्म पुराण में , दुर्वासा द्वारा इंद्र को दिए गए श्राप को समुद्र मंथन का अप्रत्यक्ष कारण बताया गया है । श्रीमद्भागवत और अग्नि पुराण में भी इस प्रकरण में दुर्वासा की भागीदारी का उल्लेख किया गया है, बिना विस्तार से बताए। इस कहानी के अन्य स्रोत, जैसे कि रामायण , महाभारत , हरिवंश और मत्स्य पुराण , दुर्वासा की भागीदारी का बिल्कुल भी उल्लेख नहीं करते हैं और इस घटना को अन्य कारणों, जैसे देवों और असुरों की अमरता की इच्छा, के रूप में देखते हैं। [19]


विष्णु पुराण की एक कहानी के अनुसार, दुर्वासा, अपने व्रत के कारण परमानंद की स्थिति में पृथ्वी पर घूम रहे थे, एक विद्याधरी (वायु की अप्सरा) उनके पास आई और उनसे फूलों की स्वर्गीय माला की मांग की। अप्सरा ने आदरपूर्वक वह माला ऋषि को दे दी, जिसे उन्होंने अपने माथे पर पहन लिया। अपनी भटकन को फिर से शुरू करते हुए, दुर्वासा अपने हाथी, ऐरावत पर सवार होकर , देवताओं के साथ इंद्र के पास पहुंचे। फिर भी, उन्माद की स्थिति में, दुर्वासा ने इंद्र पर माला फेंकी, जिन्होंने उसे पकड़कर ऐरावत के सिर पर रख दिया। हाथी फूलों में रस की सुगंध से चिढ़ गया था, इसलिए उसने माला को अपनी सूंड से जमीन पर फेंक दिया।


अपने उपहार के साथ इतनी बेरुखी से पेश आते देख दुर्वासा क्रोधित हो गए और उन्होंने इंद्र को श्राप दिया कि जिस तरह माला को गिराया जाता है, उसी तरह वह भी तीनों लोकों पर अपने प्रभुत्व के पद से नीचे गिर जाएंगे। इंद्र ने तुरंत दुर्वासा से क्षमा मांगी, लेकिन ऋषि ने अपने श्राप को वापस लेने या नरम करने से इनकार कर दिया। श्राप के कारण इंद्र और देवताओं की शक्ति क्षीण हो गई और उनकी चमक भी क्षीण हो गई। इस अवसर का लाभ उठाते हुए, बाली के नेतृत्व में असुरों ने देवताओं के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। [21]


देवता निराश हो गए और मदद के लिए ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा ने उन्हें विष्णु की शरण लेने का निर्देश दिया । बदले में, विष्णु ने उन्हें सलाह दी कि वे असुरों के साथ युद्धविराम करें और उनके साथ इसे साझा करने के बहाने अमृत (अमरता का अमृत) प्राप्त करने के लिए दूध के सागर का मंथन करने में उनकी मदद करें। विष्णु ने वादा किया कि केवल देवता ही अपनी पूर्व शक्ति हासिल करने के लिए अमृत पीएंगे, ताकि वे एक बार फिर असुरों को हरा सकें। देवताओं ने विष्णु की सलाह मानी और असुरों के साथ समझौता कर लिया, और इस प्रकार देवताओं और राक्षसों ने अपने महान उद्यम की योजना बनाना शुरू कर दिया।


रामायण

वाल्मिकी रामायण के उत्तर कांड में दुर्वासा राम के द्वार पर प्रकट हुए और लक्ष्मण को द्वार पर पहरा देते देख राम से मिलने की मांग की । इस बीच, राम एक तपस्वी के वेश में यम (मृत्यु के देवता) के साथ निजी बातचीत कर रहे थे । बातचीत से पहले, यम ने राम को सख्त निर्देश दिए कि उनकी बातचीत गोपनीय रहेगी, और जो कोई भी कमरे में प्रवेश करेगा उसे मार दिया जाएगा। राम सहमत हो गए और उन्होंने लक्ष्मण को अपने द्वार की रक्षा करने और यम से अपना वादा पूरा करने का कर्तव्य सौंपा।


इसलिए, जब दुर्वासा ने अपनी मांग की, तो लक्ष्मण ने विनम्रतापूर्वक ऋषि से तब तक इंतजार करने को कहा जब तक कि राम अपनी बैठक समाप्त नहीं कर लेते। दुर्वासा क्रोधित हो गए, और उन्होंने धमकी दी कि यदि लक्ष्मण ने तुरंत राम को उनके आगमन की सूचना नहीं दी तो वे पूरी अयोध्या को शाप दे देंगे। दुविधा में पड़े लक्ष्मण ने फैसला किया कि पूरी अयोध्या को दुर्वासा के श्राप के तहत आने से बचाने के लिए बेहतर होगा कि वह अकेले ही मर जाएं, और इसलिए उन्होंने राम की बैठक में बाधा डालकर उन्हें ऋषि के आगमन की सूचना दी। राम ने तुरंत यम के साथ अपनी बैठक समाप्त की और उचित शिष्टाचार के साथ ऋषि का स्वागत किया। दुर्वासा ने राम को भोजन कराने की अपनी इच्छा बताई, और राम ने अपने अतिथि के अनुरोध को पूरा किया, जिससे संतुष्ट ऋषि अपने रास्ते चले गए। [22]


राम दुःख से भर गए, क्योंकि वह अपने प्रिय भाई लक्ष्मण को मारना नहीं चाहते थे। फिर भी, उसने यम को अपना वचन दे दिया था और उससे पीछे नहीं हट सकता था। उन्होंने इस दुविधा को सुलझाने में मदद के लिए अपने सलाहकारों को बुलाया। वशिष्ठ की सलाह पर , उन्होंने लक्ष्मण को हमेशा के लिए उन्हें छोड़ देने का आदेश दिया, क्योंकि जहां तक पवित्र लोगों का सवाल है, ऐसा परित्याग मृत्यु के समान है। तब लक्ष्मण सरयू तट पर गए और सरयू नदी में डूबकर संसार त्यागने का संकल्प लिया । [23]


महाभारत

महाभारत में , दुर्वासा को उन लोगों को वरदान देने के लिए जाना जाता है जो उन्हें प्रसन्न करते थे, खासकर जब उन्हें एक सम्मानित अतिथि के रूप में अच्छी तरह से परोसा गया था। इस तरह के व्यवहार का एक उदाहरण उनके और पांडु की भावी पत्नी और पांडवों की मां कुंती के बीच का प्रकरण है । जब कुंती एक युवा लड़की थी, तो वह अपने दत्तक पिता कुंतीभोज के घर में रहती थी । दुर्वासा एक दिन कुन्तिभोज के पास गये और उनका आतिथ्य मांगा। राजा ने ऋषि को अपनी बेटी की देखभाल का जिम्मा सौंपा और कुंती को उनके प्रवास के दौरान ऋषि के मनोरंजन और उनकी सभी जरूरतों को पूरा करने की जिम्मेदारी सौंपी। कुंती ने धैर्यपूर्वक दुर्वासा के गुस्से और उनके अनुचित अनुरोधों (जैसे कि रात के विषम समय में भोजन की मांग करना) को सहन किया और बड़े समर्पण के साथ ऋषि की सेवा की। आख़िरकार, ऋषि संतुष्ट हो गए। जाने से पहले, उन्होंने कुंती को अथर्ववेद मंत्र सिखाकर पुरस्कृत किया , जो एक महिला को उनके द्वारा बच्चे पैदा करने के लिए अपनी पसंद के किसी भी देवता का आह्वान करने में सक्षम बनाता है। जिज्ञासु और संशय में कुंती ने मंत्र का परीक्षण करने का निर्णय लिया। [24]

सूर्य देव का आह्वान करने के बाद , उन्होंने अपने पहले पुत्र, कर्ण को जन्म दिया । एक अविवाहित माँ के भाग्य के डर से, उसने नवजात शिशु को एक टोकरी में रखा और उसे नदी में बहा दिया। शिशु कर्ण को बाद में हस्तिनापुर के राजा के सारथी अधिरथ और उसकी पत्नी राधा ने पाया और पाला। इस प्रकरण के तुरंत बाद, कुंती का विवाह हस्तिनापुर के राजा पांडु से हुआ, और दुर्वासा द्वारा उन्हें सिखाए गए उन्हीं मंत्रों का उपयोग करके, उन्होंने पांडु के पांच पुत्रों में से तीन सबसे बड़े पुत्रों को जन्म दिया। कर्ण एक कुशल योद्धा और पांडवों का एक दुर्जेय प्रतिद्वंद्वी बन गया। यह शत्रुता अंततः उनके छोटे सौतेले भाई अर्जुन के हाथों , जो उनके भाईचारे के बंधन से अनजान है, कुरूक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में उनकी मृत्यु के रूप में समाप्त होगी। [24] दुर्वासा अपने रोंगटे खड़े कर देने वाले क्रोध के अलावा अपने असाधारण वरदानों के लिए भी जाने जाते हैं। शिव पुराण के अनुसार , एक बार नदी में स्नान करते समय दुर्वासा के वस्त्र नदी की धारा में बह गये। यह देखकर पास ही मौजूद द्रौपदी ने ऋषि को अपने वस्त्र दिए। दुर्वासा ने उसे यह कहकर आशीर्वाद दिया कि आवश्यकता के समय उसे कभी भी कपड़ों की कमी नहीं होगी, और यह उनके आशीर्वाद के कारण ही था कि कौरव जुआ हॉल में उसके कपड़े उतारने में असमर्थ थे, इस प्रकार उसकी लाज की रक्षा हुई। [25]

दुर्वासा के परोपकारी पक्ष का एक और उदाहरण वह घटना है जब उन्होंने दुर्योधन को वरदान दिया था। पांडवों के वनवास के दौरान, दुर्वासा और उनके कई शिष्य हस्तिनापुर पहुंचे । दुर्योधन अपने मामा शकुनि के साथ मिलकर ऋषि को संतुष्ट करने में कामयाब रहा। दुर्वासा प्रसन्न होकर उन्हें वरदान देते हैं। दुर्योधन, गुप्त रूप से चाहता था कि दुर्वासा क्रोध में पांडवों को श्राप दे, उसने ऋषि को द्रौपदी के भोजन करने के बाद जंगल में अपने चचेरे भाइयों से मिलने के लिए कहा, यह जानते हुए कि पांडवों के पास उसे खिलाने के लिए कुछ नहीं होगा। [25]

दुर्योधन के अनुरोध के अनुसार, दुर्वासा और उनके शिष्यों ने जंगल में पांडवों से उनके आश्रम में मुलाकात की। निर्वासन की इस अवधि के दौरान, पांडव अपना भोजन अक्षय पात्र के माध्यम से प्राप्त करते थे , जो द्रौपदी के भोजन समाप्त करने के बाद हर दिन समाप्त हो जाता था। चूँकि उस दिन दुर्वासा के आने से पहले ही द्रौपदी खाना खा चुकी थी, इसलिए उन्हें परोसने के लिए कोई भोजन नहीं बचा था और पांडव बहुत चिंतित थे कि अगर वे ऐसे आदरणीय ऋषि को खाना नहीं खिला पाए तो उनका क्या होगा। जब दुर्वासा और उनके शिष्य नदी पर स्नान कर रहे थे, द्रौपदी ने कृष्ण से मदद की प्रार्थना की। [25]

कृष्ण तुरंत द्रौपदी के सामने प्रकट हुए, उन्होंने घोषणा की कि वह भूखे हैं और उनसे भोजन मांगा। द्रौपदी हताश हो गई, और कहा कि उसने कृष्ण से प्रार्थना इसलिए की थी क्योंकि उसके पास देने के लिए कोई भोजन नहीं बचा था। तब कृष्ण ने उनसे अक्षय पात्र लाने के लिए कहा। जब उसने ऐसा किया, तो उसने चावल का एक दाना और सब्जी का एक टुकड़ा, जो उसे बर्तन में चिपका हुआ मिला, खा लिया और घोषणा की कि वह "भोजन" से संतुष्ट है।

इससे दुर्वासा और उनके शिष्यों की भूख शांत हो गई, क्योंकि कृष्ण (स्वयं विष्णु के अवतार) की संतुष्टि का मतलब सभी जीवित चीजों की भूख की संतुष्टि थी। ऋषि दुर्वासा और उनके शिष्य स्नान के बाद पांडवों के आश्रम में वापस आए बिना चुपचाप चले गए, क्योंकि उन्हें डर था कि उन्हें परोसे जाने वाले भोजन को अस्वीकार करने के अभद्र व्यवहार के कारण उन्हें पांडवों का क्रोध झेलना पड़ेगा। [25]

स्वामीनारायण 

दुर्वासा ने नारायण को शाप दिया।

स्वामीनारायण हिंदू धर्म के अनुयायियों के अनुसार , दुर्वासा के श्राप के कारण नारायण ने संत स्वामीनारायण के रूप में जन्म लिया। कहानी यह है कि कृष्ण के निधन के तुरंत बाद , उद्धव नर-नारायण के निवास स्थान बद्रीनाथ चले गए । वह कई दिव्य ऋषियों और संतों में शामिल हो गए जो वहां नर-नारायण के प्रवचन सुन रहे थे। जैसे ही नारा बोल रहे थे, दुर्वासा कैलाश पर्वत से सभा में पहुंचे , लेकिन किसी ने उन पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि वे सभी प्रवचन में इतने तल्लीन थे। [26]

उन्होंने एक घड़ी (12 मिनट) तक इंतजार किया, कि कोई उनका उस सम्मान के साथ स्वागत करेगा जिसके वे हकदार थे, लेकिन फिर भी, किसी को एहसास नहीं हुआ कि वह वहां थे। यह देखकर कि कोई भी उनका स्वागत करने के लिए नहीं खड़ा हुआ, उन्होंने इसे अपना अपमान समझा और पूरी सभा को श्राप दे दिया और कहा कि वे सभी मनुष्य के रूप में जन्म लेंगे और दुष्टों से अपमान और पीड़ा सहेंगे। नारा-नारायण के माता-पिता, भगवान धर्म और देवी भक्ति ने, दुर्वासा को शांत किया, जिन्होंने तब उनके श्राप को कम करते हुए कहा कि नारायण स्वयं (यहां सर्वोच्च व्यक्ति के रूप में प्रतिनिधित्व करते हैं) धर्म और भक्ति के पुत्र के रूप में पैदा होंगे, और उनके जन्म से उन सभी को राहत मिलेगी। बुराई के चंगुल से. इस प्रकार उद्घोषणा करते हुए, दुर्वासा वापस कैलाश की ओर चल पड़े। [26]

धर्म और भक्ति का जन्म अंततः हरिप्रसाद पांडे (उर्फ धर्मदेव) और प्रेमवती पांडे (उर्फ भक्तिदेवी) के रूप में हुआ। नारायण का जन्म उनके पुत्र के रूप में हुआ, जिसका नाम घनश्याम रखा गया, जो अब स्वामीनारायण के नाम से जाना जाता है। कहानी स्वामीनारायण हिंदू धर्म तक ही सीमित है, और कोई भी अन्य हिंदू धर्मग्रंथ इस कहानी का समर्थन नहीं करता है। 

मंदिर

आज़मगढ़ में एक तीर्थस्थल का नाम दुर्वासा है जहाँ दुर्वासा का मंदिर स्थित है। मंदिर के पुजारी के अनुसार, दुर्वासा ने इसी स्थान पर शिवलिंग पर समाधि ली थी ।


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