भक्त माल कथा माला || 23 || भगवद्भक्त श्री रांका बांका जी
भक्त माल कथा माला || 23 || भगवद्भक्त श्री रांका बांका जी
श्री रांका-बांका (पति पत्नी) जी दोनो उच्च कोटी के भक्त हुए हैं। भक्त श्रीरांकाजी पति थे और भक्तिमती श्रीबांकाजी उनकी पत्नी थी। इन दोनोके ह्रदयमें सिवा भगवान् के और कुछ भी चाह नहीं थी। यह दोनो जंगलसे लकड़ियां बीनकर लाते और उन्हींको बेचकर अपनी नित्य नवीन जीविका करते थे।
एक बार संत श्री नामदेवजी ने भगवान् भगवान विट्ठल से विनती की के भगवान आप तो सर्वेश्वर हैं अपने भक्त रांका-बांकाजी की गरीबी दूर कर दीजिये ।
भगवान् ने कहा – ‘राँका तो मेरा हृदय है, वह धन की तनिक की इच्छा करे तो उसे कोई अभाव नहीं रह सकता; परन्तु देने पर वह लेगा नहीं । मैने बहुत उपायोंसे इन्हे देना चाहा, परंतु ये लेते ही नहीं, यदि नही मानो तो मेरे संग चलो, मै इनकी निष्कामता दिखलाऊँ।'
फिर तो भगवान्ने अगली सुबह उनके मार्गमें एक स्वर्णमुहरोंसे भरी थैली डाल दी और स्वयं तथा श्रीनामदेवजी दोनों जंगल में छिप गये।
प्रात:काल का समय है, श्री रांका-बांकाजी दोनों उसी मार्गसे रोज की तरह कीर्तन करते हुए भगवत्प्रेम की मस्ती में चले जा रहे थे । उनकी पत्नी कुछ पीछे थीं । सहसा उनके पैर में ठोकर लगी । रुक कर देखा तो पाया कि मार्गमें स्वर्ण मुहरोंसे भरी हुई थैली पड़ी है ।
श्री रांका जी ने मार्गमें पडी हुई मुहरोंसे भरी हुई थैली देखी। देखकर विचार किया कि मेरी पत्नी भले निष्काम है फिरभी दृष्टिपथमें आनेपर लौकिक वस्तुओं भी मन फंस जाता है, कही यह धन देखकर इसकी धन पाने की इच्छा न हो जाए। अतः पति श्रीरांकाजीने शीघ्रतापूर्वक उस थैलीपर धूल डाल दी।
श्रीबांकाजीने पतिसे पूछा – अजी, आपने यहां पृथ्वीपर झुककर क्या किया है?
राँकाजी ने कहा—‘यहां सोने की मुहरों की थैली पड़ी थी । मैंने सोचा कि तुम पीछे आ रही हो, कहीं सोना देखकर तुम्हारे मन में लोभ न आ जाए; इसलिए इसे मिट्टी से ढक देता हूँ । धन का लोभ मन में आ जाए तो फिर भगवान का भजन नहीं होता है ।’
यह सुनकर परम वैराग्यवती बाँकाजी हंसती हुई बोलीं—‘सोना भी तो मिट्टी ही है, आप मिट्टी के ऊपर मिट्टी डालने का व्यर्थ परिश्रम क्यों कर रहे थे? अभी आपके मनमें धनका ग्यान बना ही है?
राँकाजी ने प्रसन्न होकर कहा—‘तुम धन्य हो ! तुम्हारा ही वैराग्य बाँका है । मेरी बुद्धि में तो फिर भी सोने और मिट्टी में भेद था; परन्तु तुम मुझसे बहुत आगे बढ़ गई हो ।’ इस बांके वैराग्य के कारण ही उनका नाम ‘बाँका’ पड़ा ।
लोग मुझे रांका अर्थात् रंक और तुम्हे बांका अर्थात् श्रेष्ठ कहते है, यह सत्य ही है की तुम मुझसे श्रेष्ठ हो। यह बात मैने आज देखा ली।
इनकी ये बातें सुनकर भगवान् विठ्ठल श्रीकृष्ण, श्री नामदेव जी से बोले – देखो, हमारी बात सत्य हुई। ये दोनों धनके प्रति कितने निस्पृह हैं।
भगवान् की जीत हुई और श्री नामदेवजी हार गये। फिर भगवान्ने कहा – यदि तुम्हारे मनमें विशेष परिताप है कि श्रीरांका-बांकाजी की सहायता करनी ही चाहिए तो चलो इनके लिए लकड़ी बटोरो। फिर श्रीभगवान् और श्री नामदेव जी लकड़ियां बटोरने लगे। उरान्होंने का-बाँका के लिए जंगल में सारी सूखी लकड़ियां एकत्र कर गट्ठर बांध कर रख दीं ।
पति-पत्नी ने देखा कि आज तो जंगल में कहीं भी लकड़ियां दिखाई नहीं देती हैं । लकड़ी के गट्ठरों को उन्होंने किसी दूसरे का समझा । दूसरे की वस्तु की ओर आंख उठाना भी पाप है—यह सोच कर दोनों खाली हाथ घर लौट आए ।
राँकाजी ने पत्नी से कहा—‘देखो, सोने को देखने का ही यह फल है कि आज उपवास करना पड़ा । यदि उसे छू लेते तो पता नहीं, कितना कष्ट उठाना पड़ता ।’
अपने भक्तों का ऐसा वैराग्य देखकर भगवान विट्ठल को दया आ गई और वह अपना देव-दुर्लभ रूप लेकर उनके सामने साक्षात् प्रकट होकर दर्शन दिए । श्रीरांका-बांकाजी श्रीभगवान् और श्रीनामदेवजी को घर लिवा लाये।
अतिथि सत्कार के उपरांत श्रीरांका-बांकाजी दोनों से जंगल घूमने का कारण पूछा तो विट्ठल ने उन्हें सारी बात बता दी।
यह सुनकर श्रीरांकाजी ने श्रीनामदेवजी कहा – अरे मूडफेरा ! श्रीप्रभुको इस प्रकार वन वन भटकाया जाता है?
भगवान् ने श्रीरांकाजी से कुछ मांगने और श्रीनामदेवजी का मान रखने का अनुरोध किया।
तब वे दोनों हाथ जोडकर श्री भगवान् से प्रार्थना करने लगे कि हमें आपकी कृपाके सिवा और कुछ भी नहीं चाहिए।
तब श्रीनामदेवजीने कहा कि कुछ नही तो प्रभु का मान रखते हुए प्रभुका एक प्रसादी वस्त्र ही शरीरपर धारण कर लीजिये।
श्रीरांका-बांकाजी ने प्रभुका एक प्रसादी वस्त्र शरीरपर धारण कर लिया। यद्यपि इतनेसे भी श्रीरांका-बांकाजी को लगा कि सिरपर भारी बोझ पड गया, परंतु उन्होने भक्त और भगवान् की रुचि रखनेके लिये वस्त्रमात्र स्वीकार कर लिया ।
राँका-बाँका का वैराग्य देखकर नामदेवजी अपने-आप को तुच्छ मानने लगे और भगवान से बोले—‘जिस पर आपकी कृपा-दृष्टि होती है, उसे आपके सिवाय त्रिलोकी का राज्य भी नहीं सुहाता।
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