भक्त माल कथा माला || 11 || भक्त नंदनार की कथा
नंदनार की कथा क्या आपने पूरी सुनी ?
क्या कहा सोच में पड़ गए,
तो हम आपको बता दें कि आज की कथा में यह कथा अधूरी रह गई। चलो हम इसे आपको पूरा सुनाते हैं?
नंदनार तमिलनाडु के एक छोटे से गांव में रहता था। वह भोले का भक्त था। वह खेतिहर मजदूर और गायक थे। यह जरूरी नहीं कि भगवान शिव का भक्त धनवान हो महान व्यक्ति हो परंतु यदि शिव भक्त के पास में भक्ति है भजन है जल चढ़ाने के लिए एक लोटा है और घर में जल है तो वही सबसे महान शिव भक्त है।
नंदनार के माता पिता बहुत गरीब थे उन्होंने उसे एक साहूकार के हाथों कुछ पैसों में बेच दिया इस प्रकार नंदनार खेतिहर बंधुआ मजदूर बनकर रह गया। उससे बहुत काम कराया जाता उससे खेती कराई जाती, उससे मजदूरी कराई जाती ,उससे सभी काम कराए जाते। वह शिव का भक्त खेतिहर मजदूरी करता हुआ भी शिव के भजन गाया करता था।
नंदनार सेठ जी के यहां जो काम किया करता था। उस गांव से 25 किलोमीटर दूर तिरुपंकुर नाम का एक शिव मंदिर था। हालाँकि, उनके मन में तिरुपंकुर के शिवलोकनाथर मंदिर में शिव की प्रतिमा के प्रति सम्मान व्यक्त करने की प्रबल इच्छा थी । वह हमेशा से इस मंदिर में जाना चाहता था क्योंकि उसे लगता था कि शिव उसे बुला रहे हैं।
चिदम्बरम को भगवान शिव का पवित्र स्थान जिसे 'भू लोक का कैलास' अर्थात पृथ्वी पर कैलाश के नाम से जाना जाता है, नंदनार यहां की यात्रा के लिए बहुत उत्सुक थे।
उसका साहूकार भी ऐसा कि उससे दिन रात काम लेता मुश्किल से एका दो घड़ी ही उसे आराम करने देता। और उसकी पत्नी तो उससे भी बढ़कर दी थी। नंदन आर खुशियों पर अटूट भरोसा था वह "नमः शिवाय।" "नमः शिवाय! उमापति।" "सांबसिवाय" का जाप करता रहता।
वह जानता था कि अपने जीवन पर उसका अधिकार नहीं था, इसलिए उत्कंठ जिज्ञासा के बाद भी वह मंदिर नहीं जा पा रहा था।
उसने मंदिर जाने के लिए कई बार जमींदार को अपनी बात समझाने की कोशिश की कि ‘मैं सिर्फ एक दिन के लिए मंदिर जाकर वापस आ जाऊंगा।’
मगर जमींदार हमेशा टाल देता, वह हमेशा कहता, ‘आज निराई करनी है। कल खाद डालनी है। परसों तुम्हें जमीन जोतनी है। नहीं, तुम एक भी दिन बर्बाद नहीं कर सकते। तुम्हें क्या लगता है? तुम वैसे ही किसी काम के नहीं हो। तुम एक पूरा दिन बर्बाद करना चाहते हो? नहीं।’
शिव दर्शन करने की नंदनार की इच्छा और प्रबल और प्रबल और प्रबल होती चली गई।
एक दिन जब नंदनार खैत पर काम कर रहा था तो कुछ तीर्थयात्री उनके पास आए और उससे पूछने लगे, "थिल्लई अम्बालाथुक्कु पोगुमो इवाज़ी" अर्थात क्या यह सड़क चिदंबरम के मंदिर तक जाती है?
'थिल्लई' (चिदंबरम) नाम सुनकर नंदनार रोमांचित हो जाता, वह और रोमांचक महसूस करते हुए वह इसे दोबारा सुनने के लिए उत्सुक हो जा जाता हैं।
इसलिए, उत्तर देने के बजाय, वह उनसे विनती करेगा, "इन्नम ओरु धरम सोलुंगलैय्या!" अर्थात कृपया उस नाम ('थिल्लई') का एक बार फिर से उच्चारण करें! "
“ओह, आपने क्या कहा? कृपया इसे फिर से कहना!"
यह सोचकर कि उन्होंने उसे नहीं सुना है, तीर्थयात्री अपना प्रश्न दोहराते थे, "क्या यह सड़क 'थिल्लई' (चिदंबरम) की ओर जाती है?"
'थिल्लई' नाम ही नंदनार को परमानंद में डाल देता था! भगवान नटराज (शिव) के दर्शन करने की उनकी गहरी इच्छा के कारण 'थिल्लई' ध्वनि उनके कानों के लिए मधुर थी। इसलिए, वह उनसे बार बार कहता, "ओह, कृपया अपना प्रश्न एक बार फिर से दोहराएं!"
ऐसा ही चलता रहा और जो लोग पूछने के लिए रुके थे, वे उसे कोई पागल समझकर चले गए!
लोग चिदम्बरम के दर्शन करने की उनकी गहरी लालसा को पागलपन कहते थे और इसलिए उससे बार बार पूछते थे, “अरे, नंदा! आप चिदम्बरम के लिए कब निकलोगे ?”
नंदनार सीधे स्वभाव में कहते, "कल, मैं कल 'थिल्लई' (चिदंबरम) के लिए जा रहा हूं!"
जब भी कोई उससे यह पूछता तो उसका यही उत्तर होता। बेचारे नंदा की सभी ने हंसी उड़ाई और उन्हें 'थिरुनल्लाइपोवर' कहने लगे। जिसका अर्थ है जो कल चिदम्बरम के लिए कल जाएगा। ('नलाई पोवार' का अर्थ है 'कल जाना')।
अब इंतजार करना नंदनार के लिए और भी कठिन हो गया अब बिना दर्शन के रह पाना उसके लिए मुश्किल हो गया वह एक बार फिर जमींदार के पास हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।
मालिक मुझे केवल 1 दिन छुट्टी दे दो मैं दर्शन करते हुए तुरंत लौट आऊंगा। उसकी यह बात सुनकर जमींदार फिर शुरू हो गया, ‘मूर्ख कहीं के! पिछली बार तुम्हारी मां बीमार थी, उससे पहले बहन की शादी थी, उससे पहले तुम्हारी दादी तीन बार मरी। अब तुम मंदिर जाना चाहते हो, यह नहीं हो सकता।’
वह बोला, ‘मैं आज ही सारा काम कर दूंगा। शिव बाबा के दर्शन करना चाहता हूं। कल सिर्फ एक दिन की बात है, मैं जाकर वापस लौट जाऊंगा।’
उस एक पल में जमींदार ने न जाने कैसे हां कह दिया, ‘ठीक है, जाओ। शाम से पहले वापस आ जाना।’
जमींदार को यह कहते हैं जमींदार की पत्नी ने सुन लिया। वह बोली सुन नंदनार, " अगर तुझे शंकर जो के दर्शन के लिए जाना है। तो जाने से पहले तुम्हें पूरे चालीस एकड़ जमीन को जोतना होगा। अभी शाम है। सुबह से पहले तुम जुताई पूरी करके ही मंदिर जा सकते हो।’
यह वह समय था जब जमींदार हुआ है तो जोतने के लिए बोल दे वरना इंसान को खुद भी हाल में जीतना होता था तब खेत जोता जाता था। और नंदनार को इसी प्रकार 40 एकड़ जमीन जोतनी थी।
नंदनार इतना मूर्ख नहीं था कि इसकी कोशिश करता। वह भगवान भोलेनाथ को याद करते हुए, चुपचाप सोने चला गया। उसने दो लोटा जल भर कर रख लिया। और रात्रि में ही बेलपत्र के नीचे गिरे हुए मित्र को ढूंढने के लिए चला गया। जब वह लौटा तो जमींदार की घरवाली ने उन दोनों लोटों के पानी को बिखरा दिया ताकि नंदनार मंदिर न जा सके और कुए पर पहरेदार बिठा दिए कि वह पानी ना भर सकें।
उसका पूरा शरीर फड़क रहा था। वह जानता था कि इस बार उसे मंदिर जाना ही है, चाहे इसका नतीजा कुछ भी हो। लेकिन जैसे वह वापस लौटा तो उसने देखा के पानी के लौटे ढ़ुले पड़े हैं। वह रोने लगा उसने दोनों लोटे उठाए और जब वह कुए से पानी लेने पहुंचा पहरेदारों ने उसे वापस भगा दिया। वह वापस आकर बैठ गया । उसके दिमाग में एक ही विचार घूम रहा था कि उसे मंदिर जाना है।
सुबह जब वह उठा, तो गांव में हंगामा मचा हुआ था। वह यह देखकर हैरान रह गये थे कि सारी चालीस एकड़ जमीन जोती हुई थी। जमींदार का मुंह खुला का खुला रह गया था। जमींदार के बीवी-बच्चे आकर नंदनार के पैरों पर गिर पड़े।
लोगों ने आकर नंदनार के हाथों में चांदी के सिक्के रख दिए, किसी ने उसके हाथ में भोजन का थैला रख दिया। किसी ने उसे छड़ी पकड़ा दी और कहा, ‘यह मंदिर जा रहा है, इसे ईश्वर ने खुद चुना है। शिव ने इसके लिए खुद आकर चालीस एकड़ जमीन जोत दी।’
वह दिल में परम आनंद लेकर मंदिर गया। मगर उस गरीबी में भी वह नहीं भूला था कि पुजारी उसे मंदिर की देहरी पार नहीं करने देंगे। और दिन छिपना शुरू हो चुका था। कभी मंदिर बंद हो सकता था। वह कुछ समय तक मंदिर के बाहर खड़ा रहा। शायद यही से उन्हें शिव के दर्शन हो जाए। उसने मंदिर में जाने का प्रयास किया तो पुजारियों ने उसे रोक दिया और उसे बाहर से ही दर्शन करने का आदेश सुना दिय।
नंदनार ने पुजारियों से कहा भगवन में भोले बाबा के दर्शन करने आया हूं और यह नंदी जी बीच में आ रहे हैं। ऐसे में मुझे दर्शन कैसे होंगे। मुझे बाहर द्वार से ही दर्शन करने दो।
निश्चित रूप से शिव अपने भक्त के लिए सब कुछ बदल देते हैं, मगर पुजारी नहीं झुकते। नंदनार सिर्फ एक बार शिव के दर्शन करना चाहता था। वह इस शिव की आज्ञा मानकर द्वार के बाहर ही खड़ा हो गया और भोले बाबा से प्रार्थना करने लगा।
हे बाबा आप मेरे लिए रातों-रात 40 एकड़ की जमीन जोत सकते हैं तो क्या आज मुझे पूरे दर्शन ही दोगे क्या मैं अपनी इस इच्छा को दिल में लिए वापस अपने मालिक साहूकार के पास चला जाऊंगा।
जानते हो तब क्या हुआ?
तब, उसके रास्ते में खड़ी नंदी की विशाल मूर्ति एक ओर खिसक गई। आज भी तिरुपुंगुर में नंदी की मूर्ति एक ओर को है।
यह वह पवित्र स्थान है जहां 'नंदी' एक ओर चले गए ताकि नंदनार और उनके लोग भगवान के दर्शन कर सकें। ऐसा कहा जाता है कि नंदनार ने यह नाम इसलिए अर्जित किया क्योंकि उसने नंदी को खिसकाया था! अपने प्रिय भगवान के दर्शन पाकर नंदनार की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
प्रसन्न होकर, वह किसी भी तरह से भगवान को अपनी सेवाएँ देना चाहता था। यहां एक गणेश हैं जिन्हें 'कुल्लम वेट्टिया विनायकर' (तालाब खोदने वाले गणेश) के नाम से जाना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इस गणेश ने नंदनार और उसके लोगों के स्नान के लिए एक तालाब खोदा था!
बाद में लोग इस शख्स को नंयनार कहकर बुलाने लगे और वह एक मशहूर संत बन गया। आप उसे भक्त नहीं कह सकते, उसका पूरा जीवन बस कौतुहल या जिज्ञासा से भरा था और उसने कभी उस कौतुहल को जाने नहीं दिया
बस इतनी सी है आज की कहानी।
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