दोहा 
"भक्त, भक्ति, भगवन्त, गुरु, चतुर नाम वपु एक । 
इनके पद बंदन किये, नाशहिं विध्न अनेक ॥”

(ॐ श्रीमद्भागवत के आरम्भ में ही कहा है कि जब श्रीशुकदेव भगवान् जन्मते ही परम विरक्तिमान् सव त्यागकर, घर से निकल वन को चल दिये, और उनके पिता श्रीव्यास भगवान् पुत्र के (उनके) विरह मे कातर होकर उनके पीछे पीछे "हे पुत्र ! हे पुत्र'" ऐसा पुकारते हुए साथ हो लिये, तब योगीश्वर सर्वहृदयप्रवेशक श्रीशुकदेवजी ने तो पीछे की ओर मुँह तक भी न फेरा, और न साक्षात् उत्तर ही (महर्षि पिताजी को) दिया, किन्तु उस प्रदेश के समस्त वृक्षगण आप आप को बोलने लगे कि "हाँ, मैं शुक हूँ, मैं शुक हूँ, क्या आज्ञा होती है ? ॥")


(१) श्रीब्रह्माजी ।

सृष्टि और सुख दुःखादि प्रारब्धरेखाओं के कर्त्ता जगत्पिता सुगम अगमवरदाता श्रीब्रह्माजी की (श्रीभगवतनाभीकमल से जन्म आदि) कथाएँ, पुराणों में अगणित हैं। 

"हानि लाभ जीवन मरन, यश अप- यश विधि हाथ ॥”

श्रीविधाताजी यद्यपि सब निष्ठाओं में श्रेष्ठ तथा प्रधान हैं, तथापि इनकी गणना "धर्मप्रचारक निष्ठा" में प्रत्यक्ष है। जिन देव मुनि गो महि इत्यादिक की प्रार्थना से भगवत् के विविध अवतार होते हैं उन मण्डलों के अगुआ और मुखिया श्रीअज ही तो होते हैं, सो व्यवस्था किसको विदित नहीं है ? ।।

(२) श्रीनारदजी । चौपाई ।

बन्दौ श्रीनारद मुनिनायक । करतल वीण राम गुणगायक ॥ 

अप्रतिहतगति देवर्षि श्रीनारद भगवान् तो परमात्मा के मन ही हैं, भगवत् के अवतार हैं, और जगत् के परम उपकारक प्रसिद्ध हैं । सेवा, पूजा, कीर्तन, प्रसाद, भक्ति प्रचारक इत्यादिक सबही निष्ठाओं में प्रधान हैं। पुराणमात्र में आपकी शुभ कथा भरी है। सर्वलोकों में आपका पर्यटन केवल परोपकार के निमित्त, यही आपका व्रत सा है ।।

(३) श्रीशिवजी ट

द्वादश प्रसिद्ध भक्तराज कथा "भागवत" अति सुखदाई, नाना विधि करि गाए हैं। शिवजी की बात एक बहुधा न जानै कोऊ, सुनि रस सानै, हियो भाव उरझाए हैं । "सीता" के वियोग "राम" विकल विपिन देखि "शंकर" निपुण "सती" वचन सुनाए हैं। “कैसे ये प्रवीन ईश ? कौतुक नवीन देखौं", मनेहूँ करत, अंग वैसे ही बनाए हैं ।॥ २० ॥ (६०६)




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