भक्त माल || 01 || प्रार्थना
भक्त माल
श्री
* समर्पण *
सुमुख, सुलोचन, सरल, सत, चिदानन्द, छविधाम ।
प्राण-प्राण, जिय जीव के, सुखके सुख, सियराम ।।१।।
पवनतनय, विज्ञानघर, कपि, बल पवन समान।
रामदूत, करुणायतन, बुद्धि विवेक निधान ।।२।।
सन्तशिरोमणि सन्तप्रिय, प्रेमी, सहज उदार ।
जानकिघाटश्री "प्रेमनिधि", रामप्रेम आगार ।।३।।
"रामवल्लभाशरण" शुचि, पण्डित सन्तप्रवीन।
तेजपुंज, सद्गुण-भवन, शोभा नित्य नवीन ।।४।।
रामचरितमानस प्रभृति, भक्तमाल निगमाद ।
वाल्मीकि भागौत की, कथा प्रेम रस स्वाद ।।५।।
शान्ति, विरति, रति, ज्ञान, हरि-भक्ति, सुतत्त्व विभाग।
सन्त समाज बखानहीं, वचन अमिय अनुराग ।।६।।
श्रीहरि गुरु करकंज यहि, अर्पति मन वच काय ।
रुपिया सोई तुच्छ अति, कृपया लें अपनाय ।।७।।
तुम्हारी रुपिया (रूपकला) श्रीअयोध्याजी.
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