भक्त माल कथा माला || 12 || विभीषण की पुत्री त्रिजटा
भक्त माल कथा माला || 12 || विभीषण की पुत्री त्रिजटा
विभीषण की पुत्री त्रिजटा
रामायण की एक पात्रा त्रिजटा लंका की मुख्य साध्वी, राक्षसी प्रमुख थी। जिसका जन्म तो राक्षस कुल में हुआ था लेकिन उसका हृदय देवियों के समान पवित्र था।
श्री रामचरित मानस में त्रिजटा एक लधु स्त्रीपात्र है । यह पात्र आकार में जितना ही छोटा है, उसकी महिमा उतना ही गौराव मण्डित है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि श्री रामचरित मानस के हर छोटे-से-छोटे पात्र भी विशेषता संपन्न है।
त्रिजटा की बात करें तो मन्दोदरी ने त्रिजटा को सीताजी की देख-रेख के लिए उसे विशेष रूप से सुपुर्द किया था। वह राक्षसी होते हुए भी सीता की हितचिंतक थी।
सम्पूर्ण ‘श्री रामचरित मानस’ में केवल दो काण्ड सुन्दरकाण्ड और लंका काण्ड में सीता-त्रिजटा का वर्णन मिलता है उनके वार्तालाप के रूपमें त्रिजटा का वर्णन है। परंतु इन लघु वार्तालापों में ही त्रिजटा के चरित्र की भारी विशेषताएँ दिखाई दी हैं।
पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदासजी ने मानस के सुन्दरकाण्ड की एक चौपाईं में त्रिजटा का स्वरूप इस प्रकार बतलाया गया है :
त्रिजटा जाम राच्छसी एका ।*
राम चरन रति निपुन बिबेका ।।*
(रा.च.मा ५। ११ । १)
जहां तुलसीदास है त्रिजटा को राम भक्त दर्शाते हैं वही आज की कथा में पंडित प्रदीप मिश्रा जी त्रिजटा को अविरल शिव भक्ति करने वाली स्त्री के रूप में दर्शाते हैं।
त्रिजटा रामभक्त विभीषणजी की पुत्री है। जिनका जन्म माता शरमा के गर्भ से हुआ था। इस प्रकार त्रिजटा रावण की भ्रातृजा अर्थात भतीजी है। जहां राक्षसी होना त्रिजटा का वंशगुण है तो रामभक्ति उसका पैतृक गुण है।
लंका की अशोक वाटिका में सीताजी के पहरेपर अथवा सहचरी के रूपमें रावणद्वारा जिस स्त्री-दल की नियुक्ति होती है, त्रिजटा उसमें से एक प्रमुख पहरेदार है।
बालक शिवभक्त त्रिजटा ने अपने पिताजी से पूछा पिताजी, मेरा मन एक ही स्थान पर नहीं ठहरता। अविरल भक्ति कैसे प्राप्त हो सकती है ?
विभीषण बोले, "बेटी ! भगवान भोलेनाथ की आराधना करो, पूजा करो, उनकी स्तुति करो, मनन करो और रोज उन्हे एक लोटा जल अर्पित करो, इसी से अविरल भक्ति की प्राप्ति होगी।
त्रिजटा भगवान शिव की आराधना मेल तल्लीन हो गई । उसकी आराधना देखकर भगवान भोलेनाथ प्रसन्न हुए और एक बालक का रूप रखकर उसके सामने आए।
"अरे आप यह सब क्या कर रही हो।", बालक शिव ने त्रिजटा से पूछा ।
तो त्रिजटा बोली, " शिव की आराधना ।"
"इससे क्या होता है ?"
"पिताजी कहते हैं कि इनकी आराधना करने से सब कुछ प्राप्त होता है। "
बालक शिव बोले, "सब कुछ प्राप्त होता है।"
"हां सब कुछ प्राप्त होता है।" त्रिजटा बालक शिव से बोली।
"तुम्हें क्या चाहिए ?" बालक शिव फिर त्रिजटा से पूछा।
बाल त्रिजटा बोली, "मुझे अगर शंकर जी मिले तो उनसे एक कहानी सुनना है ।"
"कहानी सुनना है।"
"हां , मुझे एक कहानी सुनना है ।"
"कौन सी कहानी सुनना है ।"
"कि यही कि उन्होंने माता सती का त्याग क्यों किया। क्यों बे तपस्या में लग गए थे क्यों सती माता को अपने शरीर त्यागना पड़ा। क्यों वह पिता के घर जाकर खुद को जलाना पड़ा बस यही पूछना है।"
तब शिव बालक शिवजी ने बाल त्रिजटा से कहा कि जब राम जी को वनवास लगा तो सती को, राम को देखकर विश्वास ही नहीं हुआ कि वह उनके आराध्य हैं।
"तब सती माता सीता का रूप रखकर भगवान राम की परीक्षा लेने आई थी । "
भगवान राम ने उन्हें पहचान लिया और बोले , "माता ! आपने बहुत बड़ी गलती कर दी । मेरे प्रभु इस गलती को कभी माफ नहीं करेंगे जाईए और उन्हें मनाइए।
सती की समझ में नहीं आया परंतु वे भगवान शिव के पास चली गई।
तब भगवान शिव ने कहा कि तुमने मेरे आराध्य परीक्षा लेने के लिए मेरे आराध्य की पत्नी का रूप रखा है जो मेरे माता के समान है और मैं आपको पुनः स्वीकार नहीं कर सकता अब आप स्वतंत्र हैं। इसलिए वे सती को त्याग कर समाधि में लीन हो गए थे।
"यह सीता कौन थी ।" त्रिजटा ने पूछा
"भगवान राम की पत्नी"
"कौन राम ?"
"नारायण के अवतार।"
"अब और कुछ पूछना है।"
"नहीं ।"
"तो फिर जाओ घर जाओ ।"
"नहीं , अभी नहीं।"
"क्यों मुझे उस सीता को देखना है जिसे देखने के लिए माता सती गई थी । मैं उन सीता माता की सेवा करना चाहती हूं।"
"ठीक है त्रिजटा ! तेरी या मनोकामना पूर्ण हो पूरी होगी।"
रावण के बाहर होने पर लंका की सत्ता मन्दोदरी के हाथ में होती थी। जब रावण सीता का हरण करके लंका लेकर आया तब मन्दोदरी ने सीता के साथ रावण को राजमहल में प्रवेश की अनुमति नहीं दी। रावण सीता को अशोक वाटिका में रखने के लिए मजबूर हो गया। सीता को जब अशोक वाटिका में रखा।
अशोक वाटिका में उसी त्रिजटा को सीता जी की सेवा करने का मौका मिला । उन्होंने सीताके लिये परामर्शदात्री एवं प्राणरक्षिका का काम किया है । अशोक वाटिका में रावण ने 300 राक्षसियों को सीता की देखरेख में लगाया था।
सीताजी को वशीभूत करने के लिये रावणने भय और त्रासका सहारा लिया वह राक्षसियों को ऐसा ही आदेश करके यह चला गया था । राक्षसियां सीता को परेशान करने लगीं इससे सीताजीका दुख दूना हो गया, क्योंकि राक्षसियाँ नाना भाँति बहुत भयंंकर रूप बना बनाकर उन्हें डराने धमकाने लगी ।
अशोक वाटिका में जब अन्य राक्षसियां सीता को परेशान कर रही थी तो त्रिजटा ने अपनी बुद्धिमता से बाकि राक्षसियों समझाने के लिए एक विवेकपूर्ण एक युक्ति निकाली । उसने राक्षस मनोविज्ञान का सहारा लिया और एक भयानक स्वप्न उसने रात में देखा था । त्रिजटा ने उन सब राक्षसियों को बुलवाकर कहा कि मैंने एक स्वप्न देखा है। स्वप्नमे मैंने देखा कि एक बंदर ने लंका जला दी । राक्षसों की सारी सेना मार डाली गयी । रावण नंगा है और गधे पर सवार है । उसके सिर मुँड़े हुए हैं बीसो भुजाएँ कटी हुई है ।
इस प्रकार से वह दक्षिण (यमपुरी की) दिशा को जा रहा है और मानो लंका विभीषण ने पायी है। लंका में श्री रामचंद्र जी की दुहाई फिर गयी । तब प्रभुने सीताजी को बुलावा भेजा।
त्रिजटा की बात सुनकर सीता पुकारकर कहती हैं कि निश्चय के साथ यह स्वप्न चार ( कुछ ही) दिनों में सत्य होकर रहेगा । उसके वचन सुनकर वे सब राक्षसियाँ डर गयी और जानकी जी के चरणों पर गिर पड़ी। फिर त्रिजटा ने उन सब राक्षसियों से कहा, सब सीता जी की सेवा करके अपना कल्याण कर लो। उसने उन राक्षसियों को साक्षात भक्तिरूपा सीता जी के चरणों में डाल दिया । यही तो भक्तो संतो का स्वभाव है।
इस स्वप्न वार्तासे जहां एक ओर त्रिज़टा का भविष्य दर्शिनी सिद्ध होता है, वहीं दूसरी ओर उसका व्यवहार-निपुणा और विवेकिनी और कुशल मनोवैज्ञानिक भी सिद्ध होती है।
फिर त्रिजटा ने माता सीता को ढांढस बंधाया था। त्रिजटा के कारण ही माता सीता को उस राक्षस नगरी में रहने की शक्ति मिली व उनका विलाप कम हुआ था।
यही कारण है कि विरहाकुल सीताने त्रिज़टा को माता कहकर संबोधित किया है।
त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी ।*
मातु बिपति संगिनि तें मोरी।।*
जिस दिन हनुमान अशोक वाटिका के अशोक वृक्ष पर छिपे हुए थे। उस समय सीता जी का विरह उनके लिए असह्य हो चला तब मरणातुर सीताजी आत्मत्याग के लिये जब त्रिजटा से अग्नि की याचना करती हैं , सीताजी त्रिजटा से कहती है के चिता बनाकर सजा दे और उसमे आग लगा दे, तो इस अनुरोंध को वह बुद्धिमान राम भक्ता त्रिजटा यह कहकर टाल देती है कि रात्रि के समय अग्नि नहीं मिलेगी और सीताजी के प्रबोधके लिये वह राम यश गुणगान करने लगती है । सीता के साथ-साथ हनुमान जी भी गुणगान में मगन जाते हैं और रात केसे बीत जाती है पता ही नहीं चलती। सीताजी को राम सुयश सुनने से ही सांत्वना मिली थी, यह हनुमान् जी ऊपर पल्लवोंमें छिपे बैठे देख रहे थे।
ज्ञान गुणसागर हनुमान जी ने भी जब अशोकवाटिका में सीता जी की विपत्ति देखी तो उनके प्रबोधके लिये उन्हें कोई उपाय सूझा ही नहीं क्योंकि वे सीताजी के रूप और स्वभाव दोनों ही से अपरिचित थे ।
त्रिजटाके चले जानेके बाद सीताजी और भी व्याकुल हो उठी । तब उनकी परिशान्ति के लिये हनुमान जी ने भी श्रीराम गुणगान सुनाये ।
इसके बाद हनुमान ने सीता जी को मुद्रिका दी अशोक वाटिका उजाड़ी और लंका विध्वंस किया और वापस श्री राम के पास आ गए हैं।
लंका काण्डके युद्ध प्रसंग में त्रिज़टा की एक और विलक्षणता का उदाहरण सामने आता है ।
जब राम रावण युद्ध चरम सीमा पर था । रावण घोर युद्ध कर रहा है । उसके सिर कट-कट करके भी पुन: जुड जाते थे । भुजाओ को खोकर भी वह नवीन भुजावाला बन जाता था और वह भगवान श्रीराम के मारे से भी नहीं मरता ।
अशोक वाटिका में त्रिज़टा के मुँहसे यह प्रसङ्ग सुनकर सीताजी बहुत व्याकुल हो गईं। सीता जी ने त्रिजटा से कहा, मां क्या श्री रामचंद्र के बाणों से भी नहीं मरने वाले रावण के बन्धन से अब मुक्त होने की आशा त्याग देने चाहिए।
त्रिजटा को परिस्थितिवश अनुभव होता है । वह सीताजी की मनोदशा को देखकर फिर प्रभु श्रीरामके बलका वर्णन करती है और सीता को श्रीराम की विजय का विश्वास दिलाती है।
त्रिजटाने कहा "सुनो राजकुमारी ! देवताओ का शत्रु रावण हृदयमें बाण लगते ही मर जायगा। परन्तु प्रभु उसके हृदय मे बाण इसलिये नहीं मारते कि इसके हृदयमे जानकी जी (आप) बसती हैं ।"
हर बार श्री राम जी यही सोचकर रह जाते हैं कि इसके हृदय में जानकी का निवास है, जानकी के हदयमे मेरा निवास है और मेरे उदरमें अनेकों भूवन हैं । अत: रावणके हृदयमें बाण लगते ही सब भुवनोंका नाश हो जायगा ।
यह वचन सुनकर, सीताजी के मनमें अत्यन्त हर्ष और विषाद हुआ यह देखकर त्रिजटाने फिर कहा, " सुन्दरी ! महान सन्देह का त्याग कर दो अब सुनो, शत्रु इस प्रकार मरेगा । सिरोंके बार बर और लगातार कटते जानेसे जब वह व्याकुल हो जायगा और उसके हृदय से तुम्हारा ध्यान छूट जायेगा और उसकी मृत्यु होगी।"
रावण हर क्षण जानकी जी को प्राप्त करने के तरीकों के बारे में सोचता रहता है, उन्हें अपना बनाने के बारे में ही सोचता रहता अतः उसके ह्रदय से जानकी जी का ही विचार रहता है। संतो ने सीता माँ को साक्षात् भक्ति ही बताया है। रावण भक्ति को जबरन अपने बल से प्राप्त करना चाहता है, परंतु क्या भक्ति इस तरह प्राप्त होती है?
रावण को पता था कि प्रभु से वैर करने पर उनके हाथो मृत्यु होगी तो मोक्ष प्राप्त हो जायेगा परंतु प्रभु चरणों की भक्ति नहीं प्राप्त होगी।
अंत में भगवान श्रीराम के हाथों दशानन रावण मारा गया। इसके पश्चात विभीषण को लंका का अधिपति बनाया गया। विभीषण जी ने तुरंत माता सीता को मुक्त करने का आदेश दिया।
त्रिजटा माता सीता के जाने की सोचकर दुखी तो थी लेकिन प्रसन्न भी थी कि अब उनकी पुत्री की सब विपत्तियां टल गयी। जब अग्नि परीक्षा के उपरांत सीताजी जाने लगी तो सीताजी ने भगवान राम से कहा कि यहां लंका में मेरी एक मात्र देखभाल करने वाली मां त्रिजटा हैं । क्या उनसे कुछ भी नहीं कहोगे ? तब भगवान राम बोले, " हे मां त्रिजटा ! तुमने जानकी की बहुत सेवा की है। तुम्हारी शिव भक्ति अविरल है। तुम्हारी इसी भक्ति के बल पर मेरे आराध्य शिव आपको जनमानस में पूज्य बना देंगे।
सीता के जाने के उपरांत अब त्रिजटा के पास दूसरा कोई कार्य नहीं था । वह भगवान भोलेनाथ की आराधना में तल्लीन हो गई। त्रिजटा ने इसी दिन से नियम ले लिया कि वह भगवान शिव की आराधना करेगी । रोज उन पर जल चढ़ाएगी। उसका यह क्रम चलता रहा । इसी क्रम में सावन आ गया और भूलवश उसने अपने दोनों हाथों से दो लोटा जल भगवान भोलेनाथ को अर्पित किया और भगवान भोलेनाथ उसके सामने प्रकट हो गए।
त्रिजटा तूने भूलवश सावन के महीने में मुझे दो लोटा जल अर्पित किया है। मुझ पर कावड़ अर्पित की है इसलिए मांग क्या मांगती है? मैं तुझसे बहुत प्रसन्न हूं ।
तब त्रिजटा बोली, " बाबा ! मुझे कुछ नहीं चाहिए बस मुझे अपने चरणों में थोड़ी सी जगह दे दीजिए।
भगवान शिव बोले, " हे त्रिजटा ! मैं जिस काशी में रहता हूं, उसी काशी में मेरा पुत्र साक्षी विनायक के रूप में रहता है। उस मंदिर में तेरा निवास रहेगा और जैसे साक्षी विनायक में गणेश की पूजा होगी वैसे ही सब लोग तेरी पूजा किया करेंगे।
इस प्रकार काशी के एकमात्र मंदिर साक्षी विनायक में त्रिजटा विराजमान है और उनकी गणेश जी की तरह ही पूजा होती है।
विश्वनाथ जी के मंदिर के पास साक्षी विनायक मंदिर में सौभाग्य की देवी मां त्रिजटा आज भी विराजमान है। मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को माताएं साक्षी विनायक मंदिर में जाकर मां त्रिजटा की पूजा करती हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि सीता को जब भी कोई परेशानी होती थी तो वह उसे समझाती और कहती थीं, " बेटी ! तू चिंता मत कर, मैं जब तक हूं , तेरे हाथ में चूड़ा अमर रहेगा। मैं जब तक हूं , तेरे हाथ में सौभाग्य अमर रहेगा। मैं जब तक हूं , तेरे साथ से पति नहीं जा सकता। मुझे अपने भोले पर भरोसा है कि जब तक मैं तेरे साथ अशोक वाटिका में हूं । तब तक तेरे सिंदूर को कुछ नहीं हो सकता।
लोक कथाओं में ऐसा प्रचलित है कि जब सीता माता पुष्पक विमान में बैठकर अयोध्या आ रही थी तब त्रिजिटा भी उनके साथ आई, माता सीता के कहने पर वह बनारस में रहकर भगवान शंकर की आराधना में लीन हो गई। बनारस में त्रिजटा मंदिर में त्रिजटा को देवी के रूप में पूजा जाता है। महिलाएं इस मंदिर में अपनी मनोकामना को पूर्ण करने के लिए हाजिरी देती हैं। प्रसाद के रूप में त्रिजटा माता को मूली और बैगन चढ़ाया जाता है। इसी तरह त्रिजटा का मंदिर उज्जैन जिले में भी है जोकि बाल रूप हनुमान मंदिर के परिसर में ही मौजूद है।
आप जब भी काशी जाएं तो साक्षी विनायक मंदिर में मात्र जटा के दर्शन अवश्य करें।
भय दिखाकर दूसरे को वशीभूत करनेवाली मण्डलि को उसने भावी भयकी सूचना देकर मनोनुकूल बना लिया । प्रत्यक्ष वर्जन मे तो राजकोप का डर था, अनिष्ट की सम्भावना थी ।
भक्ति तो संतो के संग से, प्रभु लीला चिंतन एवं जानकी जी की कृपा दृष्टी से ही प्राप्त हो सकती है । जानकी माता ने तो कभी रावण की ओर दृष्टी तक नहीं डालीं । रावण को पता था की प्रभु से वैर करने पर उन्हें हाथो मृत्यु होगी तो मोक्ष प्राप्त हो जायेगा परंतु प्रभु चरणों की भक्ति नहीं प्राप्त होगी। )
वैसे तो माता त्रिजटा रावण की सेविका थी लेकिन वह भगवान श्रीराम की विजय में विश्वास रखती थी। उसनें अपने व माता सीता के बीच के संबंधों को जगजाहिर नही होने दिया किंतु हर पल वह माता सीता को हर महत्वपूर्ण जानकारी देती थी जैसे कि लंका का दहन होना, समुंद्र पर सेतु बनना, राम लक्ष्मण का सुरक्षित होना इत्यादि। त्रिजटा के द्वारा समय-समय पर माता सीता को जानकारी देते रहने से उनकी हिम्मत बंधी रहती थी।
जानकी माता ने पुत्र कहकर हनुमान जी से और माता कहकर त्रिजटा से अपना सम्बन्ध जोड़ लिया। किशोरी जी की कृपा हो गयी तब राम भक्ति सुलभ है। हनुमान जी को और त्रिजटा को सीता माँ ने अखंड भक्ति का दान दिया है ।सीता जी के प्राणों की रक्षा करने में और उनकी पीड़ा कम करने में हनुमान जी और त्रिजटा का मुख्य सहयोग रहा है।
संतो ने कहा है लगभग 2 वर्ष तक सीताजी लंका में रही (कोई 435 दिन मानते है) और त्रिजटा अत्यंत भाग्यशाली रही की राक्षसी होने पर भी उन्हें साक्षात् भक्ति श्री सीता जी का प्रत्येक क्षण संग मिला,सेवा मिली और प्रेम मिला।
संत कहते है भगवान् के पास देने के लिए सबसे छोटी वस्तु कोई है तो वो है मोक्ष और भगवान् के पास देने के लिए सबसे बड़ी वस्तु कोई है तो वह है भक्ति।
अग्नि परीक्षा के बाद जब माता सीता भगवान श्रीराम के पास आई तब उन्होंने माता त्रिजटा के वात्सल्य व प्रेम के बारे में उन्हें बताया। यह सुनकर सभी बहुत खुश हुए व भगवान राम व माता सीता ने त्रिजटा को इतने पुरस्कार दिए कि अब जीवनभर उन्हें कुछ करने की आवश्यकता नही थी। साथ ही त्रिजटा को लंका में भी विभीषण के द्वारा अहम उत्तरदायित्व व उचित सम्मान दिया गया।
कुछ मान्यताओं के अनुसार माता त्रिजटा भगवान राम व माता सीता के साथ पुष्पक विमान में बैठकर अयोध्या भी आई थी व कुछ दिनों तक उनके साथ रही थी। कुछ रामायण में लंका विजय के बाद यह बताया गया है कि विभीषण ने भगवान हनुमान से अनुरोध किया था कि वे उनकी बेटी त्रिजटा से विवाह कर ले। इसके बाद हनुमान ने त्रिजटा से विवाह किया जिन्हें उन्हें एक पुत्र तेगनग्गा प्राप्त हुआ। कुछ समय तक वहां रहने के पश्चात हनुमान वहां से चले गए।
भगवान् संसार की बड़ी से बड़ी वास्तु और भोग प्रदान कर अपना पीछा छुडा लेते है ,परंतु अपने चरणों की अविचल भक्ति नहीं देते ।नारी भक्ताओ का चरित्र हमेशा ही सर्वश्रेष्ठ रहा है, लंका में सर्वश्रेष्ठ भक्ता त्रिजटा है ऐसा संतो का मत है।
इस प्रकार त्रिजटा चरित्र भक्ति, विवेक और व्यवहार कुशलता का एक मणिकाञ्चन योग है।
शुभ प्रभात। आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलमय हो।
त्रिजटा कौन थी?
ऐसी मान्यता है की त्रिजटा भगवान राम के भक्त श्री विभीषणजी की पुत्री हैं। त्रिजटा की माता का नाम शरमा है। त्रिजटा रावण की भतीजी थी तथा राक्षसी त्रिजटा का वंशगुण था, जबकि रामभक्ति उसका पैतृकगुण था। जो त्रिजटा को उसके पिता विभीषण जी से प्राप्त हुआ था।
विभीषण के कितने पुत्र थे।
भगवान राम के अनन्य भक्त विभीषण जी के केवल एक ही संतान थी। और वह भी विभीषण जी की तरह ही एक राम भक्त थी। विभीषण जी की कन्या का नाम त्रिजटा था।
विभीषण की पत्नी कौन थी?
विभीषण की पहली पत्नी का नाम शर्मा था, जोकि त्रिजटा की मां थी। लेकिन रावण के वध के बाद मंदोदरी ने रावण के छोटे भाई और लंका के नए राजा विभीषण से विवाह कर लिया था ऐसी कहानी लोग बताते हैं।
बनारस में त्रिजटा का मंदिर है।
उत्तर प्रदेश के बनारस में लंका की त्रिजटा का एक मंदिर है जोकि काशी विश्वनाथ मंदिर के करीब है। मान्यता है कि जब सीता माता पुष्पक विमान में बैठकर अयोध्या आ रही थी तब त्रिजिटा भी उनके साथ आई, माता सीता के कहने पर वह बनारस में रहकर भगवान शंकर की आराधना में लीन हो गई। बनारस में त्रिजटा मंदिर में त्रिजटा को देवी के रूप में पूजा जाता है। महिलाएं इस मंदिर में अपनी मनोकामना को पूर्ण करने के लिए हाजिरी देती हैं। प्रसाद के रूप में त्रिजटा माता को मूली और बैगन चढ़ाया जाता है। इसी तरह त्रिजटा का मंदिर उज्जैन जिले में भी है जोकि बाल रूप हनुमान मंदिर के परिसर में ही मौजूद है। सीता पुराण में त्रिजटा को विभीषण और गंधर्व शर्मा की बेटी बताया गया है।
त्रिजटा अशोक वाटिका में माता सीता की अंगरक्षक थी
जब लंकापति रावण साधु का वेश धर के छल से माता सीता को पुष्पक विमान में उठाकर लंका लाया था तब माता सीता के रहने के लिए उसने अशोक वाटिका को चुना। माता सीता को किसी भी प्रकार से कोई नुकसान ना हो इसलिए रावण ने त्रिजटा राक्षसी को माता सीता का पहरेदार बनाया। त्रिजटा अशोक वाटिका में पहरा देने वाली सभी रक्षासिनो की मुखिया थी। उसके आदेश पर ही सभी अपने कर्तव्य का निर्वाहन किया करते थे। जब रावण माता सीता को अपहरण करके लंका लाया तब माता सीता अत्यंत दुखी थी और लगातार विलाप कर रही थी। अशोक वाटिका में मौजूद दूसरी राक्षसियां माता सीता को लगातार तंग किया करती थी। तब त्रिजटा ने अपनी बुद्धिमानी से सभी राक्षसियों को डरा कर चुप करा दिया था और माता सीता को ढांढस बांधा कर उनका साहस और हिम्मत बढ़ाया करते थे। माता सीता भी त्रिजटा को माता कहकर पुकारा करती थी। त्रिजटा की वजह से ही माता सीता राक्षसों की उस लंका नगरी में रह पा रही थी क्योंकि त्रिजटा लगातार उनकी हिम्मत को बढ़ाया करती थी और आशा की किरण को बुझने नहीं देती थी।
विभीषण की मृत्यु कैसे हुई?
मान्यता है कि विभीषण आज भी जीवित है क्योंकि भगवान राम जब पृथ्वी लोक से जा रहे थे तो उन्होंने भी विभीषण जी को चिरंजीवी होने का वरदान दिया था। और उन्हें कलयुग के अंत तक जिंदा रहने का आशीर्वाद दिया था। मान्यता है की ब्रह्म मुहूर्त में वह अयोध्या आते हैं और भगवान राम की पूजा करके रामेश्वरम जाते हैं और रामेश्वरम से वापस लंका चले जाते हैं आवागमन के लिए वह वायु की चाल से हवा में हनुमान जी की तरह विचरण करते हैं।
रावण की पत्नी मंदोदरी कौन थी?
मंदोदरी का जन्म हेमा नाम के एक अप्सरा के गर्भ से हुआ था। उस अप्सरा का विवाह मायासुर के साथ हुआ था। मान्यता है की मंदोदरी मध्य प्रदेश के मंदसौर के राजा की पुत्री थी।
विभीषण नाम क्यों नहीं रखा जाता है?
रामायण में विभीषण ने अपने परिवार का भेद भगवान राम को बताया था, जिसकी वजह से उसके भाई तथा उसके सभी सगे संबंधियों का विनाश हो गया था। इसीलिए कोई भी अपने बच्चे का नाम भी विभीषण नहीं रखता है।
विभीषण की माता का नाम क्या था?
विभीषण ब्राह्मण एवं राक्षस परिवार में हुआ था क्योंकि उसके पिता ऋषि विश्रवा एक ब्राह्मण थे जबकि विभीषण की मां का नाम कैक्सी था जो की एक राक्षसी थी।
कुंभकरण की पत्नी का नाम क्या था?
कुंभकरण की पत्नी बाली देश की कन्या वज्रजवाला थी। इसके अलावा कुंभकरण की एक दूसरी पत्नी भी थी, उसका नाम करकटी था। कुंभकरण के 1 पुत्र था इसका नाम मूलकासुर था। मान्यता है कि इस मूलकासूर का वध माता सीता ने किया था।
रावण की मृत्यु के बाद सुपनखा का क्या हुआ?
रावण की बहन सुपनखा जिसकी वजह से रावण की मति भ्रष्ट हो गई और उसमें माता सीता का अपहरण कर अपने पूरे परिवार को मृत्यु के मुख्य मे ले गया। वह रावण की मृत्यु के बाद सूर्पनखा जंगल में जाकर तपस्या करके अपने जीवन से मुक्ति प्राप्त करनी थी।
रावण की मृत्यु के पश्चात लंका का राजा कौन बना?
मान्यताओं के अनुसार रावण की मृत्यु के बाद लंका की राजगद्दी में रावण के सबसे छोटे भाई विभीषण बैठे थे और उन्होंने लंका का सारा कार्य भार अपने हाथों में ले लिया था। भगवान राम ने उनका राजतिलक किया था और भारत के बाद अगर कहीं रामराज्य चल रहा था तो वह विभीषण के शासन में लंका में चल रहा था।
रावण का धर्म क्या था?
रावण ब्रांहण का पुत्र था, इसलिए कह सकते हैं की वह हिन्दू धर्म मे जन्म लिया था, लेकिन क्योंकि उसकी चालचलन सनातन/हिन्दू धर्म के अनुयाईयो की तरह नहीं था, तथा उसने राक्षस गुण को स्वीकार्य कर लिया था। पूर्व काल मे जन्म से जाती का निर्धारण नहीं होता था, इस लिए ज्ञान एवं वेदो के ज्ञाता को ब्रांहण कहते थे, इसलिए कई लोग ज्ञान के आधार पर रावण को ब्राहण कहते हैं, लेकिन गुण के आधार पर रावण को राक्षस गुण का कहा जा सकता हैं।
रावण की उम्र कितनी थी?
रावण पुलत्स मुनि का पौत्र था तथा वह भगवान ब्रम्हा के वंश का था। रावण की मृत्यु जब राम भगवान के हाथो हुई थी तब रावण की मृत्यु 39001 वर्ष 4 माह और 9 दिन की थी।
कुबेर से रावण ने बलपूर्वक क्या छीन लिया था?
कुबेर और रावण दोनों एक दूसरे के सौतेले भाई है। कुबेर देवता की श्रेणी मे आते हैं तथा, उन्हे धन का देवता माना जाता हैं। मान्यता हैं की लंका का राजा कुबेर ही थे, लेकिन रावण को लंका बहुत पसंद आई तो उसने कुबेर से लंका बलपूर्वक छीन लिया।
पुरस्कारों से लाद दिया था राम और सीता ने
रामायण के दूसरी भाषाओं के संस्करणों में त्रिजटा के बारे में और वर्णन आया है. इनमें कहा गया है कि युद्ध के बाद राम और सीता ने त्रिजटा को मूल्यवान पुरस्कारों से लाद दिया था. इंडोनेशिया में प्रचलित "काकाविन रामायण" के अनुसार अशोक वाटिका में रावण ने 300 राक्षसियों को गार्ड के तौर पर तैनात कर रखा था. उसमें केवल त्रिजटा ही थी, जो सीता का उत्साह बढ़ाती थी
"बालरामायण" कहती है कि जीत के बाद त्रिजटा सीता के साथ पुष्पक विमान से अयोध्या भी गई थी. "आनंद रामायण" में भी यही बात कही गई है. बाद में जब सीता फिर लंका आईं तो उन्होंने वहां विभीषण की पत्नी शरमा से त्रिजटा का उसी तरह खयाल रखने को कहा था, जैसा उसने उनका अशोक वाटिका में रखा था. इंडोनेशिया की "काकाविन रामायण" कहती है कि युद्ध के बाद सीता ने त्रिजटा को काफी मूल्यवान उपहार दिए थे.
क्या हनुमान से हुई थी त्रिजटा की शादी
थाई रामायण "रामाकीएन" में कहा गया है कि हनुमान ने विभीषण की बेटी त्रिजटा से शादी की थी. थाईलैंड में विभीषण को फिपेक और त्रिजटा को बेंचाकेई कहा जाता है. थाई रामायण कहती है कि हनुमान के साथ शादी से त्रिजटा को एक बेटा असुरपद हुआ था. यद्यपि वो राक्षस था लेकिन उसका सिर बंदर जैसा था.
रामायण के दूसरी भाषाओं के संस्करणों में त्रिजटा के बारे में और वर्णन आया है. इनमें कहा गया है कि युद्ध के बाद राम और सीता ने त्रिजटा को मूल्यवान पुरस्कारों से लाद दिया था. इंडोनेशिया में प्रचलित "काकाविन रामायण" के अनुसार अशोक वाटिका में रावण ने 300 राक्षसियों को गार्ड के तौर पर तैनात कर रखा था. उसमें केवल त्रिजटा ही थी, जो सीता का उत्साह बढ़ाती थी
"बालरामायण" कहती है कि जीत के बाद त्रिजटा सीता के साथ पुष्पक विमान से अयोध्या भी गई थी. "आनंद रामायण" में भी यही बात कही गई है. बाद में जब सीता फिर लंका आईं तो उन्होंने वहां विभीषण की पत्नी शरमा से त्रिजटा का उसी तरह खयाल रखने को कहा था, जैसा उसने उनका अशोक वाटिका में रखा था. इंडोनेशिया की "काकाविन रामायण" कहती है कि युद्ध के बाद सीता ने त्रिजटा को काफी मूल्यवान उपहार दिए थे.
क्या हनुमान से हुई थी त्रिजटा की शादी
थाई रामायण "रामाकीएन" में कहा गया है कि हनुमान ने विभीषण की बेटी त्रिजटा से शादी की थी. थाईलैंड में विभीषण को फिपेक और त्रिजटा को बेंचाकेई कहा जाता है. थाई रामायण कहती है कि हनुमान के साथ शादी से त्रिजटा को एक बेटा असुरपद हुआ था. यद्यपि वो राक्षस था लेकिन उसका सिर बंदर जैसा था.
रामायण के मलय वर्जन के अनुसार, युद्ध के बाद विभीषण ने हनुमान से अनुरोध किया कि वो उनकी बेटी से शादी कर लें. यहां त्रिजटा को सेरी जाती के रूप में जाना जाता है. हनुमान सहमत हो गए लेकिन उनकी एक शर्त थी. उनका कहना था कि वो इस शादी में त्रिजटा के साथ केवल एक महीने ही रहेंगे. इसके बाद हनुमान अयोध्या चले गए. त्रिजटा ने एक बेटे को जन्म दिया. जिसे हनुमान तेगनग्गा (असुरपद) कहा जाता है. जावा औऱ सूडान में रामायण के कठपुतली नाटकों में त्रिजटा को हनुमान की पत्नी के तौर पर दिखाया जाता है.
बनारस में त्रिजटा का मंदिर
वाराणसी में त्रिजटा का एक मंदिर है, जो यहां के प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर के करीब है. यहां ये मान्यता है कि त्रिजटा लंका से सीता के साथ जब पुष्पक विमान से अयोध्या जा रही थी तो सीता ने उससे कहा कि अयोध्या में त्रिजटा को राक्षसी होने के कारण जाने की अनुमति नहीं मिलेगी.
इसके बाद सीता ने सुझाव दिया कि उसे वाराणसी चले जाना चाहिए, जहां उसको मोक्ष मिल जाएगा. फिर उसकी पूजा वहां एक देवी के रूप में की जाएगी.अब यहां मंदिर में त्रिजटा की रोज पूजा होती है. महिलाएं इस मंदिर में अपनी मनोकामना पूरी होने के लिए आती हैं. यहां त्रिजटा को मूली और बैंगन का चढ़ावा चढ़ाया जाता है.
इसी तरह त्रिजटा का एक मंदिर उज्जैन में भी है, जो बालवीर हनुमान मंदिर परिसर में है. यहां देवी की तीनदिनों की विशेष पूजा होती है, जो कार्तिक पूर्णिमा से शुरू होती है. तेलुगु में सीता पुराणमु रामासामी चौदारी में त्रिजटा को विभीषण औऱ गंधर्व शरमा की बेटी बताया गया है.
बनारस में त्रिजटा का मंदिर
वाराणसी में त्रिजटा का एक मंदिर है, जो यहां के प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर के करीब है. यहां ये मान्यता है कि त्रिजटा लंका से सीता के साथ जब पुष्पक विमान से अयोध्या जा रही थी तो सीता ने उससे कहा कि अयोध्या में त्रिजटा को राक्षसी होने के कारण जाने की अनुमति नहीं मिलेगी.
इसके बाद सीता ने सुझाव दिया कि उसे वाराणसी चले जाना चाहिए, जहां उसको मोक्ष मिल जाएगा. फिर उसकी पूजा वहां एक देवी के रूप में की जाएगी.अब यहां मंदिर में त्रिजटा की रोज पूजा होती है. महिलाएं इस मंदिर में अपनी मनोकामना पूरी होने के लिए आती हैं. यहां त्रिजटा को मूली और बैंगन का चढ़ावा चढ़ाया जाता है.
इसी तरह त्रिजटा का एक मंदिर उज्जैन में भी है, जो बालवीर हनुमान मंदिर परिसर में है. यहां देवी की तीनदिनों की विशेष पूजा होती है, जो कार्तिक पूर्णिमा से शुरू होती है. तेलुगु में सीता पुराणमु रामासामी चौदारी में त्रिजटा को विभीषण औऱ गंधर्व शरमा की बेटी बताया गया है.
प्रस्तुत पंक्ति त्रिजटाके चार गुणोंको स्पष्ट करती है- १- वह राक्षसी है । २-श्री रामचरण में उसकी रति है । ३ -वह व्यवहार-निपुण और ४ -विवेकशीला है । राक्षसी होते हुए भी श्री रामचरणानुराग, व्यवहार कुशलता एवं विवेकशीलता जैसे दिव्य और देवोपम गुणों की अवतारणा चरित्र में अलौकिकता को समाविष्ट करती है।
सम्भवत: इन्ही तीन गुणों के समाहार के कारण उसका नाम त्रिजटा रखा गया हो । संत कहते है इनके सिर पर ज्ञान,भक्ति और वैराग्य रुपी तीन जटाएं है अतः इनका नाम त्रिजटा है।
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